अमेरिका में गंभीर सूखे और घटते जल स्तर के चलते कोलोराडो नदी पर निर्भर प्रमुख राज्यों—एरिजोना, कैलिफोर्निया और नेवादा—के लिए पानी की आपूर्ति में बड़ी अनिवार्य कटौती की घोषणा की गई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। अमेरिका में लगातार गहराते सूखे और जल संकट के बीच कोलोराडो नदी पर निर्भर तीन प्रमुख राज्यों एरिजोना, कैलिफोर्निया और नेवादा के लिए पानी की आपूर्ति में बड़ी अनिवार्य कटौती का फैसला किया गया है।
अमेरिकी गृह विभाग ने 2027 और 2028 के लिए इन राज्यों के कोलोराडो नदी जल आवंटन में कुल 12.5 लाख एकड़-फीट सालाना की कमी लागू करने की घोषणा की। यह कदम अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बढ़ते जल संकट और देश की सबसे महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों में से एक को बचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इस फैसले का सबसे ज्यादा असर एरिजोना पर पड़ेगा, जहां लगभग 7.6 लाख एकड़-फीट पानी की कटौती की जाएगी।
यह राज्य के लगभग 28 लाख एकड़-फीट के वार्षिक हिस्से का करीब 27 से 31 प्रतिशत है। कैलिफोर्निया के हिस्से में 4.4 लाख एकड़-फीट की कमी होगी, जो उसके करीब 44 लाख एकड़-फीट के वार्षिक आवंटन का लगभग 10 से 12 प्रतिशत है। वहीं नेवादा को 50 हजार एकड़-फीट की कटौती का सामना करना पड़ेगा।
मात्रा के लिहाज से यह सबसे छोटी कटौती है, लेकिन राज्य के सीमित जल आवंटन को देखते हुए इसका प्रभाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोलोराडो नदी अमेरिका के सात राज्यों और मेक्सिको के कुछ हिस्सों में रहने वाले करीब चार करोड़ लोगों के लिए पानी का प्रमुख स्रोत है।
इसके अलावा यह लगभग 50 से 55 लाख एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई करती है, जहां देश के लिए महत्वपूर्ण मात्रा में फल, सब्जियां और पशु चारा पैदा होता है। नदी पर बने बांधों और जलाशयों से लाखों लोगों को जलविद्युत भी मिलती है। ऐसे में नदी के प्रवाह में लगातार गिरावट केवल पानी की समस्या नहीं बल्कि कृषि, ऊर्जा, शहरी विकास और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बन गई है।
पिछले दो दशकों में कोलोराडो नदी का औसत प्रवाह करीब 20 प्रतिशत तक घट गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका जिस सूखे दौर से गुजर रहा है, वह कम से कम पिछले 1,200 वर्षों में सबसे गंभीर अवधियों में से एक है।
कम बर्फबारी, बढ़ता तापमान, तेजी से वाष्पीकरण और लंबे समय तक जारी सूखे ने नदी के जलस्तर को लगातार कमजोर किया है। जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बनाने में भूमिका निभाई है, हालांकि अमेरिकी गृह विभाग ने अपने फैसले में मुख्य रूप से पिछले 25 वर्षों की असाधारण सूखा परिस्थितियों पर जोर दिया है।
इस संकट का सबसे स्पष्ट संकेत लेक मीड और लेक पॉवेल जैसे विशाल जलाशयों के जलस्तर में दिखाई देता है। ये दोनों अमेरिका के सबसे बड़े जलाशयों में शामिल हैं और कोलोराडो नदी प्रणाली के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में लेक मीड की क्षमता लगभग 27 प्रतिशत और लेक पॉवेल की क्षमता करीब 21 से 23 प्रतिशत के आसपास रह गई है। जलस्तर में यह गिरावट जलापूर्ति के साथ-साथ जलविद्युत उत्पादन के लिए भी खतरा पैदा कर रही है।
अधिकारियों का कहना है कि नदी प्रणाली अब ऐसी स्थिति में पहुंच गई है जहां लगातार सूखे के एक और दौर के लिए लगभग कोई अतिरिक्त सुरक्षा भंडार नहीं बचा है। नई व्यवस्था के तहत निचले बेसिन के तीनों राज्य अपने संयुक्त 75 लाख एकड़-फीट वार्षिक आवंटन में से हर वर्ष 12.5 लाख एकड़-फीट पानी छोड़ेंगे। इसके अतिरिक्त 2027 और 2028 के दौरान लगभग सात लाख एकड़-फीट स्वैच्छिक जल संरक्षण की उम्मीद की जा रही है।
