ब्रिटिश थिंक टैंक ‘चैथम हाउस’ की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील, चीन, अमेरिका और इंडोनेशिया जैसे देशों की नीतियों के चलते 2030 तक वैश्विक बायोफ्यूल उत्पादन में 68 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी होने का अनुमान है, जिससे यह 105 मिलियन टन से बढ़कर 176 मिलियन टन तक पहुँच सकता है। हालांकि बायोफ्यूल को जीवाश्म ईंधन का विकल्प माना जाता है, लेकिन इसके कारण लगभग 3.6 करोड़ हेक्टेयर (कनाडा की कुल फसल भूमि के बराबर) अतिरिक्त कृषि भूमि की जरूरत पड़ेगी, जिससे वनों की कटाई और जैव-विविधता को खतरा पैदा होगा। इसके अलावा, खाद्य फसलों और बायोफ्यूल फसलों के बीच जमीन की प्रतिस्पर्धा बढ़ने से ‘खाद्य बनाम ईंधन’ की बहस तेज हो गई है, जिससे कुछ क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा प्रभावित होने की आशंका है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि ऊर्जा जरूरतों और खाद्य आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने के लिए वन संरक्षण, भूमि उपयोग और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी होगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: दुनिया में बायोफ्यूल की बढ़ती मांग से एक ओर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर इसके लिए कृषि भूमि के बढ़ते इस्तेमाल, वनों की कटाई और जैव-विविधता को होने वाले नुकसान को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।
ब्रिटिश थिंक टैंक चैथम हाउस की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, ब्राजील, चीन, अमेरिका और इंडोनेशिया जैसे देशों में बायोफ्यूल मिश्रण संबंधी नीतियों के कारण वैश्विक बायोफ्यूल उत्पादन 2030 तक करीब 68 प्रतिशत बढ़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार उत्पादन वर्तमान अनुमानित 105 मिलियन टन तेल समतुल्य से बढ़कर 2030 में लगभग 176 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी तेज वृद्धि से कृषि भूमि और उर्वरक जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।
खाद्य फसलों के लिए उपलब्ध जमीन और बायोफ्यूल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कुछ क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई है।
चैथम हाउस के मुताबिक, बायोफ्यूल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए दुनिया के विभिन्न हिस्सों में नई कृषि भूमि विकसित की जा सकती है। इससे जंगलों की कटाई, प्राकृतिक आवासों का नुकसान और सीमांत भूमि पर खेती बढ़ने का जोखिम है।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि ऊर्जा संकट के बाद प्रस्तावित बायोफ्यूल मिश्रण लक्ष्यों को पूरी तरह लागू किया जाता है, तो 2030 तक अतिरिक्त कृषि भूमि की जरूरत 3.6 करोड़ हेक्टेयर तक पहुंच सकती है।
यह करीब 8.9 करोड़ एकड़ के बराबर है और आकार के लिहाज से कनाडा की मौजूदा फसल एवं घासभूमि के लगभग बराबर बताया गया है। बायोफ्यूल के लिए कृषि उत्पादों के इस्तेमाल को लेकर ‘खाद्य बनाम ईंधन’ की बहस नई नहीं है।
कनाडा में भी कैनोला की बड़ी मात्रा पहले से नवीकरणीय डीजल और अन्य बायोफ्यूल बनाने में इस्तेमाल हो रही है। कनाडियन कैनोला ग्रोअर्स एसोसिएशन के अनुसार देश में पैदा होने वाले कैनोला का लगभग एक-तिहाई हिस्सा कनाडा, अमेरिका या यूरोपीय संघ के बायोफ्यूल बाजार में पहुंचता है।
बायोफ्यूल की मांग बढ़ने के साथ अमेरिका के कुछ कृषि क्षेत्रों में कैनोला उत्पादन भी बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नवीकरणीय डीजल, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और दूसरे वैकल्पिक ईंधनों की मांग आने वाले वर्षों में कई कृषि फसलों के उत्पादन और उपयोग की दिशा को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि दुनिया के कई हिस्सों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी हो रही है।
इससे भविष्य में खाद्य उत्पादन की अतिरिक्त मांग सीमित हो सकती है। ऐसे में कृषि क्षेत्र के सामने चुनौती यह होगी कि ऊर्जा जरूरतों और खाद्य आपूर्ति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। बायोफ्यूल को जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इसके विस्तार की योजना बनाते समय वन संरक्षण, जैव-विविधता, भूमि उपयोग, खाद्य सुरक्षा और किसानों की जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।
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