पृथ्वी की सुरक्षा के लिए बड़े नीतिगत फैसलों के साथ-साथ नागरिकों की व्यक्तिगत भागीदारी और छोटी-छोटी आदतें बेहद महत्वपूर्ण हैं। बिजली, परिवहन, खानपान, प्लास्टिक उपयोग और डिजिटल गतिविधियों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को दैनिक जीवन में बदलाव करके घटाया जा सकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। हर साल 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी की सुरक्षा केवल सरकारों, वैज्ञानिकों या बड़ी कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं है।
हमारी रोजमर्रा की आदतें भी पर्यावरण पर सीधा असर डालती हैं। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से दोहन और ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन आज पूरी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती हैं।
ऐसे में जीवनशैली में किए गए छोटे और व्यावहारिक बदलाव पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कार्बन फुटप्रिंट से आशय किसी व्यक्ति, परिवार, संस्था या गतिविधि के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से है।
इसमें घर में इस्तेमाल होने वाली बिजली, निजी वाहनों से यात्रा, खानपान, खरीदारी, वस्तुओं का उत्पादन और कचरे का निपटान जैसी कई गतिविधियां शामिल होती हैं। इसलिए कार्बन फुटप्रिंट कम करने की शुरुआत हमारे अपने घर और दिनचर्या से हो सकती है।
सबसे आसान बदलाव परिवहन के क्षेत्र में किया जा सकता है। यदि दूरी कम है तो कार या बाइक निकालने के बजाय पैदल चलना या साइकिल का इस्तेमाल बेहतर विकल्प है। लंबी दूरी के लिए बस, मेट्रो और ट्रेन जैसे सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देने से एक ही यात्रा में कई लोगों का परिवहन संभव होता है और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम किया जा सकता है। जहां सार्वजनिक परिवहन सुविधाजनक न हो, वहां कारपूलिंग अपनाना भी उपयोगी कदम है।
भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल बढ़ाना भी परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकता है। घर में बिजली की खपत पर ध्यान देकर भी पर्यावरण के लिए योगदान दिया जा सकता है। कमरे से बाहर निकलते समय लाइट, पंखे और अन्य उपकरण बंद करना एक साधारण लेकिन प्रभावी आदत है।
पारंपरिक बल्बों की जगह एलईडी लाइट का इस्तेमाल बिजली की खपत कम करने में मदद करता है। एयर कंडीशनर का तापमान जरूरत के अनुसार रखना, दरवाजे-खिड़कियां ठीक से बंद रखना और ऊर्जा दक्ष उपकरणों को प्राथमिकता देना भी बिजली की बचत कर सकता है।
बिजली की हर बची हुई यूनिट का अर्थ ऊर्जा संसाधनों पर थोड़ा कम दबाव है। हमारी खाने की थाली का भी पर्यावरण से गहरा संबंध है। स्थानीय और मौसमी खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देने से लंबी दूरी तक भोजन के परिवहन और भंडारण से जुड़ी ऊर्जा जरूरतें कम हो सकती हैं।
अत्यधिक पैकेजिंग वाले उत्पादों का इस्तेमाल घटाना भी बेहतर विकल्प है। भोजन की बर्बादी रोकना विशेष रूप से जरूरी है, क्योंकि भोजन को उगाने, संसाधित करने, पैक करने और बाजार तक पहुंचाने में पानी और ऊर्जा दोनों खर्च होते हैं। संतुलित आहार में पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी बढ़ाना और अत्यधिक मांसाहार को कम करना भी पर्यावरणीय दबाव घटाने में मदद कर सकता है।
