यूरोप में भीषण लू के कारण AC की कम उपलब्धता पर बहस छिड़ी है; आलोचक इसे ‘सांस्कृतिक विरोध’ बता रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ इसे ‘ऐतिहासिक ठंडे मौसम’ का परिणाम मानते हैं। पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2.5 डिग्री गर्म हो चुके यूरोप में अब केयर होम और अस्पतालों के लिए सक्रिय कूलिंग अनिवार्य होती जा रही है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। यूरोप में इस गर्मी में लगातार आई हीटवेव्स ने एक नई बहस छेड़ दी है — एयर कंडीशनिंग (AC) को लेकर। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में इस साल रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी पड़ी और हज़ारों लोगों की जान गई, कई इलाकों में जून के महीने में ही तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया। इसी के चलते यूरोप में AC के कम इस्तेमाल पर सबका ध्यान गया है, खासकर अमेरिका से तुलना करते हुए, जहां AC लगभग हर घर में है।
कई अखबारों, ब्लॉगर्स और यहां तक कि एलन मस्क ने भी इस पर टिप्पणी की है कि यूरोप “AC के प्रति दुश्मनी” रखता है, और इसके पीछे यूरोप की “सांस्कृतिक रूढ़िवादिता” और “अति-नियंत्रणकारी सरकारों” को ज़िम्मेदार ठहराया है।
फ्रांस की नेशनल रैली और ब्रिटेन के कंज़र्वेटिव जैसी दक्षिणपंथी पार्टियां खुद को AC के “चैंपियन” के तौर पर पेश कर रही हैं, जबकि क्लाइमेट एक्शन का विरोध भी कर रही हैं।
लेकिन इन ज़्यादातर बहसों में एक अहम बात छूट जाती है — इंसानों की वजह से हुए क्लाइमेट चेंज ने यूरोप, जो दुनिया का सबसे तेज़ी से गर्म हो रहा महाद्वीप है, में कभी दुर्लभ रही गर्मी को अब आम बना दिया है।
कार्बन ब्रीफ के विश्लेषण के मुताबिक, 2020 के दशक से पहले तक यूरोप के कई शहरों में 30 डिग्री से ऊपर तापमान वाले दिन बहुत कम होते थे — यानी AC की ज़रूरत ही नहीं थी। यूरोप को पहले AC की ज़रूरत नहीं पड़ी उत्तरी यूरोप में AC लगाने की दर बेहद कम है — जर्मनी में सिर्फ 6% और इंग्लैंड में महज़ 4% घरों में AC है।
इसकी बड़ी वजह इन देशों का ऐतिहासिक मौसम है। अमेरिका के उलट, यूरोप में ज़्यादातर घर और इंफ्रास्ट्रक्चर उस दौर में बने जब AC का वजूद ही नहीं था। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों में तेज़ गर्मी नियमित रूप से पिछले कुछ दशकों में ही पड़नी शुरू हुई है।
ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के एनर्जी और क्लाइमेट रिसर्चर प्रोफेसर जान रोज़ेनो का कहना है कि 20वीं सदी के ज़्यादातर हिस्से में उत्तरी यूरोप को कूलिंग की ज़रूरत ही नहीं थी, क्योंकि ब्रिटेन और जर्मनी में घर गर्मी को अंदर रोकने के लिए बनाए गए थे, बाहर रखने के लिए नहीं — सर्दियां ठंडी होती थीं और गर्मियां शायद ही कभी तेज़ होती थीं।
उनका मानना है कि AC को लेकर लोगों का नज़रिया दरअसल उनके ठंडे मौसम के इतिहास से बना है, न कि किसी “हरित विचारधारा” से। पहले लोग घरों को ठंडा रखने के पारंपरिक तरीके अपनाते थे।
