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Environment Pulse > ईको सिस्टम > गतिविधियां > भारत में विदेशी प्रजातियों की बढ़ती आमद के बीच प्राइमेट्स के कल्याण और स्वास्थ्य जोखिमों पर चिंता
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गतिविधियांजंगल

भारत में विदेशी प्रजातियों की बढ़ती आमद के बीच प्राइमेट्स के कल्याण और स्वास्थ्य जोखिमों पर चिंता

Environment Pulse
Last updated: September 19, 2026 9:09 pm
Environment Pulse
Published: September 19, 2026
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भारत में विदेशी वन्यजीवों, विशेषकर ओरंगुटान और गिब्बन जैसे संकटग्रस्त प्राइमेट्स की बढ़ती तस्करी से पशु कल्याण, कानूनी खामियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। हाल ही में ओडिशा के बालासोर में लावारिस मिले पांच शिशु ओरंगुटान इस अवैध व्यापार का बड़ा उदाहरण हैं। 2024 में 42.6 करोड़ डॉलर का यह विदेशी पालतू पशु बाजार 2030 तक 76 करोड़ डॉलर तक पहुँच सकता है। निजी कैद में इन जीवों को रखना कठिन है और तस्करी के दौरान बड़ी संख्या में जानवरों की मौत हो जाती है। साथ ही, यह व्यापार जूनोटिक बीमारियों (जैसे टीबी और हर्पीस) का खतरा भी बढ़ाता है। विशेषज्ञों ने कड़े राष्ट्रीय नियमों, डिजिटल बिक्री पर रोक, और बेहतर क्वारंटीन व्यवस्था की मांग की है ताकि वन्यजीव कल्याण और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत में विदेशी वन्यजीवों की आमद बढ़ने के साथ पशु कल्याण, नियामकीय खामियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। इनमें गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्राइमेट्स, जैसे ओरंगुटान और गिब्बन, भी शामिल हैं।

हाल की घटनाओं ने विदेशी पालतू जानवरों के बढ़ते कारोबार और इससे जुड़े जोखिमों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सितंबर 2026 की शुरुआत में ओडिशा के बालासोर के एक वन क्षेत्र में पांच शिशु ओरंगुटान लावारिस हालत में मिले।

माना जा रहा है कि इनका दक्षिण-पूर्व एशिया से अवैध तरीके से व्यापार किया गया था। फिलहाल इन्हें नंदनकानन चिड़ियाघर में रखा गया है, जबकि इंडोनेशिया ने इनकी स्वदेश वापसी की मांग की है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामले विदेशी पालतू जानवरों की मांग से संचालित अवैध वन्यजीव व्यापार के विस्तार को दर्शाते हैं। दुर्लभ प्रजातियों को कई बार संपन्न खरीदारों द्वारा स्टेटस सिंबल के रूप में रखा जाता है और सोशल मीडिया पर प्रदर्शित किया जाता है।

जून 2026 में ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया और वन्यजीव व्यापार शोधकर्ता कृतिका बालाजी की रिपोर्ट ‘Safeguarding Biodiversity and Public Health: A Legislative and Policy Analysis of Exotic Pet Trade in India’ में भारत के विदेशी पालतू पशु बाजार से जुड़ी स्थिति का विश्लेषण किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत का विदेशी पालतू पशु बाजार लगभग 42.6 करोड़ डॉलर का था और 2030 तक इसके करीब 76 करोड़ डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। 2021 की स्वैच्छिक घोषणा योजना के तहत निजी हाथों में 40,000 से अधिक विदेशी जानवर दर्ज किए गए थे, हालांकि विशेषज्ञ इसे वास्तविक संख्या से काफी कम मानते हैं।

प्राइमेट्स के मामले में पशु कल्याण संबंधी चिंताएं विशेष रूप से गंभीर हैं। गिब्बन, ओरंगुटान और अन्य गैर-मानव प्राइमेट्स की सामाजिक, व्यवहारिक और पर्यावरणीय जरूरतें जटिल होती हैं, जिन्हें निजी कैद में पूरा करना मुश्किल हो सकता है।

संरक्षण विशेषज्ञों के मुताबिक पकड़ने, परिवहन और कैद के दौरान बड़ी संख्या में जानवरों की मौत हो जाती है। कुछ अनुमानों के अनुसार, खरीदार तक पहुंचने वाले प्रत्येक एक जानवर के लिए तीन अन्य जानवरों की मौत हो सकती है। विदेशी जानवरों को अक्सर छोटे और अस्वच्छ स्थानों में रखा जाता है, जिससे उनमें तनाव, बीमारियां और समय से पहले मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा भारतीय कानूनों में अधिकांश विदेशी पालतू प्रजातियों के लिए बाध्यकारी और प्रजाति-विशिष्ट कल्याण मानक मौजूद नहीं हैं। यह व्यापार जूनोटिक बीमारियों का जोखिम भी बढ़ाता है। प्राइमेट्स टीबी और हर्पीस वायरस सहित कई रोगजनकों के वाहक हो सकते हैं, जिनमें से कुछ मनुष्यों में फैल सकते हैं।

वहीं, विदेशी पालतू व्यापार में शामिल सरीसृप और पक्षी साल्मोनेला जैसे रोगजनकों को भी फैला सकते हैं। भारत में आयात के बाद विदेशी वन्यजीवों की बीमारियों की निगरानी के लिए अभी व्यापक व्यवस्था का अभाव बताया गया है। नियामकीय व्यवस्था भी लगातार बढ़ते व्यापार के अनुरूप चुनौतियों का सामना कर रही है।

वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 के तहत CITES में सूचीबद्ध विदेशी प्रजातियों को घरेलू नियमन के दायरे में लाया गया और PARIVESH पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण की व्यवस्था शुरू की गई। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार इसका क्रियान्वयन अभी भी विभिन्न स्तरों पर असमान है। गैर-CITES प्रजातियों पर नियंत्रण अपेक्षाकृत कमजोर है, जबकि ऑनलाइन मार्केटप्लेस और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप अवैध बिक्री को आसान बना रहे हैं।

तस्करी के लिए म्यांमार और बांग्लादेश से होकर भारत के पूर्वोत्तर हिस्सों तक पहुंचने वाले जमीनी मार्गों के अलावा मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे प्रमुख हवाई अड्डों का भी इस्तेमाल किए जाने की जानकारी सामने आई है। हाल के वर्षों में गिब्बन, सरीसृप और अन्य विदेशी प्रजातियों की जब्ती के मामले बढ़े हैं।

वन्यजीव संगठनों और शोधकर्ताओं ने विदेशी पालतू जानवरों के लिए राष्ट्रीय नियामकीय ढांचे, डिजिटल बिक्री की कड़ी निगरानी, बेहतर क्वारंटीन सुविधाओं, अवांछित विदेशी जानवरों के लिए राष्ट्रीय सरेंडर नीति और भारत के One Health Mission में विदेशी वन्यजीवों से जुड़े जोखिमों को शामिल करने की मांग की है। अधिकारियों के सामने चुनौती यह है कि संरक्षण के उद्देश्य से होने वाले वैध आयात और अवैध निजी व्यापार के बीच अंतर करते हुए वन्यजीव कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पारिस्थितिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

विदेशी प्रजातियों की मांग बढ़ने के साथ अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि भारत उनके व्यापार और निजी स्वामित्व से जुड़े दीर्घकालिक प्रभावों से निपटने के लिए कितना तैयार है।

Also Read: भारत में चीता आबादी बढ़कर 52 हुई, देश में जन्मे चीतों की संख्या 32

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