वैश्विक स्तर पर भारत का ऐतिहासिक संचयी CO₂ उत्सर्जन योगदान 4 प्रतिशत से कम है और इसका प्रति व्यक्ति वार्षिक उत्सर्जन (लगभग 2 टन) वैश्विक औसत (4.5 टन) का आधा है। इसके विपरीत, अमेरिका (25%), यूरोप (20%) और चीन (15%) ऐतिहासिक उत्सर्जन में बड़े हिस्सेदार रहे हैं। इसी बीच, नेपाल जैसे कम उत्सर्जन वाले देशों ने जलवायु आपदाओं के बाद ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से सहायता की मांग तेज कर दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में ऐतिहासिक उत्सर्जकों से वित्तीय और तकनीकी सहयोग की मांग पर जोर बढ़ गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल नेपाल द्वारा संयुक्त राष्ट्र के लॉस एंड डैमेज फंड से सहायता की मांग के बीच वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) के ऐतिहासिक संचय में विभिन्न देशों की भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भारत का ऐतिहासिक संचयी CO₂ उत्सर्जन योगदान 4 प्रतिशत से कम रहा है। वहीं भारत का प्रति व्यक्ति वार्षिक उत्सर्जन करीब 2 टन है, जो लगभग 4.5 टन के वैश्विक औसत का करीब आधा है। इसके मुकाबले अमेरिका का वैश्विक संचयी CO₂ उत्सर्जन में हिस्सा करीब 25 प्रतिशत, यूरोप का लगभग 20 प्रतिशत और चीन का करीब 15 प्रतिशत है।
औद्योगिक युग की शुरुआत लगभग 1850 से मानी जाती है और तब से वातावरण में जमा हुए उत्सर्जन में विकसित अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ, की बड़ी हिस्सेदारी रही है। नेपाल, जिसका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वैश्विक स्तर पर बेहद कम है, विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बाद औपचारिक रूप से लॉस एंड डैमेज फंड से सहायता की मांग कर चुका है।
इन बाढ़ों में 1,000 से अधिक लोगों की मौत हुई तथा कई गांवों, पुलों और सड़कों को भारी नुकसान पहुंचा। नेपाली अधिकारियों का तर्क है कि देश ऐसे जलवायु संकट की कीमत चुका रहा है, जिसे पैदा करने में उसकी भूमिका नगण्य रही है। उन्होंने ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और ग्लोबल वार्मिंग से जुड़े चरम मौसम की घटनाओं को भी इसका कारण बताया है।
लॉस एंड डैमेज फंड पर सहमति मिस्र में आयोजित COP27 में बनी थी और दुबई में COP28 के दौरान इसे संचालित किया गया। इसका उद्देश्य कम आय वाले विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अपरिवर्तनीय प्रभावों से निपटने में सहायता देना है। इसमें देशों का योगदान स्वैच्छिक है। अब तक करीब 822 मिलियन डॉलर की राशि देने का वादा किया गया है, जबकि लगभग 350 मिलियन डॉलर वितरण के लिए उपलब्ध हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु पर दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन केवल मौजूदा वार्षिक उत्सर्जन से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संचयी उत्सर्जन से भी होता है। इसी वजह से भारत के अपेक्षाकृत कम ऐतिहासिक और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन आंकड़े अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में महत्वपूर्ण बने हुए हैं। विकासशील देश ऐतिहासिक रूप से बड़े उत्सर्जकों से जलवायु क्षति से निपटने के लिए अधिक वित्तीय और तकनीकी सहयोग की मांग करते रहे हैं।
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