क्लाइमेट एनालिटिक्स के रिचर्ड ब्लैक ने बताया कि पेरिस जैसे शहरों के लोग रात में खिड़कियां-शटर खोलकर और सुबह बंद करके गर्मी से निपट लेते थे, लेकिन अब इस तरह के अनुकूलन की एक सीमा आ चुकी है। अब यूरोप पूर्व-औद्योगिक स्तर से करीब 2.5 डिग्री ज़्यादा गर्म हो चुका है, और क्लाइमेट चेंज की वजह से रिकॉर्ड-तोड़ हीटवेव आम हो गई हैं — यहां तक कि महाद्वीप के उत्तरी हिस्से में भी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप को अब ज़्यादा AC की ज़रूरत पड़ेगी, खासकर केयर होम, स्कूल और अस्पताल जैसी जगहों पर जहां सबसे कमज़ोर तबका रहता है। गर्म इलाकों में यूरोप में भी AC खूब है अक्सर लेखों में बताया जाता है कि यूरोप के सिर्फ “करीब 20%” घरों में AC है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 90% से ऊपर है।
लेकिन यह पूरे महाद्वीप का औसत आंकड़ा असली तस्वीर छुपा देता है। दक्षिणी यूरोप में, जहां तापमान हमेशा से ज़्यादा रहा है, AC का इस्तेमाल काफी आम है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इटली के लगभग 60% घरों में AC है। ग्रीस में यह आंकड़ा 70-80% के बीच और स्पेन में 41% है, स्पेन के गर्म दक्षिणी हिस्सों में यह और भी ज़्यादा है।
यही पैटर्न फ्रांस के अंदर भी दिखता है — जहां देशभर का आंकड़ा सिर्फ 25% बताया जाता है, वहीं Hello Watt एनर्जी ऐप के पोलिंग डेटा के मुताबिक फ्रांस के भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के कम से कम 60% घरों में AC है, जबकि पेरिस समेत उत्तरी क्षेत्रों में यह दर अक्सर 5% से भी कम है।
यही बात अमेरिका पर भी लागू होती है — जहां गर्म दक्षिणी राज्यों में AC लगभग हर घर में है, वहीं यूरोप जैसे मौसम वाले वाशिंगटन राज्य में सिर्फ 66% घरों में AC है। कुछ यूरोपीय देशों ने AC का “विरोध” किया — लेकिन अब लोकप्रियता बढ़ रही है अंतरराष्ट्रीय टिप्पणीकारों ने यूरोप के “कूलिंग टेक्नोलॉजी के प्रति पुराने विरोध” पर खूब लिखा है, खासकर अमेरिका से तुलना करते हुए।
वॉशिंगटन पोस्ट और वॉल स्ट्रीट जर्नल के संपादकीयों समेत कई लेखों ने इस “कल्चर वॉर” को हवा दी है। लेकिन ऐसी आलोचनाएं अक्सर सबसे साफ वजह को नज़रअंदाज़ कर देती हैं — कि उत्तरी यूरोप में AC कम इसलिए है क्योंकि ऐतिहासिक मौसम में इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। फिर भी, पूरे यूरोप में रुझान बदल रहा है।
जून की हीटवेव के दौरान जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन से AC की बिक्री में भारी उछाल की खबरें आईं। फ्रांस की ग्रीन पार्टी की नेता मरीन तोंदेलिए, जिनकी पार्टी परंपरागत रूप से AC का विरोध करती रही है, ने हाल में कहा कि कुछ जगहों पर अब AC के बिना काम चलाना मुमकिन नहीं रहा।
2015 के मुकाबले 2024 में फ्रांस, स्पेन और नीदरलैंड्स “स्पेस कूलिंग” पर दोगुने से ज़्यादा एनर्जी खर्च कर रहे हैं, और जर्मनी में AC उत्पादन हाल के वर्षों में कम से कम 75% बढ़ा है। यह भी ग़ौरतलब है कि “क्लाइमेट पॉलिसी” AC लगाने में रोड़ा बनने के सबूत बहुत कम हैं — जर्मनी के पोलिंग डेटा के मुताबिक लोगों को पर्यावरण की चिंता से ज़्यादा AC की ऊंची लागत परेशान करती है।