पानी की बचत को भी जलवायु कार्रवाई का हिस्सा समझना चाहिए। नल को अनावश्यक रूप से खुला छोड़ने से बचना, रिसाव को तुरंत ठीक कराना, जरूरत के अनुसार पानी इस्तेमाल करना और जहां संभव हो वर्षा जल के संरक्षण तथा पुन: उपयोग की व्यवस्था करना उपयोगी कदम हैं। पानी को साफ करने, पंप करने और घरों तक पहुंचाने में भी ऊर्जा खर्च होती है, इसलिए पानी बचाने का अर्थ अप्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा बचाना भी है।
प्लास्टिक के अनावश्यक इस्तेमाल को कम करना एक और महत्वपूर्ण आदत हो सकती है। खरीदारी के दौरान पुन: इस्तेमाल होने वाले बैग रखना, एक बार इस्तेमाल होने वाली बोतलों और अन्य डिस्पोजेबल वस्तुओं से बचना तथा टिकाऊ उत्पादों को प्राथमिकता देना कचरे को कम करने में मदद करता है।
घर में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में रखना और पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को उचित तरीके से भेजना भी संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में कदम है। कपड़ों और दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में भी जरूरत और उपयोगिता को प्राथमिकता देना जरूरी है।
केवल फैशन या आकर्षक ऑफर के कारण बार-बार खरीदारी करने के बजाय लंबे समय तक इस्तेमाल होने वाले उत्पाद चुनना बेहतर है। पुराने कपड़ों और उपयोगी वस्तुओं को दोबारा इस्तेमाल करना, मरम्मत कराना या जरूरतमंदों को देना उनके जीवनचक्र को बढ़ा सकता है और नए संसाधनों की मांग को कम कर सकता है।
डिजिटल जीवनशैली भी पूरी तरह पर्यावरण-मुक्त नहीं है। डेटा सेंटर, नेटवर्क और डिजिटल सेवाओं को चलाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसलिए अनावश्यक ईमेल, बड़े फाइलों की बेवजह कॉपी, अप्रयुक्त क्लाउड डेटा और अनावश्यक डिजिटल सामग्री को समय-समय पर हटाना एक छोटी लेकिन उपयोगी आदत हो सकती है।
हालांकि इसका प्रभाव व्यक्तिगत स्तर पर सीमित हो सकता है, लेकिन करोड़ों लोगों की ऐसी आदतें मिलकर संसाधनों की मांग पर असर डाल सकती हैं। पेड़ लगाना और मौजूदा हरित क्षेत्रों की रक्षा करना भी जरूरी है। पौधारोपण केवल एक दिन की गतिविधि न रहकर उनकी देखभाल और संरक्षण से जुड़ा होना चाहिए। घर, स्कूल, कार्यालय और आसपास उपलब्ध स्थानों पर स्थानीय प्रजातियों के पौधों को बढ़ावा देना जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए उपयोगी हो सकता है।
साथ ही पेड़ों, wetlands, नदियों और प्राकृतिक क्षेत्रों को बचाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना नए पौधे लगाना। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली का मतलब अचानक बहुत बड़े बदलाव करना नहीं है। रोजमर्रा के छोटे फैसले धीरे-धीरे आदतों में बदल सकते हैं।
निजी वाहन की जगह कभी-कभी सार्वजनिक परिवहन चुनना, जरूरत न होने पर बिजली बंद करना, भोजन बर्बाद न करना, पानी बचाना, प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाना और चीजों को दोबारा इस्तेमाल करना ऐसे कदम हैं जिन्हें अधिकांश लोग अपनी क्षमता के अनुसार अपना सकते हैं। एक व्यक्ति के प्रयास से दुनिया का जलवायु संकट खत्म नहीं होगा, लेकिन करोड़ों लोगों की समान सोच और लगातार किए गए छोटे प्रयास बड़ा प्रभाव पैदा कर सकते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस का संदेश भी इसी सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।
पृथ्वी को सुरक्षित रखने के लिए नीतियों और तकनीकी बदलावों के साथ नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है। आज अपनाई गई पर्यावरण-सम्मत आदतें आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, कम कचरा और अधिक टिकाऊ भविष्य की नींव रख सकती हैं।
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