ऑक्सफैम की एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि दुनिया के सबसे अमीर लोग जलवायु संकट से दोहरा फायदा (Double Dividend) उठा रहे हैं। वैश्विक आबादी के सबसे अमीर 0.1% लोग (लगभग 80 लाख लोग) न केवल प्रदूषणकारी उद्योगों से मुनाफा कमा रहे हैं, बल्कि आपदा राहत, पुनर्वास, बाढ़ सुरक्षा और कूलिंग सिस्टम जैसे जलवायु संकट से निपटने वाले बाजारों में निवेश करके दोबारा कमाई कर रहे हैं। आपदा से जुड़े इस कारोबार का आकार 2029 तक बढ़कर 92 अरब डॉलर होने का अनुमान है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : दुनिया के सबसे अमीर लोग जलवायु संकट पैदा करने वाली गतिविधियों से भी मुनाफा कमा रहे हैं और इसके दुष्परिणामों से निपटने के लिए विकसित हो रहे बाजार से भी लाभ उठा रहे हैं। ऑक्सफैम की एक प्रमुख रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक आबादी के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत यानी लगभग 80 लाख लोग आपदा की तैयारी, राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण से जुड़े कारोबार में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं।
इस बाजार का आकार वर्तमान 70 अरब डॉलर से बढ़कर 2029 तक प्रतिवर्ष 92 अरब डॉलर होने का अनुमान है। ऑक्सफैम ने इसे ‘डबल डिविडेंड’ यानी दोहरा लाभ बताया है। इसका अर्थ है कि अमीर लोग पहले उन प्रदूषणकारी उद्योगों से मुनाफा कमाते हैं जो पृथ्वी का तापमान बढ़ाते हैं और फिर उसी संकट से पैदा हुए नुकसान का समाधान बेचकर दोबारा कमाई करते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों का कार्बन उत्सर्जन सबसे गरीब 350 करोड़ लोगों के संयुक्त उत्सर्जन से भी अधिक है। उनकी जीवनशैली और निवेश से होने वाला उत्सर्जन औसत व्यक्ति की तुलना में लगभग 125 गुना अधिक है। रिपोर्ट में किए गए विश्लेषण के अनुसार, सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत में शामिल एक व्यक्ति ने दुनिया के सबसे गरीब आधे लोगों के किसी व्यक्ति की तुलना में मौजूदा भीषण गर्मी की घटनाओं में लगभग 400 गुना अधिक योगदान दिया है।
इनका सामूहिक उत्सर्जन उप-सहारा अफ्रीका की पूरी आबादी के उत्सर्जन से भी अधिक है। ऑक्सफैम के ‘डिस्ट्रॉय एंड रीबिल्ड इंडेक्स’ में 217 प्रमुख कंपनियों की पहचान की गई है। ये कंपनियां या तो जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले क्षेत्रों में काम करती हैं या फिर जलवायु संकट से निपटने के कारोबार से लाभ कमाती हैं। इनमें बाढ़ सुरक्षा अवरोध, कूलिंग सिस्टम, अग्निशमन उपकरण, बीमा और पुनर्निर्माण सेवाएं शामिल हैं। इन कंपनियों ने पिछले वर्ष औसतन 1.8 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया और लगभग एक अरब डॉलर शेयरधारकों को लाभांश के रूप में वितरित किए।
ब्लैकरॉक और वैनगार्ड जैसी प्रमुख परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों की इनमें बड़ी हिस्सेदारी है, जिसका कुल मूल्य एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। रिपोर्ट का कहना है कि यह व्यवस्था आर्थिक असमानता को और बढ़ाती है तथा प्रभावी जलवायु कार्रवाई को टालने के लिए गलत प्रोत्साहन पैदा करती है। जहां अमीर लोग खुद को जलवायु संकट से बचाने और सुरक्षा उपायों में निवेश करने में सक्षम हैं, वहीं इस संकट के लिए सबसे कम जिम्मेदार आबादी को बाढ़, आग, भीषण गर्मी और अकाल का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है।
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक अमिताभ बेहर ने इस स्थिति को साझा त्रासदी के बजाय ‘चरम असमानता का अपराध’ बताया है। COP31 से पहले जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु संकट अब संपत्ति के और अधिक केंद्रीकरण का माध्यम बनता जा रहा है। दुनिया के 1,000 सबसे अमीर अरबपतियों के निवेश से ही करोड़ों टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन जुड़ा हुआ है। इनमें तेल, गैस और रसायन जैसे अत्यधिक प्रदूषणकारी क्षेत्र प्रमुख हैं। विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 1990 के बाद से दुनिया के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों ने वैश्विक तापमान वृद्धि में लगभग 20 प्रतिशत योगदान दिया है।
ऑक्सफैम ने अत्यधिक संपत्ति पर प्रभावी नियंत्रण, जीवाश्म ईंधन से निवेश हटाने और जलवायु अनुकूलन के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों को सबसे कमजोर समुदायों तक पहुंचाने की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि व्यापक नीतिगत बदलावों के अभाव में जलवायु संकट वैश्विक असमानता को और गहरा करेगा।
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