इसका उद्देश्य 2028 के अंत तक कुल करीब 32 लाख एकड़-फीट पानी की बचत करना है। संघीय अधिकारियों को उम्मीद है कि इससे जलाशयों पर दबाव कम होगा और अगले कुछ वर्षों में नदी प्रणाली को स्थिर रखने में मदद मिलेगी। एरिजोना के लिए स्थिति इसलिए अधिक कठिन है क्योंकि उसके केंद्रीय एरिजोना परियोजना यानी सेंट्रल एरिजोना प्रोजेक्ट कोलोराडो नदी के पानी पर काफी निर्भर है।
यह नहर प्रणाली फीनिक्स, टक्सन और आसपास के कृषि क्षेत्रों तक पानी पहुंचाती है। पुराने कानूनी समझौतों के तहत कैलिफोर्निया के जल अधिकार एरिजोना की तुलना में अधिक वरिष्ठ हैं। इसलिए जब नदी में पानी की कमी होती है, तो एरिजोना के हिस्से पर पहले असर पड़ता है। राज्य में आशंका है कि सेंट्रल एरिजोना प्रोजेक्ट को मिलने वाली जल आपूर्ति में बड़ी कमी आ सकती है, जिससे कृषि और शहरी जल प्रबंधन दोनों पर दबाव बढ़ेगा।
हालांकि एरिजोना ने पिछले वर्षों में भविष्य के संकट से निपटने के लिए बड़ी मात्रा में पानी भूमिगत जलभृतों में सुरक्षित रखा है। राज्य के अधिकारियों के अनुसार ये भंडार करीब एक वर्ष के आवंटन के बराबर हो सकते हैं। इन जलभृतों का इस्तेमाल तत्काल संकट को संभालने में मदद कर सकता है, लेकिन लंबे समय तक भूजल पर निर्भरता बढ़ने से नए पर्यावरणीय और आर्थिक सवाल भी खड़े होंगे।
कृषि क्षेत्र में किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर जाने या कुछ खेतों को अस्थायी रूप से खाली छोड़ने जैसे कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं। कैलिफोर्निया में पानी की कटौती का प्रभाव मुख्य रूप से इम्पीरियल और कोचेला घाटियों जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्रों तथा दक्षिणी कैलिफोर्निया के बड़े शहरी इलाकों पर पड़ सकता है।
राज्य पहले से ही जल संरक्षण, खेतों में पानी की खपत कम करने और शहरी इलाकों में दक्षता बढ़ाने के कार्यक्रम चला रहा है। आने वाले वर्षों में इन उपायों को और तेज किया जा सकता है। कृषि भूमि को अस्थायी रूप से परती छोड़ना भी पानी बचाने का एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इससे किसानों की आय और खाद्य उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है। नेवादा का मामला अलग है। राज्य का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र लास वेगास लेक मीड पर अत्यधिक निर्भर है। हालांकि उसे मिलने वाले पानी में कटौती की मात्रा कम है, फिर भी राज्य ने लंबे समय से पानी की बचत, पुनर्चक्रण और वैकल्पिक जल स्रोतों पर निवेश किया है।
लास वेगास क्षेत्र में इस्तेमाल किए गए पानी के बड़े हिस्से को उपचारित करके दोबारा जल प्रणाली में भेजने जैसी व्यवस्थाओं ने जल संकट से निपटने में मदद की है। इसके बावजूद नदी में लगातार गिरता प्रवाह भविष्य के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। नई व्यवस्था को 10 वर्षीय व्यापक ढांचे के शुरुआती चरण के रूप में देखा जा रहा है। हर दो साल में परिस्थितियों की समीक्षा की जाएगी और यदि जलाशयों का स्तर और नीचे जाता है तो कटौती बढ़ाई जा सकती है।
