‘साइंस एडवांसेज’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, वैज्ञानिकों ने पाया है कि गंभीर रूप से ब्लीचिंग (सफेद पड़ने) से प्रभावित प्रवाल (कोरल), स्वस्थ और आनुवंशिक रूप से समान प्रवालों के थोड़े समय के शारीरिक संपर्क से मात्र सात सप्ताह में पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। ‘पोसिलोपोरा डैमिकोर्निस’ (Pocillopora damicornis) प्रजाति पर किए गए इस प्रयोग में, स्वस्थ प्रवालों के संपर्क में आने वाले ब्लीचिंग प्रभावित प्रवालों ने ऊतक संलयन (टिश्यू फ्यूजन) के माध्यम से केवल तीन दिनों में लाभकारी शैवाल प्राप्त कर लिए और उनका प्राकृतिक रंग लौट आया।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : वैज्ञानिकों ने प्रयोगों में पाया है कि गंभीर रूप से ब्लीचिंग से प्रभावित प्रवाल (कोरल) स्वस्थ और आनुवंशिक रूप से समान प्रवाल के थोड़े समय के शारीरिक संपर्क से महज सात सप्ताह में पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। साइंस एडवांसेज में प्रकाशित इस अध्ययन में पोसिलोपोरा डैमिकोर्निस (Pocillopora damicornis) प्रजाति के प्रवालों पर प्रयोग किया गया। इसमें ब्लीचिंग से प्रभावित प्रवाल के टुकड़ों को उनके स्वस्थ आनुवंशिक रूप से समान प्रवालों के संपर्क में रखा गया। जिन प्रवालों को स्वस्थ प्रवालों के संपर्क में रखा गया, उन्होंने अपने सहजीवी शैवाल दोबारा प्राप्त कर लिए और उनका प्राकृतिक रंग लौट आया। इसके विपरीत, जिन प्रवालों को स्वस्थ प्रवालों से कुछ मिलीमीटर की दूरी पर रखा गया, वे मर गए। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अब तक दर्ज की गई ब्लीचिंग से उबरने की सबसे तेज प्रक्रिया है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने आनुवंशिक रूप से समान प्रवालों के जोड़े तैयार किए।
संपर्क में रखे गए प्रवालों में स्वस्थ प्रवाल के लाभकारी शैवाल केवल तीन दिनों के भीतर ऊतक संलयन (टिश्यू फ्यूजन) के माध्यम से प्रभावित प्रवाल तक पहुंच गए। पांच से सात दिनों के संपर्क के बाद प्रभावित प्रवाल को इतनी मात्रा में शैवाल मिल गए कि वह स्वतंत्र रूप से स्वस्थ होने की प्रक्रिया जारी रख सका। सात से आठ सप्ताह में प्रवाल के पॉलीप पूरी तरह ठीक हो गए। कुछ प्रवाल इससे भी कम समय में स्वस्थ हो गए। इस प्रक्रिया का आधार आनुवंशिक रूप से समान प्रवालों की एक-दूसरे को पहचानने और उनके ऊतकों के आपस में जुड़ने की क्षमता है। इसके माध्यम से सहजीवी शैवाल और पोषक तत्व एक प्रवाल से दूसरे तक पहुंच सकते हैं।
प्रभावित प्रवाल के भीतर पहुंचने के बाद शैवाल तेजी से बढ़ने लगते हैं। यह अध्ययन प्रवाल भित्तियों को दोबारा स्वस्थ करने की संभावित तकनीकों के लिए नए रास्ते खोलता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह प्रयोग नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में एक ही प्रजाति के छोटे प्रवाल टुकड़ों पर किया गया था। इसलिए इसे अभी समुद्र में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जा सकने वाली तैयार तकनीक नहीं माना जा सकता। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समुद्री हीटवेव के कारण दुनिया भर में प्रवाल भित्तियों पर ब्लीचिंग का खतरा बढ़ रहा है।
समुद्र के तापमान में वृद्धि से प्रवाल अपने ऊतकों में रहने वाले सहजीवी शैवाल खो देते हैं, जिससे उनका रंग सफेद पड़ जाता है और उनकी जीवित रहने की क्षमता प्रभावित होती है। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ होने की प्रक्रिया में आमतौर पर काफी समय लगता है। ऐसे में स्वस्थ प्रवाल के साथ थोड़े समय का संपर्क तेजी से सुधार ला सकता है, यह खोज प्रवालों की प्रतिरोधक क्षमता और संरक्षण की संभावनाओं को समझने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। हालांकि, इस तकनीक को वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में लागू करने से पहले इसकी व्यापकता, अन्य प्रवाल प्रजातियों पर प्रभाव और बड़े स्तर पर उपयोग की संभावनाओं का परीक्षण करना होगा।
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