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सूखे की मार से देश में कृषि आयात बढ़ने का खतरा, खाद्य तेल, मक्का और सोयामील की मांग बढ़ी

Environment Pulse
Last updated: November 7, 2026 7:13 pm
Environment Pulse
Published: November 7, 2026
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कम बारिश और सूखे के कारण सोयाबीन, मूंगफली और सरसों जैसी प्रमुख फसलों को नुकसान पहुँचा है, जिससे भारत में खाद्य तेल, मक्का और सोयामील का आयात बढ़ने की आशंका है। वर्ष 2026-27 में खाद्य तेलों का आयात बढ़कर 1.75 करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है। घरेलू उत्पादन घटने से पोल्ट्री फीड और कृषि उत्पादों की लागत में वृद्धि हुई है, जिससे खाद्य सुरक्षा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। 

एनवायरमेंट पल्स डेस्क :  देश के प्रमुख कृषि उत्पादक क्षेत्रों में कम बारिश और सूखे के असर से सोयाबीन तथा मूंगफली की फसल प्रभावित हुई है। आगामी सरसों की फसल को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं। इसके चलते भारत में खाद्य तेल, मक्का, चीनी और सोयाबीन खली (सोयामील) के आयात में वृद्धि की आशंका जताई जा रही है। उद्योग संगठनों और व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक, घरेलू उत्पादन में संभावित कमी के कारण वर्ष 2026-27 के विपणन सत्र में कृषि आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है।

खरीफ सीजन की सोयाबीन फसल को मराठवाड़ा, विदर्भ, तेलंगाना और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में अपर्याप्त बारिश के कारण नुकसान पहुंचा है। वहीं, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अनुमानों के अनुसार, देश में मूंगफली का उत्पादन 20 प्रतिशत से अधिक घट सकता है।

खाद्य तेल की घरेलू उपलब्धता में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली रबी सीजन की सरसों की फसल को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। फसल उत्पादन में संभावित गिरावट का सीधा असर खाद्य तेलों के आयात पर पड़ सकता है। अनुमान है कि भारत का खाद्य तेल आयात 2025-26 के 1.65 करोड़ टन से बढ़कर 2026-27 में करीब 1.75 करोड़ टन हो सकता है।

भारत अपनी कुल खाद्य तेल जरूरतों का लगभग 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। घरेलू तिलहन उत्पादन प्रभावित होने से आयात और घरेलू मांग के बीच का अंतर बढ़ने की आशंका है। इससे विदेशी बाजारों पर निर्भरता के साथ देश के आयात बिल पर भी दबाव बढ़ सकता है। मौसम संबंधी पिछली बाधाओं के बाद अफ्रीका के अल्प विकसित देशों से सोयाबीन का आयात पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है।

सोयाबीन खली और मक्का की ऊंची कीमतों का असर पोल्ट्री और पशुपालन उद्योग पर भी पड़ रहा है। इन दोनों उत्पादों की हिस्सेदारी पोल्ट्री फीड की कुल लागत में लगभग 80 प्रतिशत है। घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ने से मुर्गीपालन कारोबार की लागत लगातार बढ़ रही है। कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने सरकार से अधिकतम 30 लाख टन सोयाबीन खली के आयात की अनुमति देने की मांग की है।

उद्योग का कहना है कि इससे पशु आहार की लागत नियंत्रित करने, उत्पादकों के मुनाफे को सुरक्षित रखने और चिकन तथा अंडों की कीमतों में अचानक वृद्धि रोकने में मदद मिल सकती है। कृषि उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों का असर अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। चीनी उद्योग को कच्ची चीनी के आयात की अवधि बढ़ाने की अनुमति मिल चुकी है।

वहीं, कपास की उपलब्धता को लेकर चिंतित कपड़ा उद्योग आयात शुल्क समाप्त करने की मांग कर रहा है। इसके अलावा अल नीनो से जुड़े संभावित मौसमी बदलावों ने दलहन, तिलहन और अन्य फसलों के उत्पादन को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि आयात बढ़ाने से घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों को स्थिर करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे देश का विदेशी मुद्रा खर्च भी बढ़ेगा। लंबे समय तक आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन को मजबूत करना जरूरी है।

इसके लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसल किस्मों का विकास, किसानों को तकनीकी सहायता और प्रभावी कृषि नीतियों की आवश्यकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2026-27 में वास्तविक आयात की मात्रा काफी हद तक सरसों की आगामी फसल के प्रदर्शन तथा सरकार की ओर से आयात शुल्क और कोटा संबंधी संभावित फैसलों पर निर्भर करेगी।

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