असम में मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए असम वन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया (WWF-India) द्वारा पांच साल (2021-2026) तक चलाए गए जीपीएस टेलीमेट्री अध्ययन की रिपोर्ट जारी कर दी गई है। इस अध्ययन के दौरान 38 हजार से अधिक जीपीएस लोकेशन दर्ज की गईं, जिनसे पता चला कि जंगली हाथी जंगलों, चाय बागानों, कृषि क्षेत्रों और बस्तियों के बीच कैसे आवाजाही करते हैं। रिपोर्ट में हाथियों के प्रमुख गलियारों की पहचान करते हुए बिजली के करंट और ट्रेनों से होने वाली मौतों को रोकने, जिला स्तर पर समन्वय समितियां बनाने और शुरुआती चेतावनी प्रणालियां विकसित करने जैसी सिफारिशें की गई हैं, जिससे मानव और हाथियों के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व को बढ़ावा मिल सके।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : असम में मानव-हाथी संघर्ष को कम करने और वन्यजीवों के सुरक्षित संरक्षण के लिए असम वन विभाग और WWF-India के पांच वर्षीय GPS टेलीमेट्री अध्ययन से हाथियों की आवाजाही और उनके आवासों के इस्तेमाल से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं।
अप्रैल 2021 से जून 2026 के बीच किए गए इस अध्ययन में 38 हजार से अधिक GPS लोकेशन दर्ज की गईं, जिनसे पता चला कि जंगली एशियाई हाथी जंगलों, चाय बागानों, कृषि क्षेत्रों, नदी तटीय इलाकों और मानव बस्तियों के बीच किस तरह आवाजाही करते हैं। असम के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने 6 अक्टूबर 2026 को गुवाहाटी में वन्यजीव सप्ताह के 72वें आयोजन के दौरान Tracking the Giants: Movement and Habitat-Use Patterns of GPS-Collared Elephants in Assam नामक रिपोर्ट जारी की।
अध्ययन के लिए उदलगुड़ी, सोनितपुर और बिश्वनाथ जिलों में चार मादा-नेतृत्व वाले हाथियों के झुंडों और एक अकेले नर हाथी पर GPS कॉलर लगाए गए थे। मंत्री ने कहा कि यह अध्ययन संरक्षण की योजना बनाने, वन्यजीवों के अनुकूल बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और लोगों तथा वन्यजीवों के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने में मदद करेगा।
उन्होंने पहले राज्य विधानसभा को बताया था कि असम में वर्ष 2016 से मानव-हाथी संघर्ष में 1,147 लोगों और 246 हाथियों की जान जा चुकी है। अध्ययन के अनुसार, सोनाई रूपाई, बेहाली और बोरनाडी वन्यजीव अभयारण्य हाथियों के प्रमुख आवास बने हुए हैं। हालांकि, चाय बागान भी उनके लिए महत्वपूर्ण वैकल्पिक आवास और आवाजाही के गलियारों के रूप में काम करते हैं। इससे हाथियों का इंसानी आबादी के साथ संपर्क बढ़ता है।
धान की खेती के मौसम में, खासकर मानसून के बाद, मादा-नेतृत्व वाले झुंडों के विचरण क्षेत्र में काफी विस्तार देखा गया। उनका वार्षिक विचरण क्षेत्र अक्सर 500 वर्ग किलोमीटर से अधिक रहा, जबकि कुछ झुंडों के मामले में यह लगभग 900 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया। यह अवधि मानव-हाथी संघर्ष की घटनाओं में बढ़ोतरी के समय से मेल खाती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि हाथी नदी के रास्तों का इस्तेमाल हिमालय की तलहटी के जंगलों और ब्रह्मपुत्र के घास के मैदानों के बीच उत्तर-दक्षिण दिशा में आवाजाही के लिए करते हैं।
शुष्क मौसम में उदलगुड़ी से भूटान के जोमोत्सांगखा वन्यजीव अभयारण्य तक हाथियों की आवाजाही दर्ज की गई। इससे भारत और भूटान के बीच वन्यजीव गलियारों के संरक्षण के लिए बेहतर समन्वय की आवश्यकता सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, हाथियों के कई आवागमन मार्ग सड़क, रेलवे लाइन और आबादी वाले क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। इससे ट्रेन की टक्कर और बिजली के करंट से हाथियों की मौत का खतरा बढ़ जाता है। असम के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक विनय गुप्ता ने कहा कि यह रिपोर्ट हाथियों के विचरण क्षेत्र और मानव गतिविधियों के साथ उनके मेल से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है। इससे संरक्षण और सह-अस्तित्व की रणनीतियों को मजबूत करने में मदद मिलेगी। वहीं, WWF-India के एलीफेंट कंजर्वेशन प्रोग्राम के प्रमुख अरित्रा क्षेत्री ने कहा कि अध्ययन से हाथियों के प्रमुख और वैकल्पिक आवासों के साथ-साथ उनके मौसमी व्यवहार की पहचान हुई है, जो संघर्ष रोकने की सक्रिय रणनीति बनाने में उपयोगी होगी।
रिपोर्ट में जिला स्तर पर समन्वय समितियां बनाने, बिजली के करंट से होने वाली मौतों को रोकने के उपाय लागू करने, शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने, चाय बागानों की बस्तियों में बेहतर प्रकाश व्यवस्था करने, बिजली से युक्त बाड़ों की सावधानीपूर्वक योजना बनाने और बागानों के भीतर हाथियों के आवासों को बहाल करने की सिफारिश की गई है। इसके साथ ही, अधिक हाथियों पर GPS कॉलर लगाने का सुझाव भी दिया गया है।
अध्ययन असम में रेलवे ट्रैक पर हाथियों की सुरक्षा के लिए विकसित की जा रही AI-आधारित अलर्ट प्रणालियों जैसे प्रयासों को भी मजबूती देता है, जिनसे संभावित ट्रेन-हाथी टक्करों को टालने में मदद मिली है। एशियाई हाथियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के बावजूद असम में आवासों का विखंडन मानव-हाथी संघर्ष की चुनौती बढ़ा रहा है। अधिकारियों को उम्मीद है कि GPS से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर पूरे क्षेत्र को ध्यान में रखकर संरक्षण योजनाएं बनाई जा सकेंगी और मनुष्यों तथा हाथियों के बीच सुरक्षित सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने की दिशा में प्रगति होगी।
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