AC से एमिशन बढ़ रहा है, लेकिन क्लाइमेट पर असर सीमित हो सकता है यह तर्क सतही तौर पर सही लगता है कि यूरोप में AC बढ़ने से एमिशन भी बढ़ेगा। लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि किसी देश का पावर सेक्टर किस तरह बिजली बनाता है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, 2022 में “स्पेस कूलिंग” (ज़्यादातर AC) ने वैश्विक स्तर पर 2,100 टेरावाट-घंटे बिजली खर्च की, जिससे करीब 1 अरब टन CO2 एमिशन हुआ — यानी जीवाश्म ईंधन और उद्योग से होने वाले कुल वैश्विक CO2 एमिशन का करीब 2.7%। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के लॉरी माइल्युविर्ता के मुताबिक, फिलहाल यूरोपीय संघ में AC कुल बिजली खपत का सिर्फ करीब 1% इस्तेमाल करता है, और अमेरिका जैसी दर तक पहुंचने पर भी यह दोगुना ही होगा — यानी जितना शोर इस बारे में मचाया जाता है, वास्तविक खपत उतनी बड़ी नहीं है।
IEA के अनुमान के मुताबिक, अगर हालात यूं ही चलते रहे तो 2050 तक AC से बिजली की मांग तीन गुना से ज़्यादा होकर 6,200 टेरावाट-घंटे तक पहुंच सकती है। जिन देशों की बिजली कम-कार्बन स्रोतों से बनती है — जैसे फ्रांस, जहां 67% बिजली परमाणु ऊर्जा से आती है — वहां AC बढ़ने का क्लाइमेट पर असर सीमित रहेगा। लेकिन भारत जैसे देशों में, जहां कोयला बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा है, AC अपनाने से एमिशन में ज़्यादा बढ़ोतरी हो सकती है।
यूसी बर्कले के इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर के एक नए पेपर के मुताबिक, “रूम AC” (पोर्टेबल यूनिट्स) पहले से ही भारत की पीक बिजली मांग का लगभग एक-चौथाई हिस्सा ले चुके हैं — जबकि ज़्यादातर भारतीय घरों ने अभी अपना पहला AC खरीदा भी नहीं है। AC से शहर सीधे तौर पर गर्म भी होते हैं AC सिर्फ बिजली की खपत और उससे जुड़े एमिशन के ज़रिए ही पूरी धरती को गर्म नहीं करता, बल्कि इसका एक स्थानीय असर भी है।
AC कमरे की गर्मी को बाहर फेंकता है, जिससे सड़कों का तापमान बढ़ता है और “अर्बन हीट आइलैंड” इफेक्ट और गहरा हो जाता है। पेरिस के समाजवादी मेयर इमैनुएल ग्रेगोइरे ने ले मोंड को दिए इंटरव्यू में कहा कि सामूहिक जगहों को ठंडा रखने के लिए AC उपयोगी हो सकता है, लेकिन निजी AC शहर को और गर्म करके समस्या को बदतर बना देता है। एक स्टडी के मुताबिक फीनिक्स, एरिज़ोना जैसे शहर में हीटवेव के दौरान AC से रात का तापमान 1-1.5 डिग्री तक बढ़ सकता है, जबकि पेरिस पर किए गए एक मॉडल के मुताबिक भारी AC इस्तेमाल से बाहरी तापमान 2 डिग्री से ज़्यादा बढ़ सकता है।
IPCC ने भी इसे “मैलएडाप्टेशन” यानी उल्टा असर डालने वाला अनुकूलन बताते हुए आगाह किया है कि घने शहरों में AC की ऊंची ऊर्जा मांग और गर्मी उत्सर्जन नुकसानदेह हो सकता है। यूरोप में ज़्यादा AC से गर्मी से होने वाली मौतें घट सकती हैं हीटवेव यूरोप में किसी भी अन्य प्राकृतिक आपदा से ज़्यादा जानें लेती हैं। जून 2026 की हीटवेव में यूरोप में 20,000 से ज़्यादा मौतें होने का अनुमान है, जिसमें अकेले फ्रांस में 2,700 से ज़्यादा मौतें गर्मी से जुड़ी थीं।
एक 2021 की स्टडी के मुताबिक 2019-21 के दौरान AC ने दुनियाभर में हर साल करीब 1,90,000 गर्मी से होने वाली मौतों को रोका। अमेरिका में AC ज़्यादा होने से वहां गर्मी से होने वाली मौतें यूरोप से काफी कम हैं — यूरोप में हर 1 लाख लोगों में करीब 11 मौतें गर्मी से होती हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा सिर्फ 2 है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ AC ही इसका हल नहीं है।
