ब्रिटेन सरकार ने राष्ट्रमंडल देशों को दी जाने वाली विदेशी सहायता और प्रकृति संरक्षण अनुदान में भारी कटौती करने की घोषणा की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन देशों की द्विपक्षीय सहायता वर्ष 2024-25 के 546 मिलियन पाउंड से घटकर 2028-29 तक मात्र 131 मिलियन पाउंड रह जाने की संभावना है। इस कटौती का सबसे बुरा असर जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण पर पड़ा है। कम से कम 26 राष्ट्रमंडल देशों को ‘डार्विन इनिशिएटिव’ (40 मिलियन पाउंड वार्षिक कार्यक्रम) के लिए आवेदन करने से बाहर कर दिया गया है। इसके अलावा, कांगो बेसिन के वर्षावनों और बांग्लादेश के सुंदरबन जैसी महत्वपूर्ण जलवायु अनुकूलन परियोजनाएं या तो प्रभावित हुई हैं या समय से पहले बंद हो रही हैं। ब्रिटेन ने अपने सकल राष्ट्रीय आय (GNI) का सहायता लक्ष्य 0.5% से घटाकर 0.3% करने की दिशा में कदम बढ़ाया है और अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्तपोषण में कटौती की है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : ब्रिटेन ने राष्ट्रमंडल देशों को दी जाने वाली विदेशी सहायता में भारी कटौती की है। इसका सबसे अधिक असर प्रकृति संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं पर पड़ा है। एंटीगुआ में आयोजित राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक (CHOGM) के दौरान सामने आए सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, इन देशों को मिलने वाली द्विपक्षीय सहायता 2024-25 में 546 मिलियन पाउंड से घटकर 2028-29 तक महज 131 मिलियन पाउंड रह जाने का अनुमान है। इसमें से 68 मिलियन पाउंड नाइजीरिया के लिए निर्धारित हैं, जबकि अन्य सभी राष्ट्रमंडल देशों के हिस्से में केवल 63 मिलियन पाउंड आएंगे। प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में कटौती विशेष रूप से गंभीर है।
कम से कम 26 राष्ट्रमंडल देशों को लंबे समय से संचालित डार्विन इनिशिएटिव के लिए आवेदन करने से बाहर कर दिया गया है। जैव विविधता संरक्षण से जुड़ा यह महत्वपूर्ण कार्यक्रम प्रतिवर्ष लगभग 40 मिलियन पाउंड का है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के सर्वाधिक जैव विविधता संपन्न देशों में से कई पहले से ही गरीबी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में जलवायु संकट के बढ़ते दबाव के बीच उन्हें मिलने वाली महत्वपूर्ण सहायता भी समाप्त हो रही है।
उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन की कैरेबियन डेवलपमेंट टीम का बजट इस वर्ष से अगले वर्ष के बीच आधे से भी अधिक घटाया जाना प्रस्तावित है। ये कटौतियां ब्रिटेन के समग्र विदेशी सहायता बजट में कमी का हिस्सा हैं। देश ने अपने सकल राष्ट्रीय आय के 0.5 प्रतिशत के बराबर सहायता देने के लक्ष्य को घटाकर 0.3 प्रतिशत की दिशा में आगे बढ़ाया है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्तपोषण में भी कटौती की गई है। इसके साथ ही जलवायु खर्च का एक-तिहाई हिस्सा प्रकृति और जैव विविधता के लिए निर्धारित करने की पूर्व प्रतिबद्धता भी वापस ले ली गई है।
इसका असर कांगो बेसिन के वर्षावनों से जुड़ी बड़ी संरक्षण परियोजनाओं और बांग्लादेश के सुंदरबन में जलवायु अनुकूलन कार्यक्रमों पर पड़ा है। सुंदरबन की एक परियोजना निर्धारित समय से दो वर्ष पहले ही बंद हो रही है। कैंपेन फॉर नेचर के एड्रियन गाहन सहित आलोचकों का कहना है कि ये कटौतियां वैश्विक दक्षिण में ब्रिटेन की प्रतिष्ठा और उसके कूटनीतिक प्रभाव को कमजोर कर सकती हैं।
उनका मानना है कि जैव विविधता का नुकसान और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में सहायता कम करना चिंताजनक है। दूसरी ओर, सरकार की नीति का समर्थन करने वाले लोग घरेलू आर्थिक दबावों को प्राथमिकता देने और पारंपरिक अनुदान आधारित सहायता के बजाय साझेदारी के नए तरीकों को अपनाने की जरूरत पर जोर देते हैं। सम्मेलन के दौरान ऐतिहासिक अन्याय और मुआवजे से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में रहे।
संरक्षण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ब्रिटेन की सहायता में कमी से अत्यधिक जैव विविधता वाले राष्ट्रमंडल देशों की प्रजातियों और प्राकृतिक आवासों पर खतरा बढ़ सकता है। वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन के बाद शुरू की गई डार्विन इनिशिएटिव की नई पात्रता सूची से कई अफ्रीकी, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देश बाहर हो गए हैं।
कुल मिलाकर, यह बदलाव वित्तीय सीमाओं के बीच ब्रिटेन की विकास सहायता नीति में व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि अन्य दानदाता देश या बहुपक्षीय संस्थाएं प्रकृति संरक्षण परियोजनाओं के लिए पैदा हुए इस वित्तीय अंतर को भर पाएंगी या नहीं।
Also Read: ट्रंप प्रशासन ने 1.22 अरब डॉलर में रद्द कराईं RWE की तीन अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाएं

