जर्मनी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1986 के विनाशकारी चेरनोबिल परमाणु हादसे के चार दशक बाद भी मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म रेडियोधर्मी ईंधन कणों ने अपनी मूल क्रिस्टलीय संरचना को काफी हद तक सुरक्षित रखा है। ‘जर्नल ऑफ हैजार्डस मैटेरियल्स’ में प्रकाशित इस शोध में पाया गया कि ये कण रासायनिक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर हैं, जिससे आसपास की मिट्टी और पानी में रेडियोधर्मी पदार्थों के फैलने की गति धीमी रही है; हालाँकि वैज्ञानिको ने स्पष्ट किया है कि ये कण अब भी अत्यधिक रेडियोधर्मी हैं और यह अध्ययन परमाणु प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभावों व पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : वर्ष 1986 में हुए विनाशकारी चेरनोबिल परमाणु हादसे के चार दशक बाद भी वहां की मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म रेडियोधर्मी कण वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण शोध का विषय बने हुए हैं। एक नए अध्ययन में पता चला है कि परमाणु ईंधन के ये सूक्ष्म कण दशकों तक अपनी मूल क्रिस्टलीय संरचना को अपेक्षा से कहीं अधिक सुरक्षित रखने में सक्षम रहे हैं।
इससे पर्यावरण में रेडियोधर्मी पदार्थों के फैलाव और उनके दीर्घकालिक व्यवहार को समझने के नए रास्ते खुले हैं। जर्मनी की लाइबनिज यूनिवर्सिटी हनोवर और हेल्महोल्ट्ज सेंटर ड्रेसडेन-रॉसेंडॉर्फ (HZDR) के वैज्ञानिकों ने चेरनोबिल क्षेत्र के दो स्थानों से एकत्र किए गए छह रेडियोधर्मी ईंधन कणों का विश्लेषण किया।
इन कणों का आकार 8 से 50 माइक्रोमीटर के बीच था। शोधकर्ताओं ने सिंक्रोट्रॉन एक्स-रे विवर्तन तकनीक की मदद से उनकी आंतरिक संरचना और रासायनिक विशेषताओं का अध्ययन किया। जर्नल ऑफ हैजार्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित शोध के अनुसार, इन कणों ने अपनी मूल क्रिस्टलीय संरचना का बड़ा हिस्सा लगभग 40 वर्षों तक सुरक्षित रखा है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चेरनोबिल के ये ईंधन कण रेडियोधर्मी पदार्थों के स्थायी भंडार की तरह व्यवहार कर रहे हैं। अध्ययन में पाया गया कि इन कणों के भीतर मौजूद परमाणु ईंधन अपेक्षा से अधिक रासायनिक रूप से स्थिर है। इसके कारण विखंडन से उत्पन्न कई रेडियोधर्मी पदार्थ आसपास की मिट्टी और पानी में तेजी से मुक्त नहीं हो पाए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस धीमी अपक्षय प्रक्रिया से कुछ प्रकार के रेडियोन्यूक्लाइड के पर्यावरण में फैलने की गति सीमित हो सकती है। शोधकर्ताओं ने अध्ययन में मुख्य रूप से तीन प्रकार के कणों की पहचान की है।
पहले प्रकार के कण मूल यूरेनियम डाइऑक्साइड परमाणु ईंधन जैसे दिखाई देते हैं। दूसरे प्रकार के कण परमाणु दुर्घटना के दौरान अत्यधिक तापमान के कारण जिरकोनियम धातु की बाहरी परत के साथ आंशिक या पूरी तरह जुड़ गए थे। तीसरे प्रकार के कण ग्रेफाइट में लगी आग के दौरान बने मलबे के हिस्से हैं।
हैरानी की बात यह है कि चार दशकों तक मिट्टी और पर्यावरण के संपर्क में रहने के बावजूद इन कणों की क्रिस्टलीय संरचना काफी हद तक बरकरार रही है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों का अर्थ यह नहीं है कि चेरनोबिल क्षेत्र का रेडियोधर्मी प्रदूषण हानिरहित हो गया है या वहां लागू प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं। ये कण अब भी अत्यधिक रेडियोधर्मी हैं और प्रत्येक कण की संरचना तथा व्यवहार अलग हो सकता है।
शोध में केवल छह कणों का विश्लेषण किया गया है। इसलिए इनके आधार पर पूरे चेरनोबिल निषिद्ध क्षेत्र की स्थिति के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। वैज्ञानिक अब परमाणु मलबे में मौजूद अत्यधिक रेडियोधर्मी ट्रांसयूरेनिक पदार्थों के विभिन्न रूपों का भी अध्ययन कर रहे हैं।
यह शोध मिट्टी, भूजल और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर परमाणु प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन करने वाले वैज्ञानिक मॉडलों को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। चेरनोबिल क्षेत्र आज भी परमाणु दुर्घटना के बाद पर्यावरण में होने वाले रासायनिक और जैविक बदलावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रयोगशाला बना हुआ है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, वहां मौजूद रेडियोधर्मी कण यह समझने का अवसर देते हैं कि परमाणु प्रदूषक दशकों तक किस प्रकार स्थिर रहते हैं और धीरे-धीरे पर्यावरण में किस तरह मुक्त होते हैं।
Also Read: यूरोप की नदियां समुद्र तक पहुंचाने से कहीं ज्यादा प्लास्टिक कचरा अपने भीतर जमा कर रहीं: अध्ययन

