भारत का तेजी से बढ़ता सीमेंट उद्योग देश के वर्ष 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। बुनियादी ढांचे और शहरीकरण की बढ़ती मांग के कारण सीमेंट उत्पादन में भारी वृद्धि होने की संभावना है, जिससे 2070 तक वार्षिक उत्सर्जन 1,323 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। सीमेंट निर्माण की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से कार्बन-प्रधान होती है, जिसमें लगभग 35-40 प्रतिशत उत्सर्जन भट्टियों को गर्म करने (कोयला/पेटकोक) और आधे से अधिक उत्सर्जन चूना पत्थर को क्लिंकर में बदलने की रासायनिक प्रक्रिया से होता है। नीति आयोग के डीकार्बोनाइजेशन रोडमैप के अनुसार, इस उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए नगरपालिका के ठोस कचरे से तैयार वैकल्पिक ईंधन (RDF) का उपयोग बढ़ाने, क्लिंकर की मात्रा कम करने और कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) जैसी तकनीकों को तेजी से अपनाने की आवश्यकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : भारत में तेजी से बढ़ता सीमेंट उद्योग देश के वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है।
औद्योगिक विश्लेषणों और नीतिगत रोडमैप के अनुसार, बुनियादी ढांचे, आवास और शहरीकरण की बढ़ती जरूरतों के कारण सीमेंट उत्पादन में भारी वृद्धि होने की संभावना है।
ऐसे में उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए स्वच्छ तकनीकों और वैकल्पिक ईंधनों को तेजी से अपनाना जरूरी होगा। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 13 प्रतिशत है।
देश में 300 से अधिक सीमेंट विनिर्माण इकाइयां हैं, जो सालाना करीब 391 मिलियन टन सीमेंट का उत्पादन करती हैं। इस क्षेत्र से लगभग 246 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (CO₂e) उत्सर्जन होता है, जो भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 6 से 7 प्रतिशत है। विश्लेषण के मुताबिक, यदि मौजूदा कारोबारी रुझान जारी रहते हैं, तो सीमेंट क्षेत्र का वार्षिक उत्सर्जन वर्ष 2047 तक बढ़कर 945 मिलियन टन और 2070 तक 1,323 मिलियन टन तक पहुंच सकता है।
उत्पादन में संभावित वृद्धि के कारण उत्सर्जन कम करना उद्योग और नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती होगा। सीमेंट निर्माण की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से कार्बन-प्रधान है। कुल उत्सर्जन का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा भट्टियों में सामग्री गर्म करने के दौरान निकलता है, जहां मुख्य रूप से कोयले और पेटकोक का इस्तेमाल होता है।
वहीं, आधे से अधिक उत्सर्जन चूना पत्थर को क्लिंकर में बदलने की रासायनिक प्रक्रिया से उत्पन्न होता है। इस प्रक्रिया से होने वाले उत्सर्जन को केवल स्वच्छ ऊर्जा अपनाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। भारत में प्रति टन सीमेंट उत्पादन पर वर्तमान कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता लगभग 0.62 से 0.63 टन CO₂ है। ग्लोबल सीमेंट एंड कंक्रीट एसोसिएशन और द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) के सहयोग से तैयार डीकार्बोनाइजेशन रोडमैप में इसे वर्ष 2030 तक घटाकर 0.56 टन और 2047 तक 0.51 टन प्रति टन सीमेंट करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
नीति आयोग के Roadmap for Cement Sector Decarbonisation में भी उत्सर्जन घटाने के लिए तीन प्रमुख उपायों पर जोर दिया गया है। इनमें नगरपालिका के ठोस कचरे से तैयार वैकल्पिक ईंधन (RDF) का इस्तेमाल बढ़ाना, सीमेंट में क्लिंकर की मात्रा कम करने के लिए वैकल्पिक सीमेंटयुक्त सामग्रियों का उपयोग करना और कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) तकनीक विकसित करना शामिल है।
रोडमैप के अनुसार, वर्ष 2030 तक वैकल्पिक ईंधनों से तापीय ऊर्जा की 20 प्रतिशत जरूरत पूरी करने का लक्ष्य हासिल होने पर संचयी उत्सर्जन में लगभग 80 मिलियन टन CO₂e की कमी लाने की संभावना है। इससे कचरे के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय सीमेंट संयंत्र ऊर्जा दक्षता के मामले में दुनिया के अग्रणी संयंत्रों में शामिल हैं, लेकिन दक्षता में सुधार की संभावनाएं अब सीमित होती जा रही हैं। उत्सर्जन में व्यापक कमी लाने के लिए वैकल्पिक ईंधनों, नवीकरणीय बिजली, अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति और कम क्लिंकर वाले सीमेंट की ओर बढ़ना आवश्यक होगा। इनमें लाइमस्टोन कैल्साइंड क्ले सीमेंट भी शामिल है।
हालांकि, इन उपायों को बड़े पैमाने पर लागू करने में लागत, बुनियादी ढांचे की कमी, कचरे की नियमित आपूर्ति और नियामकीय समर्थन जैसी बाधाएं हैं। कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण तकनीक को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए भी बड़े निवेश की जरूरत होगी। देश की प्रमुख सीमेंट कंपनियां हरित ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य निर्धारित करने की दिशा में काम कर रही हैं।
इसके बावजूद, यदि उत्पादन तेजी से बढ़ता रहा और प्रति टन सीमेंट उत्सर्जन में पर्याप्त कमी नहीं आई, तो कुल कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि सीमेंट उद्योग को कम कार्बन वाली विकास प्रक्रिया से जोड़ने के लिए वैकल्पिक ईंधनों को प्रोत्साहन, मिश्रित सीमेंट के मानकों में आवश्यक बदलाव और राष्ट्रीय स्तर पर CCUS मिशन जैसी नीतिगत पहल महत्वपूर्ण होंगी। इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से ही भारत के वर्ष 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने की प्रतिबद्धता के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
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