31 जुलाई 2026 तक भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन (Non-fossil fuel) आधारित स्थापित बिजली क्षमता 300.50 गीगावाट (GW) पार कर चुकी है, जो 2030 तक तय 500 GW के लक्ष्य का लगभग 60% है। सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा (164.59 GW) का रहा है, जो 2014 के 2.8 GW से कई गुना ज्यादा है। इसके अलावा पवन ऊर्जा (58.14 GW), जल-विद्युत (57.24 GW), बायो-पावर (11.75 GW) और परमाणु ऊर्जा (8.78 GW) का योगदान शामिल है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता में एक बड़ा पड़ाव पार कर लिया है। यह उपलब्धि देश के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
आखिर यह आंकड़ा कितना बड़ा है, सौर ऊर्जा की इसमें क्या भूमिका है, और 2035 के लिए भारत ने खुद से क्या नए वादे किए हैं—आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
क्यों है यह खबर अहम
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक 31 जुलाई 2026 तक भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 300 गीगावाट के आंकड़े को पार कर चुकी है।
यह 2030 तक तय किए गए 500 गीगावाट के लक्ष्य का करीब 60% हिस्सा है। यानी देश अपने तय समय से पहले ही इस लक्ष्य के आधे से ज्यादा रास्ते तक पहुंच चुका है।
किन स्रोतों से मिला यह आंकड़ा
31 जुलाई 2026 तक दर्ज की गई कुल 300.50 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता में सौर, पवन, जल-विद्युत, बायो-पावर और परमाणु ऊर्जा—सभी स्रोत शामिल हैं। इनमें सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा का रहा है, जिसने भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा की अगुवाई की है। देश की स्थापित सौर क्षमता अब बढ़कर 164.59 गीगावाट हो चुकी है, जबकि 2014 में यह महज 2.8 गीगावाट थी।
इस बड़ी छलांग ने सौर ऊर्जा को देश की गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता का सबसे बड़ा हिस्सा बना दिया है। पवन ऊर्जा में भी अच्छी-खासी बढ़त देखी गई है। स्थापित पवन क्षमता अब 58.14 गीगावाट तक पहुंच गई है, जो 2014 में करीब 21 गीगावाट थी। बाकी योगदान की बात करें तो फिलहाल जल-विद्युत से 57.24 गीगावाट, बायो-पावर से 11.75 गीगावाट और परमाणु ऊर्जा से 8.78 गीगावाट क्षमता मिल रही है। इन सभी स्रोतों को मिलाकर ही भारत 300 गीगावाट के इस आंकड़े तक पहुंच पाया है।
यह उपलब्धि कई मोर्चों पर हुई प्रगति का नतीजा है—सौर क्षमता में तेज बढ़ोतरी, पवन ऊर्जा उत्पादन में विस्तार, हर साल जुड़ने वाली रिकॉर्ड क्षमता, अक्षय ऊर्जा से बिजली उत्पादन में इजाफा, और घरेलू विनिर्माण का बढ़ता दायरा। 2035 के लिए भारत के नए जलवायु लक्ष्य 2015 के पेरिस समझौते के तहत हर देश को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपने-अपने कदम तय करने होते हैं, जिन्हें “राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान” (एनडीसी) कहा जाता है।
यह इस बात को रेखांकित करता है कि हर देश अपनी जलवायु कार्रवाई की प्रकृति और दायरा खुद तय करता है। इसी साल 25 मार्च को भारत ने 2035 के लिए अपने संशोधित एनडीसी जारी किए। पेरिस समझौते के तहत अनिवार्य शर्त के मुताबिक, ये नए लक्ष्य 2030 के लिए तय मौजूदा वादों से आगे के हैं।
भारत ने कहा है कि 2035 तक उसकी स्थापित बिजली क्षमता का कम से कम 60% हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से आएगा, जबकि 2030 के लिए यह लक्ष्य 50% रखा गया था। इसके अलावा भारत ने उत्सर्जन तीव्रता में—यानी सकल घरेलू उत्पाद की प्रति इकाई होने वाले उत्सर्जन में—2005 के स्तर की तुलना में कम से कम 47% कमी लाने का वादा किया है, जो 2030 के लिए तय मौजूदा 45% के लक्ष्य से दो प्रतिशत अंक ज्यादा है।
साथ ही भारत ने यह भी वादा किया है कि वह इतना कार्बन सिंक तैयार करेगा जो 2005 में मौजूद कार्बन सिंक से कम से कम 3.5 से 4 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड-समतुल्य ज्यादा हो।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता क्या है
