भारत में बाघ संरक्षण की सफलता के चलते 30-40 प्रतिशत बाघ (लगभग 1,100 से अधिक) अब 58 अधिसूचित टाइगर रिजर्व की सीमाओं से बाहर, वन प्रभागों और वन्यजीव गलियारों में निवास कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप मानव-बाघ संघर्ष और रिजर्व के बाहर बाघों की मौत के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। इस बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए पर्यावरण मंत्रालय और NTCA ने ‘Tigers Outside Tiger Reserves’ (TOTR) नामक नई पहल शुरू की है, जिसके तहत 9 राज्यों के 40 वन प्रभागों में निगरानी और समुदाय आधारित संरक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, कम प्रदर्शन वाले 25 रिजर्वों में सुधार और बाघ गलियारों की सुरक्षा पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि बढ़ती बाघ आबादी और इंसानों के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व सुनिश्चित किया जा सके।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत में बाघ संरक्षण की सफलता अब एक नए और जटिल दौर में प्रवेश कर रही है। वर्ष 2022 की अखिल भारतीय बाघ आकलन रिपोर्ट में देश में अनुमानित 3,682 जंगली बाघ दर्ज किए गए थे, जो दुनिया की कुल बाघ आबादी का लगभग 70 प्रतिशत है।
इनमें अब बड़ी संख्या ऐसे क्षेत्रों में रह रही है या फैल रही है, जो देश के 58 अधिसूचित टाइगर रिजर्व की सीमाओं से बाहर हैं।
अधिकारियों और वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक बाघों की करीब 30–40 प्रतिशत आबादी, यानी 1,100 से अधिक बाघ, वर्तमान में वन प्रभागों, वन्यजीव गलियारों और बहुउपयोगी परिदृश्यों में रिजर्व से बाहर मौजूद हैं। यह स्थिति भारत की पारंपरिक रिजर्व-केंद्रित संरक्षण व्यवस्था में बदलाव की जरूरत को सामने ला रही है। वर्ष 1973 में शुरू हुए प्रोजेक्ट टाइगर ने बाघ संरक्षण को संरक्षित क्षेत्रों के इर्द-गिर्द मजबूत आधार दिया था, लेकिन अब अकेले रिजर्व आधारित मॉडल पर्याप्त नहीं माना जा रहा।
कॉर्बेट, रणथंभौर, ताडोबा, कान्हा और बांधवगढ़ जैसे अधिक घनत्व वाले रिजर्वों में बाघों की संख्या कई स्थानों पर पारिस्थितिक वहन क्षमता के करीब या उससे ऊपर पहुंच रही है।
ऐसे में युवा अथवा अधीनस्थ बाघ नए क्षेत्र और अपने लिए उपयुक्त क्षेत्र की तलाश में रिजर्व से बाहर निकल रहे हैं। इसके विपरीत, करीब 25 टाइगर रिजर्व में पांच या उससे कम बाघ हैं और कई रिजर्व लगभग खाली हैं।
इससे देश के विभिन्न बाघ परिदृश्यों में आबादी के असमान वितरण की तस्वीर सामने आती है।
बढ़ रहा मानव-बाघ संघर्ष
बाघों के नए क्षेत्रों में फैलाव के साथ इंसानों के साथ मुठभेड़ भी बढ़ी है। वर्ष 2014–19 के दौरान बाघ हमलों में 225 मानव मौतों के मुकाबले 2020–25 में यह संख्या बढ़कर 418 हो गई। कई ऐसे सीमावर्ती गांव, जहां दशकों से बाघ हमले की कोई घटना दर्ज नहीं हुई थी, अब मवेशियों के शिकार और कुछ मामलों में मानव मृत्यु की घटनाओं का सामना कर रहे हैं।
कर्नाटक, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के वन विभागों ने बाघों को पकड़ने और स्थानांतरित करने की कार्रवाई तेज की है। सितंबर 2025 से मई 2026 के बीच अकेले कर्नाटक में 30 बाघों को पकड़ा गया।
इनमें से अधिकांश को बाद में जंगल में छोड़ा गया। हालांकि, इस तरह के हस्तक्षेपों की बढ़ती संख्या मानव-बाघ संघर्ष के बढ़ते दबाव को दर्शाती है। बाघों की मृत्यु के आंकड़े भी रिजर्व से बाहर बढ़ती मौजूदगी की ओर संकेत करते हैं। वर्ष 2025 में 166 बाघों की मौत दर्ज की गई, जो पांच वर्षों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या थी। इनमें करीब 60 प्रतिशत मौतें संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हुईं। अधिकांश मौतों का कारण क्षेत्रीय संघर्ष जैसी प्राकृतिक घटनाएं रही, लेकिन रिजर्व से बाहर इतनी बड़ी संख्या में मौतें संघर्ष, सड़क या रेल दुर्घटनाओं और संभावित शिकार जैसे जोखिमों के प्रति बाघों की बढ़ती संवेदनशीलता को रेखांकित करती हैं।
‘टाइगर्स आउटसाइड टाइगर रिजर्व’ पहल बदलती परिस्थितियों के बीच पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने Tigers Outside Tiger Reserves (TOTR) पहल शुरू की है।
