गुजरात का कच्छ जिला 2026 के कमजोर मानसून के कारण गंभीर सूखे जैसे हालात से जूझ रहा है। बारिश की भारी कमी, जलाशयों में पानी घटने और फसलों की बर्बादी के चलते खेती और पशुपालन पर संकट गहरा गया है, जिससे लगभग 4.82 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि और 21 लाख पशु प्रभावित हुए हैं। चारे और पानी की कमी के कारण पशुपालक पलायन करने को मजबूर हैं। सरकार द्वारा रियायती दरों पर चारा उपलब्ध कराने, पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने और स्थिति पर नजर रखने जैसे एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: गुजरात का शुष्क कच्छ जिला 2026 के कमजोर मानसून के बाद गहराते सूखे जैसे हालात से जूझ रहा है। बारिश की भारी कमी, जलाशयों में घटता पानी, फसलों की बर्बादी तथा पशुओं के लिए चारे और पानी की कमी ने ग्रामीण आजीविका पर दबाव बढ़ा दिया है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर के मध्य से अंत तक कच्छ में सामान्य मौसमी बारिश का केवल करीब 29 से 57 प्रतिशत हिस्सा ही दर्ज हुआ। अबडासा जैसे कुछ तालुकाओं में यह कमी बेहद गंभीर रही, जहां सामान्य बारिश का करीब 10 प्रतिशत ही दर्ज किया गया। सौराष्ट्र के देवभूमि द्वारका, पोरबंदर और जामनगर में भी बारिश में बड़ी कमी रही।
जिले के मध्यम सिंचाई जलाशयों में जल भंडारण क्षमता का लगभग 19 से 32 प्रतिशत ही पानी बचा है, जबकि छोटी सिंचाई योजनाओं में यह करीब 13 प्रतिशत या उससे कम बताया गया है। कई बांध लगभग सूखने की स्थिति में हैं। इसके विपरीत, नर्मदा स्थित सरदार सरोवर जलाशय में जल भंडारण अपेक्षाकृत ऊंचा बना हुआ है। कच्छ में करीब 4.82 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बारिश की कमी से प्रभावित बताई जा रही है। सीमित क्षेत्र में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है।
बाजरा, मूंग, तिल, कपास और मूंगफली जैसी वर्षा आधारित फसलों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। बारिश पर निर्भर कृषि व्यवस्था में लंबे समय तक सूखा रहने से किसानों के सामने उत्पादन और आय दोनों का संकट खड़ा हो गया है। रबी की बुवाई का समय नजदीक आने के साथ किसानों की चिंता और बढ़ गई है। कच्छ के पशुपालक समुदाय, विशेषकर बन्नी घासभूमि पर निर्भर मालधारियों, को भी गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। चरागाहों में पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं होने और जल स्रोतों के सूखने से पशुओं को पालना मुश्किल हो रहा है। चारे की कमी का असर दूध उत्पादन पर भी पड़ा है। कई परिवार अपने पशुओं के साथ पानी और चरागाह की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगे हैं।
जिले में करीब 21 लाख पशु चारे और पानी की कमी से प्रभावित बताए गए हैं। गुजरात सरकार का कहना है कि केवल बारिश में कमी के आधार पर किसी क्षेत्र को आधिकारिक रूप से सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया जाएगा। इसके लिए राष्ट्रीय Drought Management Manual के अनुसार वैज्ञानिक आकलन और जमीनी सत्यापन किया जा रहा है। हालांकि, प्रभावित क्षेत्रों में एहतियाती कदम शुरू कर दिए गए हैं।
सरकार द्वारा रियायती दरों पर चारा उपलब्ध कराया जा रहा है और प्रभावित जिलों में हजारों पशुपालकों तक चारे का स्टॉक पहुंचाया गया है। पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा कृषि के लिए अतिरिक्त बिजली उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था की जा रही है। किसानों और स्थानीय संगठनों ने मौजूदा नहर और पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए नर्मदा का अधिक पानी छोड़ने की मांग की है, ताकि सिंचाई को सहारा मिल सके और सूखे तालाबों को भरा जा सके।
अधिकारियों ने फिलहाल पेयजल आपूर्ति को प्राथमिकता देते हुए स्थिति की निगरानी जारी रखी है। मानसून की वापसी के साथ लंबे शुष्क दौर ने कच्छ में खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आय और पशुपालन के साथ-साथ क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। प्रशासन रबी की बुवाई से पहले जल, कृषि और पशुधन संबंधी परिस्थितियों पर लगातार नजर रख रहा है।
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