हाल ही में केंद्र सरकार ने लौह और इस्पात जैसे भारी उद्योगों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता (जीईआई) के लक्ष्य तय करने और इन्हें भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (सीसीटीएस) से जोड़ने के लिए एक मसौदा अधिसूचना जारी की है। सरल शब्दों में, जीईआई का मतलब है किसी उत्पाद की एक इकाई बनाने में कितनी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित होती है—जैसे सीमेंट बनाने के दौरान कितनी गैस निकलती है।
ग्रीनहाउस गैसें वे गैसें हैं जो वातावरण में गर्मी को रोक लेती हैं और पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ाने वाले “ग्रीनहाउस प्रभाव” का कारण बनती हैं।
वायुमंडल में सबसे ज्यादा मात्रा में पाई जाने वाली पांच ग्रीनहाउस गैसें हैं—जलवाष्प, कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और ओजोन। इनके अलावा क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (एचसीएफसी) जैसी कृत्रिम फ्लोरीनयुक्त गैसें भी इसी श्रेणी में आती हैं।
उद्योगों के लिए अलग-अलग लक्ष्य तय करना भारत के जलवायु लक्ष्यों को पाने के लिहाज से बेहद जरूरी है। इसका अंतिम मकसद यही है कि उद्योग ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को घटाकर, हटाकर या टालकर धीरे-धीरे कम-कार्बन वाली विकास राह पर आगे बढ़ें। असली चुनौती: ऊर्जा भंडारण जैसे-जैसे भारत अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अक्षय ऊर्जा क्षमता तेजी से बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे बिजली व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती उभर रही है—कुछ घंटों में बिजली की भरमार हो जाती है, तो कुछ घंटों में इसकी भारी कमी महसूस होती है।
बिजली उत्पादन और उसकी जरूरत के समय के बीच यह बेमेल एक बड़ी समस्या है। यहीं पर ऐसी प्रणालियां जरूरी हो जाती हैं जो ऊर्जा को “स्टोर” कर सकें—और यही वह क्षेत्र है जहां भारत अभी तक पीछे रहा है। ऊर्जा भंडारण प्रणालियां असल में उन प्रणालियों को कहते हैं जो ज्यादा उत्पादन के समय अतिरिक्त अक्षय बिजली को जमा कर लेती हैं, और जब मांग बढ़ती है लेकिन उत्पादन कम रहता है, तब इसे छोड़ती हैं। मूल रूप से ये प्रणालियां सौर और पवन जैसे स्रोतों से मिलने वाली बिजली को, जब वह उपलब्ध होती है, किसी संग्रहित करने लायक रूप में बदल देती हैं।
जरूरत पड़ने पर इसे वापस बिजली में बदल दिया जाता है। दुनियाभर में इस तरह की कई ऊर्जा भंडारण तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है।
इनमें से कुछ प्रमुख तकनीकें इस प्रकार हैं।
पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज (पीएचएस): इसमें अतिरिक्त बिजली का इस्तेमाल कर पानी को नीचे के जलाशय से ऊपर के जलाशय में पंप किया जाता है। जब बिजली की मांग बढ़ती है, तो इसी पानी को टरबाइनों के जरिए नीचे छोड़कर बिजली बनाई जाती है।
बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (बीईएसएस): यह तकनीक बिजली को रासायनिक रूप में संग्रहित करती है और जरूरत पड़ने पर छोड़ती है। लिथियम-आयन बैटरियां, खासतौर पर लिथियम आयरन फॉस्फेट (एलएफपी) बैटरियां, अपनी घटती लागत, ज्यादा दक्षता और लंबी उम्र के चलते फिलहाल बड़े पैमाने पर ग्रिड-स्तरीय भंडारण के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रही हैं।
कंसंट्रेटिंग सोलर-थर्मल स्टोरेज सिस्टम: इसमें दर्पणों के जरिए सूर्य की रोशनी को एक रिसीवर पर केंद्रित किया जाता है। रिसीवर गर्म होने पर इसमें मौजूद पिघले हुए नमक जैसी सामग्री गर्मी को सोख लेती है। बाद में इस संग्रहित गर्मी से भाप बनाई जाती है, जो टरबाइन में यांत्रिक ऊर्जा में बदलकर जनरेटर के जरिए बिजली पैदा करती है।
कंप्रेस्ड-एयर ऊर्जा भंडारण प्रणाली: इसमें अतिरिक्त बिजली का इस्तेमाल कर हवा को दबाव में जमीन के नीचे बनी गुफाओं या टैंकों में संग्रहित किया जाता है। जब बिजली की मांग बढ़ती है, तो इसी दबाव वाली हवा को छोड़कर टरबाइन चलाई जाती हैं और बिजली बनाई जाती है।
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