देश को स्वच्छ ऊर्जा का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत पेट्रोलियम रिफाइनिंग क्षेत्र पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है। इसी कड़ी में केंद्रीय मंत्री श्रीपद येसो नाइक ने राज्यसभा में जानकारी दी कि ‘साइट’ मोड-2बी योजना के तहत चार बड़ी रिफाइनरियों को कुल 30 किलो टन प्रति वर्ष की उत्पादन क्षमता आवंटित की गई है। घरेलू स्तर पर हरित हाइड्रोजन का यह उत्पादन देश के कार्बन उत्सर्जन को घटाने में सहायक होगा। रिफाइनरियों को केटीपीए (Kilo Tonnes Per Annum) क्षमता आवंटित करने का सीधा मतलब है कि उन कंपनियों को हर साल उतना हरित हाइड्रोजन बनाने या इस्तेमाल करने की सरकारी मंजूरी मिली है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। देश को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में सरकार लगातार कदम बढ़ा रही है। इसी कड़ी में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत अब पेट्रोलियम रिफाइनिंग सेक्टर में भी हरित हाइड्रोजन को अपनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में इससे जुड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि मिशन की साइट (स्ट्रेटेजिक इंटरवेंशन्स फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन) मोड-2बी योजना के तहत देश की चार बड़ी रिफाइनरियों को कुल 30 किलो टन प्रति वर्ष (केटीपीए) हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता आवंटित की गई है। रिफाइनरियों को 10 केटीपीए (KTPA – Kilo Tonnes Per Annum) क्षमता आवंटित करने का सीधा मतलब है कि उन कंपनियों को हर साल 10,000 मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) बनाने या इस्तेमाल करने की सरकारी मंजूरी और वित्तीय सहायता मंजूर की गई है।
किस रिफाइनरी को मिली कितनी क्षमता
इस योजना के तहत पानीपत स्थित इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड की रिफाइनरी को सबसे ज़्यादा 10 केटीपीए क्षमता दी गई है। इसी तरह असम के नुमालीगढ़ में स्थित नुमालीगढ़ रिफाइनरीज लिमिटेड को भी 10 केटीपीए की क्षमता आवंटित हुई है। मध्य प्रदेश के बीना में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और आंध्र प्रदेश के विजाग में हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड को 5-5 केटीपीए की क्षमता दी गई है। इस तरह चारों रिफाइनरियों को मिलाकर कुल 30 केटीपीए सालाना हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता तय की गई है। निजी डेवलपर्स के ज़रिए होगा क्रियान्वयनइन सभी परियोजनाओं को बिल्ड-ओन-ऑपरेट मॉडल के तहत निजी डेवलपर्स के माध्यम से लागू किया जा रहा है, यानी संबंधित परियोजना का निवेश और संचालन जिम्मा उन्हीं डेवलपर्स पर होगा।
सरकार का मानना है कि इससे रिफाइनरियों को आधुनिक तकनीक और निजी क्षेत्र की दक्षता का लाभ मिलेगा, जबकि निवेश का बोझ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर सीधे नहीं पड़ेगा।आयातित ईंधन पर निर्भरता होगी कमसरकार को उम्मीद है कि रिफाइनरियों में हरित हाइड्रोजन के घरेलू उत्पादन और उपयोग से आयातित जीवाश्म ईंधन पर देश की निर्भरता घटेगी, जिससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
इसके साथ ही यह कदम भारत के स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते सफर और नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में भी मददगार साबित होगा। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत उठाया गया यह कदम दिखाता है कि सरकार अब सिर्फ बिजली उत्पादन ही नहीं, बल्कि तेल-गैस रिफाइनिंग जैसे भारी उद्योगों को भी हरित ऊर्जा की दिशा में ले जाने पर गंभीरता से काम कर रही है।
रिफाइनरियों के लिए यह क्यों जरूरी है?
कच्चे तेल से पेट्रोल और डीजल बनाने तथा उसमें से सल्फर हटाने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन की जरूरत होती है। अभी रिफाइनरियां इसके लिए प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करती हैं, जिससे बहुत प्रदूषण होता है (इसे ‘ग्रे हाइड्रोजन’ कहते हैं)। सरकार चाहती है कि वे प्रदूषण फैलाने वाली हाइड्रोजन की जगह पानी और सौर ऊर्जा से बनी ‘हरित हाइड्रोजन’ का इस्तेमाल शुरू करें।
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