पेड़ लगाना, शहरों में बदलाव, और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय भी उतनी ही अहम भूमिका निभाते हैं। फ्रांस में 2003 की भीषण गर्मी में 70,000 मौतों के बाद बनाई गई नीतियों — जैसे नर्सिंग होम में AC अनिवार्य करना और हीट एक्शन प्लान — ने मौतों की संख्या काफी घटाई है।
बावजूद इसके, यूरोप के आधे से भी कम देशों में ऐसी योजना मौजूद है। ब्रिटेन में “नेट-ज़ीरो नियम” AC को नहीं रोक रहे ब्रिटेन में कंज़र्वेटिव नेताओं और दक्षिणपंथी मीडिया ने AC को नेट-ज़ीरो नीति के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की है। डेली टेलीग्राफ के एक कॉलम में दावा किया गया कि सख्त नेट-ज़ीरो नियमों की वजह से ब्रिटेन में AC लगभग प्रतिबंधित है — जबकि यह दावा गलत है।
खुद यूके सरकार के हाउसिंग मंत्रालय ने इसे स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि घरों में AC प्रतिबंधित होने की बात गलत है। सच यह है कि ब्रिटेन में सिर्फ 5% से कम घरों में AC है, लेकिन इसकी वजह यह है कि पहले इतनी गर्मी ही नहीं पड़ती थी कि यह खर्च जायज़ लगे। मौजूदा नियम AC लगाने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाते, हालांकि नए घरों में पैसिव कूलिंग को प्राथमिकता दी जाती है और AC को आखिरी विकल्प माना जाता है।
मौजूदा घरों के लिए ज़्यादातर AC यूनिट्स को बिना योजना अनुमति के लगाया जा सकता है, और एयर-टू-एयर हीट पंप लगाने के नियम 2025 में और आसान बनाए गए — यानी नेट-ज़ीरो नीति ने AC को रोकने के बजाय कुछ खास कूलिंग सिस्टम लगाना आसान ही बनाया है। क्लाइमेट चेंज कमेटी का अनुमान है कि 2 डिग्री ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में ब्रिटेन के करीब 22% घरों को सक्रिय कूलिंग यानी AC की ज़रूरत पड़ेगी। AC शहरों की गर्मी का इकलौता जवाब नहीं यूरोप में AC पर राजनीति भी तेज़ हो गई है — फ्रांस की नेशनल रैली पार्टी ने सभी सार्वजनिक इमारतों में AC लगाने की “बड़ी योजना” का ऐलान किया है।
इसके जवाब में वामपंथी नीति-निर्माता शहरी हरियाली और पुरानी इमारतों के रेट्रोफिटिंग जैसे कार्यक्रमों पर ज़ोर दे रहे हैं। IPCC की छठी असेसमेंट रिपोर्ट के मुताबिक अर्बन फॉरेस्ट और ग्रीन रूफ जैसे अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर से कूलिंग के लिए बिजली की खपत घट सकती है, साथ ही क्लाइमेट, हवा की गुणवत्ता और सेहत के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकते हैं। किंग्स कॉलेज लंदन के अदित्य वालियाथन पिल्लई का कहना है कि AC पर बहस को केंद्र में रखकर यूरोप की हीटवेव पर दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया ने इंसानों को ठंडा रखने के विज्ञान को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया है।
पिल्लई के मुताबिक, जहां तापमान 42 डिग्री या उससे ऊपर पहुंच रहा है, वहां AC को गंभीरता से लेना ज़रूरी है, लेकिन 30-33 डिग्री जैसे तापमान वाले इलाके पंखे, क्रॉस-वेंटिलेशन खुलने वाली खिड़कियों जैसे विकल्पों पर भरोसा कर सकते हैं। उनका मानना है कि व्यवहार में बदलाव — जैसे हल्के कपड़े पहनना, ज़्यादा पानी पीना, गर्मी के संपर्क में कम रहना — भले ही “सबसे कम आकर्षक” उपाय लगे, लेकिन यही हीट पॉलिसी का सबसे बड़ा हिस्सा निभाता है।
इसके साथ ही कार्यस्थलों पर अनिवार्य ब्रेक, छाया और कूलिंग जैसी सुविधाओं की व्यवस्था भी अहम मानी जा रही है।
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