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घासभूमियों को ‘बंजर भूमि’ की श्रेणी से बाहर करने की मांग, कार्बन और जैव विविधता क्रेडिट से आर्थिक मूल्यांकन पर जोर

Environment Pulse
Last updated: September 10, 2026 1:53 pm
Environment Pulse
Published: September 10, 2026
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भारत की प्राकृतिक घासभूमियों और खुले पारिस्थितिकी तंत्रों को लंबे समय से ‘बंजर भूमि’ (वेस्टलैंड) के रूप में वर्गीकृत किया जाता रहा है, जिसके कारण इन क्षेत्रों का उपयोग विकास परियोजनाओं और वृक्षारोपण के लिए आसानी से किया जाता है। हालांकि, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि ये क्षेत्र जैव विविधता, कार्बन संचयन और पशुपालकों की आजीविका के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत हर साल इनसे लगभग 5 से 7 लाख करोड़ रुपये की पारिस्थितिकी सेवाएं प्राप्त करता है। इस दिशा में, सरकार ने घासभूमियों का एटलस तैयार करने और UNCCD COP17 में राष्ट्रीय गाइड जारी करने जैसे कदम उठाए हैं। विशेषज्ञ इन क्षेत्रों को ‘बंजर भूमि’ की श्रेणी से बाहर करने और कार्बन व जैव विविधता क्रेडिट जैसे वित्तीय साधनों के माध्यम से इनके संरक्षण पर जोर दे रहे हैं।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत की विशाल घासभूमियों, सवाना और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों को लंबे समय से चली आ रही ‘बंजर भूमि’ की श्रेणी से बाहर निकालने की दिशा में विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के बीच चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों को उनके वास्तविक पारिस्थितिक, जैव विविधता और आर्थिक महत्व के आधार पर दर्ज किया जाना चाहिए और कार्बन तथा जैव विविधता क्रेडिट जैसे नए वित्तीय साधनों के जरिए इनके संरक्षण को प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

दशकों से भारत के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में फैले बड़े भू-भाग को प्रशासनिक रिकॉर्ड में ‘वेस्टलैंड’ या बंजर भूमि के रूप में वर्गीकृत किया जाता रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस वर्गीकरण ने कई स्थानों पर इन प्राकृतिक क्षेत्रों को कृषि, पेड़ लगाने, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, सौर पार्कों और अन्य विकास गतिविधियों में परिवर्तित करने का रास्ता आसान किया। इसका असर इन क्षेत्रों की विशिष्ट जैव विविधता के साथ-साथ लाखों पशुपालकों की आजीविका पर भी पड़ा है।

वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों का कहना है कि पेड़ रहित होने का अर्थ बंजर होना नहीं है। प्राकृतिक घासभूमियां मिट्टी और जड़ों के भीतर बड़ी मात्रा में कार्बन संग्रहित करती हैं। इसके अलावा ये ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, ब्लैकबक जैसी दुर्लभ प्रजातियों सहित अनेक वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराती हैं और ग्रामीण समुदायों को चारा, पशुपालन तथा अन्य पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करती हैं।

अध्ययनों के अनुसार खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों का बड़ा हिस्सा उन भू-भागों से मेल खाता है जिन्हें ‘वेस्टलैंड’ की श्रेणी में रखा गया है। कुछ आकलनों में यह हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत तक बताई गई है, जबकि ऐसे क्षेत्रों के 5 प्रतिशत से भी कम हिस्से को औपचारिक संरक्षण प्राप्त है।

विशेषज्ञों के अनुसार उचित प्रबंधन वाली घासभूमियां, चरागाह, आर्द्रभूमियां और गांवों की सामुदायिक भूमि—जैसे ओरान और गोचर—भारत को हर साल लगभग 5 से 7 लाख करोड़ रुपये मूल्य की पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करती हैं। व्यापक आर्थिक आकलनों में इन सेवाओं का मूल्य 90 से 110 अरब अमेरिकी डॉलर तक बताया गया है।

ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों को केवल ऐसी भूमि के रूप में देखना, जिसे विकास परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, उनके वास्तविक मूल्य को नजरअंदाज करना है।

घासभूमियों के संरक्षण को अब जलवायु वित्त से भी जोड़कर देखा जा रहा है। ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (TERI) सहित विभिन्न विश्लेषणों में घासभूमियों को एक तरह का ‘हिडन कार्बन बैंक’ बताया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक इन क्षेत्रों का पुनर्स्थापन और बेहतर प्रबंधन कार्बन क्रेडिट हासिल करने के अवसर पैदा कर सकता है।

इसके साथ ही बायोडायवर्सिटी क्रेडिट को भी संरक्षण के लिए आर्थिक प्रोत्साहन के संभावित माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल पेड़ लगाने पर आधारित मॉडल के बजाय प्राकृतिक घासभूमियों और स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण तथा पुनर्स्थापन को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाना है।

विशेषज्ञों ने चेताया है कि हर प्राकृतिक खुले क्षेत्र में पेड़ लगाना जरूरी नहीं है। कुछ घासभूमियों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण उनके प्राकृतिक स्वरूप, जल चक्र और जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकता है।

इस दिशा में सरकारी स्तर पर भी कदम उठाए जा रहे हैं। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) ने संबंधित एजेंसियों, जिनमें भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) भी शामिल है, को भारत की घासभूमियों का एटलस तैयार करने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों के विस्तार, जैव विविधता और उनके सामने मौजूद खतरों की पहचान करना है।

भारत ने UNCCD COP17 में घासभूमियों और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों पर अपनी पहली राष्ट्रीय गाइड भी जारी की। इसमें इन क्षेत्रों को अलग और विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में मान्यता दी गई है, जिनकी अपनी कार्बन भंडारण क्षमता, आग की प्राकृतिक व्यवस्थाएं, जल विज्ञान और पशुपालक समुदायों के लिए विशेष महत्व है।

हालांकि विशेषज्ञों ने कार्बन और ग्रीन क्रेडिट आधारित मॉडल को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत भी बताई है। उनका कहना है कि यदि ‘क्षतिग्रस्त’ या ‘बंजर’ भूमि की परिभाषा स्पष्ट नहीं होगी तो कार्बन या ग्रीन क्रेडिट योजनाओं के तहत प्राकृतिक घासभूमियों में भी बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण शुरू हो सकता है।

इससे अतीत की गलतियां दोहरने के साथ-साथ स्थानीय पशुपालकों के अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञ सटीक भूमि रिकॉर्ड, वैज्ञानिक मैपिंग, सामुदायिक भागीदारी और स्पष्ट भूमि-अधिकार को आवश्यक मानते हैं।

ATREE के Centre for Policy Design के निदेशक डॉ. अबी टी. वनक ने कहा कि ‘वेस्टलैंड’ शब्द स्वयं भ्रामक है। उनके मुताबिक इनमें से कई क्षेत्र जैव विविधता के हॉटस्पॉट हैं, कार्बन का संचयन करते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इनके उचित रिकॉर्ड और प्रबंधन की जरूरत है।

भारत के भूमि क्षरण तटस्थता (Land Degradation Neutrality) और जलवायु लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ने के बीच विशेषज्ञों का उभरता मत स्पष्ट है कि घासभूमियों का मूल्यांकन उनके अपने प्राकृतिक स्वरूप और योगदान के आधार पर किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक मैपिंग, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, भूमि अधिकारों की स्पष्टता और मजबूत सुरक्षा उपायों के साथ तैयार किए गए कार्बन व जैव विविधता क्रेडिट तंत्र इन पारिस्थितिकी तंत्रों को संरक्षित करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नए आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकते हैं।

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