गंभीर परिस्थितियों में निचले बेसिन के राज्यों की संयुक्त कटौती सालाना 30 लाख एकड़-फीट तक पहुंच सकती है। यह उनके कुल आवंटन का लगभग 40 प्रतिशत होगा। ऐसी स्थिति में कृषि, शहरी विकास और औद्योगिक गतिविधियों पर कहीं अधिक व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। फैसले की एक बड़ी राजनीतिक और कानूनी चुनौती यह है कि ऊपरी बेसिन के राज्य, जिनमें कोलोराडो, यूटा, वायोमिंग और न्यू मैक्सिको शामिल हैं, मौजूदा व्यवस्था के तहत अनिवार्य कटौती से largely बाहर हैं।
निचले बेसिन के राज्यों में इसे लेकर असंतोष है। एरिजोना ने संकेत दिया है कि यदि भविष्य में उस पर और अधिक भार डाला गया और ऊपरी बेसिन के राज्यों ने अतिरिक्त योगदान नहीं किया, तो वह कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपना सकता है। दूसरी ओर ऊपरी बेसिन के राज्यों का तर्क है कि वे पहले से अपने पूर्ण जल अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और कम बर्फबारी तथा घटते जल प्रवाह का सामना स्वयं भी कर रहे हैं। मेक्सिको और आदिवासी समुदाय भी इस फैसले से प्रभावित होने वाले प्रमुख पक्ष हैं।
कोलोराडो नदी से जुड़े पुराने समझौतों और संधियों के तहत मेक्सिको को मिलने वाली जल आपूर्ति में भी परिस्थितियों के अनुसार कमी आ सकती है। वहीं कई आदिवासी समुदायों के पास वरिष्ठ जल अधिकार हैं, इसलिए नदी के भविष्य को लेकर उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जल अधिकारों, संरक्षण और वितरण को लेकर कानूनी विवाद और राजनीतिक बातचीत दोनों तेज हो सकते हैं। यह फैसला उन पुराने नियमों की जगह ले रहा है जो 2007 में तैयार किए गए थे और बाद में अंतरिम समझौतों के जरिए उनमें बदलाव किए गए थे। उन व्यवस्थाओं के बावजूद जलाशयों का स्तर लगातार गिरता रहा। यही वजह है कि अब संघीय सरकार और राज्यों के सामने स्वैच्छिक जल संरक्षण से आगे बढ़कर अनिवार्य कटौती लागू करने की स्थिति पैदा हुई है।
विशेषज्ञों और पर्यावरण संगठनों का कहना है कि यह कदम जरूरी है, लेकिन इसे अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। यदि अगले दो साल भी असामान्य रूप से सूखे रहे तो जलाशयों में बचा हुआ भंडार तेजी से कम हो सकता है। लेक पॉवेल का जलस्तर इतना नीचे जा सकता है कि ग्लेन कैन्यन बांध पर जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो।
ऐसी स्थिति में केवल पानी की आपूर्ति ही नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन और क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है। कोलोराडो नदी का मौजूदा संकट यह भी दिखाता है कि करीब एक सदी पहले तैयार किए गए जल आवंटन अनुमान बदलती जलवायु और घटते नदी प्रवाह की वास्तविकता के सामने कितने चुनौतीपूर्ण हो गए हैं।
आने वाले वर्षों में राज्यों को पानी की मांग घटाने, कृषि पद्धतियों में बदलाव, शहरी जल दक्षता बढ़ाने, अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने पर अधिक जोर देना होगा। अगले दो वर्ष इस पूरे क्षेत्र के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। यदि जल संरक्षण और बेहतर मानसूनी-बर्फबारी परिस्थितियां जलाशयों को कुछ राहत देती हैं तो मौजूदा कटौती प्रणाली को स्थिरता मिल सकती है।
लेकिन यदि सूखा जारी रहा, तो 2028 के बाद और अधिक कठोर कटौतियों की संभावना बढ़ जाएगी। करोड़ों लोगों, लाखों एकड़ कृषि भूमि और विशाल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए कोलोराडो नदी का भविष्य अब केवल सरकारी आदेशों पर निर्भर नहीं है। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि राज्य, किसान, शहर, आदिवासी समुदाय और आम उपभोक्ता सीमित होते जल संसाधन को साझा करने और उसकी खपत कम करने के लिए कितनी दूर तक साथ आने को तैयार हैं।
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