इसका उद्देश्य रिजर्व से बाहर रहने वाले बाघों के लिए केवल संकट पैदा होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से निगरानी, संघर्ष प्रबंधन और समुदाय आधारित संरक्षण की व्यवस्था विकसित करना है। इस पहल के दो प्रमुख आधार हैं। पहला, बेहतर निगरानी, त्वरित प्रतिक्रिया दल, उन्नत संचार व्यवस्था और बचाव संबंधी बुनियादी ढांचे के जरिए मानव-बाघ संघर्ष को कम करना।
दूसरा, ऐसे साझा परिदृश्यों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाकर इंसानों और बाघों के बीच सह-अस्तित्व को मजबूत करना। TOTR के पायलट चरण में नौ राज्यों के 40 वन प्रभाग शामिल किए गए हैं। इनमें उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और असम शामिल हैं।
इनका चयन वर्ष 2022 में बाघों की मौजूदगी दर्ज किए गए 212 वन प्रभागों में से किया गया है। पहले चरण के लिए लगभग 88.70 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। इस पहल में तकनीक आधारित निगरानी, बाघ गलियारों की सुरक्षा और स्थानीय लोगों की भागीदारी पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य केवल टाइगर रिजर्व की सीमाओं का विस्तार करना नहीं, बल्कि उन पूरे परिदृश्यों का प्रबंधन करना है जहां बाघ और इंसान एक-दूसरे के करीब रहते हैं।
कम प्रदर्शन वाले रिजर्वों पर भी ध्यान TOTR के साथ NTCA ने “Road Map on Active Management of Tigers in India” भी जारी किया है। इसमें 25 अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन वाले टाइगर रिजर्वों में आवास और शिकार-आधार को मजबूत करने को प्राथमिकता दी गई है। जहां परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां वैज्ञानिक आधार पर बाघों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन पर भी विचार किया जा रहा है।
सरिस्का और पन्ना में बाघ पुनर्स्थापन के अनुभवों से सीख लेने के साथ-साथ सतकोसिया जैसे पूर्व प्रयासों की चुनौतियों को भी ध्यान में रखा जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक किसी भी स्थानांतरण अभियान से पहले स्थानीय समुदाय की सहमति और पर्याप्त शिकार-आधार का वैज्ञानिक आकलन जरूरी है।
बाघ गलियारों की सुरक्षा बनी अहम चुनौती विशेषज्ञों के अनुसार भारत की बाघ संरक्षण रणनीति की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाघों के आवागमन वाले प्राकृतिक गलियारों को कितना सुरक्षित और जुड़ा हुआ रखा जाता है। सड़क, रेलवे, खनन और कृषि विस्तार से कई महत्वपूर्ण बाघ गलियारों पर दबाव बढ़ रहा है।
इन गलियारों का संरक्षण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके जरिए बाघ सुरक्षित रूप से नए क्षेत्रों में पहुंच सकते हैं और अलग-अलग आबादियों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान बना रह सकता है। इसलिए भूमि उपयोग की योजना में वन्यजीवों की जरूरतों को शामिल करने वाली लैंडस्केप-स्तरीय योजना अब संरक्षण नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है।
2027 में मिलेगी नई तस्वीर देश में अखिल भारतीय बाघ आकलन के छठे चक्र (2025–26) का काम जारी है और इसके परिणाम 2027 में आने की उम्मीद है। इससे बाघों की कुल संख्या के साथ-साथ रिजर्व से बाहर उनकी वास्तविक मौजूदगी और वितरण की अधिक स्पष्ट तस्वीर मिलने की संभावना है।
शुरुआती संकेतों में बाघों की संख्या में वृद्धि जारी रहने की बात सामने आ रही है और इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा कोर संरक्षित क्षेत्रों के बाहर देखा जा रहा है। भारत की बाघ संरक्षण यात्रा वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण सफलता मानी जाती है।
अब चुनौती यह है कि बढ़ती बाघ आबादी नए जोखिमों में न बदले—न जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए और न ही स्वयं बाघों के लिए। रिजर्व की सीमाओं से बाहर भी संरक्षण, निगरानी, गलियारा सुरक्षा और समुदाय आधारित सह-अस्तित्व के उपायों को मजबूत करके भारत ऐसी व्यवस्था विकसित करने की दिशा में बढ़ रहा है, जिसमें बाघ केवल सीमित और अत्यधिक दबाव वाले संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित न रहें, बल्कि जुड़े हुए और बहुउपयोगी प्राकृतिक परिदृश्यों में सुरक्षित रूप से विचरण कर सकें।
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