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जलवायु परिवर्तन के ‘फीडबैक लूप’ बढ़ा सकते हैं ग्लोबल वार्मिंग को 30% तक, नए अध्ययन की चेतावनी

Environment Pulse
Last updated: September 12, 2026 6:17 pm
Environment Pulse
Published: September 12, 2026
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एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, धरती के गर्म होने के कारण प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र बड़ी मात्रा में मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ रहे हैं, जिससे खतरनाक ‘फीडबैक लूप’ बन रहे हैं। यह स्थिति इस सदी में मानव गतिविधियों से होने वाली ग्लोबल वार्मिंग को अतिरिक्त 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। ‘Environmental Research Letters’ में प्रकाशित इस शोध में पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना, जंगलों में भीषण आग, आर्द्रभूमियां और जल निकाय जैसे चार प्रमुख प्राकृतिक स्रोतों का अध्ययन किया गया है, जिनके कारण 2100 तक वैश्विक तापमान में 0.2 से 0.4 डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अधिकांश मौजूदा जलवायु मॉडल इन प्राकृतिक उत्सर्जनों को पूरी तरह शामिल नहीं करते हैं, इसलिए सरकारों और नीति निर्माताओं को भविष्य की रणनीतियों में इन फीडबैक लूप को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क: जलवायु परिवर्तन को लेकर एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि धरती के गर्म होने के साथ प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र बड़ी मात्रा में मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ रहे हैं। ये उत्सर्जन ऐसे शक्तिशाली ‘फीडबैक लूप’ बना सकते हैं, जो इस सदी में मानव गतिविधियों से होने वाली ग्लोबल वार्मिंग को अतिरिक्त 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं। अध्ययन के अनुसार, तापमान बढ़ने के साथ कुछ प्राकृतिक प्रणालियां, जो पहले कार्बन को अवशोषित कर उसे संग्रहीत करती थीं, धीरे-धीरे कार्बन के स्रोत में बदल रही हैं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण आर्कटिक और उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों में पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना है। जमी हुई मिट्टी में हजारों वर्षों से जमा जैविक पदार्थ तापमान बढ़ने पर विघटित होने लगता है और इससे कार्बन डाइऑक्साइड तथा मीथेन का उत्सर्जन होता है।

इसके अलावा गर्म और शुष्क होती आर्द्रभूमियां तथा झीलें अधिक मीथेन छोड़ सकती हैं। बढ़ती गर्मी और सूखे के कारण जंगलों में लगने वाली भीषण आग वनस्पतियों और मिट्टी में जमा कार्बन को वातावरण में वापस पहुंचा रही है। इन सभी प्रक्रियाओं का संयुक्त प्रभाव पृथ्वी के गर्म होने की गति को और बढ़ा सकता है।

2100 तक 0.2 से 0.4 डिग्री सेल्सियस अतिरिक्त गर्मी Environmental Research Letters में प्रकाशित अध्ययन में चार प्रमुख प्राकृतिक स्रोतों—पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने, जंगलों में आग, आर्द्रभूमियों और अंतर्देशीय जल निकायों—का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि गर्मी बढ़ने से प्रेरित इन उत्सर्जनों के कारण वर्ष 2100 तक वैश्विक औसत तापमान में अतिरिक्त 0.2 से 0.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है।

यह अतिरिक्त वृद्धि मानव गतिविधियों से होने वाली वार्मिंग को लगभग 20–30 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु प्रणाली में इन फीडबैक का अस्तित्व लंबे समय से ज्ञात है, लेकिन विभिन्न प्रक्रियाओं के संयुक्त प्रभाव को अब तक पर्याप्त रूप से आंकने में कमी रही है। अध्ययन की एक महत्वपूर्ण चिंता यह है कि इन प्राकृतिक उत्सर्जनों का बड़ा हिस्सा उन जलवायु मॉडलों में पूरी तरह शामिल नहीं है, जिनका इस्तेमाल सरकारें जलवायु नीतियों, उत्सर्जन लक्ष्यों और कार्बन बजट तैयार करने में करती हैं।

यदि इन प्रभावों को कम आंका गया है तो भविष्य में तापमान वृद्धि के अनुमान अपेक्षाकृत कम और तापमान सीमित रखने के लिए उपलब्ध कार्बन बजट वास्तविकता से अधिक बड़ा दिखाई दे सकता है। जलवायु मॉडल में बदलाव की जरूरत शोधकर्ताओं ने कहा है कि अध्ययन के निष्कर्ष तेजी से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने की आवश्यकता को और मजबूत करते हैं।

मानव-जनित उत्सर्जन में कटौती अब भी इन प्राकृतिक फीडबैक को कमजोर रखने का सबसे प्रभावी उपाय है। जितनी तेजी से उत्सर्जन कम होंगे, उतनी ही संभावना होगी कि अतिरिक्त वार्मिंग अनुमानित सीमा के निचले स्तर के करीब रहे। इसके विपरीत, कार्रवाई में देरी होने पर तापमान बढ़ने के साथ प्राकृतिक प्रणालियों में बदलाव और तेज हो सकते हैं। इससे अधिक कार्बन और मीथेन वातावरण में पहुंच सकता है और एक ऐसा चक्र बन सकता है जिसमें गर्मी प्राकृतिक उत्सर्जन बढ़ाए और वे उत्सर्जन आगे और गर्मी पैदा करें।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगली पीढ़ी के जलवायु मॉडलों में इन प्रक्रियाओं को अधिक व्यापक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। सरकारों और संस्थानों को भी जलवायु जोखिम, कार्बन बजट और भविष्य की नीतियों का आकलन करते समय इन प्राकृतिक फीडबैक को ध्यान में रखना होगा।

अध्ययन इस बात की ओर भी संकेत करता है कि जलवायु संकट अब केवल मानव द्वारा सीधे छोड़ी जा रही ग्रीनहाउस गैसों की समस्या नहीं रह गया है। पृथ्वी स्वयं बढ़ते तापमान के प्रति प्रतिक्रिया कर रही है और ये प्रतिक्रियाएं आने वाले दशकों में ग्लोबल वार्मिंग को और तेज कर सकती हैं।

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