भारत में ई-वेस्ट मैनेजमेंट एक गंभीर चुनौती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आकलन के मुताबिक 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पंजीकृत ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे में दूसरे राज्यों में ई-कचरा भेजने की जरूरत पड़ती है, जिसकी निगरानी और ट्रैकिंग कई बार प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती। दूसरी ओर, देश का विशाल अनौपचारिक क्षेत्र अभी भी ई-कचरे की पूरी श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) की बढ़ती मात्रा पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। देश दुनिया में ई-वेस्ट पैदा करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में करीब 1.41 से 1.42 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा हुआ, जो पिछले आठ वर्षों में 80 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।
हालांकि हाल के वर्षों में औपचारिक संग्रह और प्रसंस्करण की दर बढ़कर करीब 69-70 प्रतिशत तक पहुंची है, फिर भी लगभग एक-तिहाई ई-कचरा या तो अनुपचारित रह जाता है या फिर अनियमित चैनलों में चला जाता है।
मौजूदा रुझान जारी रहने पर वर्ष 2030 तक ई-कचरे की मात्रा बढ़कर करीब 14 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। भारत में ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए औपचारिक ढांचे का लगातार विस्तार हुआ है। ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) नियम, 2022 और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) व्यवस्था के तहत बड़ी संख्या में अधिकृत रिसाइक्लर और डिस्मेंटलर काम कर रहे हैं। इसके बावजूद देश में रिसाइक्लिंग क्षमता का वितरण समान नहीं है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आकलन के मुताबिक 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पंजीकृत ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे में दूसरे राज्यों में ई-कचरा भेजने की जरूरत पड़ती है, जिसकी निगरानी और ट्रैकिंग कई बार प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती। दूसरी ओर, देश का विशाल अनौपचारिक क्षेत्र अभी भी ई-कचरे की पूरी श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
अनुमान के मुताबिक करीब 4 से 5 लाख लोग इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। दिल्ली के सीलमपुर, उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद तथा महाराष्ट्र और कर्नाटक के कई हिस्से ई-वेस्ट के अनौपचारिक प्रसंस्करण के प्रमुख केंद्रों में शामिल हैं। इन नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकत घर-घर जाकर कचरा एकत्र करना और तेजी से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अलग करना है।
हालांकि अनौपचारिक रिसाइक्लिंग में अपनाई जाने वाली कई प्रक्रियाएं पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हैं। तारों से धातु निकालने के लिए खुले में जलाना, सर्किट बोर्ड से धातु निकालने के लिए एसिड का इस्तेमाल और बिना सुरक्षा उपकरणों के हाथ से इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों को अलग करना आम है। इन प्रक्रियाओं से सोना, तांबा और अन्य उपयोगी पदार्थों का केवल सीमित हिस्सा ही वापस प्राप्त हो पाता है, जबकि सीसा, पारा, कैडमियम और ब्रोमिनयुक्त फ्लेम रिटार्डेंट्स जैसे जहरीले पदार्थ हवा, मिट्टी और जल स्रोतों में पहुंच सकते हैं।
ई-कचरे के बढ़ते संकट का आर्थिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पुराने मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सर्वर, बैटरी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, तांबा, लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्व जैसे मूल्यवान संसाधन मौजूद होते हैं। इन सामग्रियों का कुल आर्थिक मूल्य हर साल हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
आधुनिक तकनीक से इन संसाधनों की कुशलतापूर्वक रिकवरी भारत के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर पैदा कर सकती है। लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र में कम दक्षता वाली तकनीकों के इस्तेमाल और औपचारिक क्षेत्र में उन्नत रिफाइनिंग क्षमता की सीमाओं के कारण इस संभावित आर्थिक मूल्य का बड़ा हिस्सा गंवा दिया जाता है। औपचारिक रिसाइक्लरों के सामने एक और समस्या पर्याप्त ई-वेस्ट की उपलब्धता की है।
अनौपचारिक कलेक्टर अक्सर उपभोक्ताओं और बड़े कचरा उत्पादकों को तत्काल नकद भुगतान की पेशकश करके ई-कचरे को अपने नेटवर्क में खींच लेते हैं। इससे अधिकृत रिसाइक्लिंग इकाइयों को पर्याप्त फीडस्टॉक नहीं मिल पाता। इस पूरी व्यवस्था का स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है।
अनौपचारिक ई-वेस्ट प्रसंस्करण में काम करने वाले श्रमिकों को जहरीले धुएं और रसायनों के संपर्क में आने का जोखिम रहता है। कुछ इलाकों में बच्चे भी इस तरह के काम में शामिल पाए जाते हैं। ई-कचरे को जलाने और एसिड से प्रसंस्करण जैसी गतिविधियों से आसपास के इलाकों की मिट्टी और भूजल में प्रदूषक पहुंच सकते हैं, जिसका असर लंबे समय तक बना रह सकता है। सरकार ने उत्पादकों की जिम्मेदारी बढ़ाने के लिए EPR व्यवस्था को मजबूत किया है। मौजूदा प्रावधानों के तहत उत्पादकों के लिए निर्धारित रिसाइक्लिंग लक्ष्य वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 में 70 प्रतिशत है, जिसे इसके बाद बढ़ाकर 80 प्रतिशत किया जाना है।
इस व्यवस्था से औपचारिक रिसाइक्लिंग और प्रमाणपत्र आधारित प्रणाली को बढ़ावा मिला है, लेकिन निगरानी की कमजोरी, फर्जी या संदिग्ध प्रमाणपत्रों की आशंका, उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी और अनौपचारिक श्रमिकों को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ने की चुनौती अब भी बनी हुई है।
विशेषज्ञों और नीति संबंधी आकलनों में ई-वेस्ट संग्रह नेटवर्क को मजबूत करने, शहरी खनन के लिए आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने, औपचारिक रिसाइक्लरों को बेहतर आर्थिक प्रोत्साहन देने और अनौपचारिक श्रमिकों के लिए औपचारिकरण के रास्ते तैयार करने पर जोर दिया गया है। राज्यों के बीच ई-कचरे के परिवहन और निपटान की बेहतर डिजिटल ट्रैकिंग भी आवश्यक मानी जा रही है।
भारत के लिए ई-वेस्ट केवल कचरा प्रबंधन की समस्या नहीं है। यह महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू उपलब्धता, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण से भी जुड़ा मुद्दा है। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से मूल्यवान धातुओं और खनिजों की अधिकतम रिकवरी भारत को आयात पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक समाधान औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रों को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में देखने के बजाय दोनों को एकीकृत करने में है। अनौपचारिक कलेक्टरों को प्रशिक्षण, पहचान, सुरक्षा उपकरण और अधिकृत रिसाइक्लिंग नेटवर्क से जोड़कर संग्रह की उनकी क्षमता का इस्तेमाल किया जा सकता है।
वहीं उन्नत औपचारिक इकाइयां सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से ई-कचरे से अधिकतम संसाधन निकाल सकती हैं। यदि संग्रह व्यवस्था, निगरानी, प्रवर्तन और रिसाइक्लिंग बुनियादी ढांचे में तेजी से सुधार नहीं किया गया, तो भारत में ई-कचरे का पहाड़ उन प्रणालियों की क्षमता से कहीं अधिक तेजी से बढ़ सकता है जिन्हें इसे संभालने के लिए तैयार किया गया है।
(फोटो-एआई)

