बेंगलुरु की विभिन्न झीलों में बढ़ता मानवीय कचरा—विशेषकर प्लास्टिक, मछली पकड़ने के जाल और पूजा में इस्तेमाल होने वाले कपड़े—जलीय पक्षियों, खासकर ‘इंडियन डार्टर’ (सांप पक्षी) के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। डार्टर की अनूठी शारीरिक बनावट और चोंच की संरचना के कारण कचरा उसमें आसानी से फंस जाता है, जिससे वे शिकार करने में असमर्थ हो जाते हैं और कुपोषण या मौत का शिकार बन रहे हैं। पक्षी प्रेमियों और बचाव केंद्रों (जैसे एआरआरसी) का कहना है कि यह समस्या कम से कम 10 प्रमुख झीलों में फैल चुकी है, जिसके समाधान के लिए केवल पक्षियों को बचाना ही नहीं, बल्कि झीलों में कचरा फेंकने पर रोक लगाना और जन-जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। बेंगलुरु की झीलों में बढ़ता मानवीय कचरा अब जलीय पक्षियों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। भारतीय डार्टर, जिसे स्नेक बर्ड या सांप पक्षी के नाम से भी जाना जाता है, प्लास्टिक, मछली पकड़ने के जाल और पूजा में इस्तेमाल होने वाले कपड़ों समेत विभिन्न प्रकार के कचरे की चपेट में आकर घायल हो रहे हैं और कई मामलों में उनकी मौत हो रही है।
पक्षी प्रेमियों और वन्यजीव बचावकर्ताओं के अनुसार, यह समस्या किसी एक झील तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि शहर की कई झीलों में लगातार सामने आ रही है।
पक्षी प्रेमी और फोटोग्राफर रेणुका सेल्वमणि ने The Hindu से बातचीत में बताया कि डोड़्डानेकुंडी झील में हाल के महीनों में डार्टर समेत अन्य पक्षियों के संकट में फंसने की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उनके अनुसार, जहां पहले वर्ष में एक-दो ऐसे मामले सामने आते थे, वहीं अब लगभग हर सप्ताह किसी न किसी पक्षी को बचाव की आवश्यकता पड़ रही है। एवियन एंड रेप्टाइल रिहैबिलिटेशन सेंटर (एआरआरसी) की कार्यकारी निदेशक जयंती कल्लम ने The Hindu से बातचीत में बताया कि ऐसी घटनाएं बेंगलुरु की कम से कम 10 झीलों से सामने आ रही हैं।
इनमें डोड़्डानेकुंडी, जक्कूर, येलहंका, राचेनहल्ली, हेसरघट्टा, सांपेंगहल्ली, लालबाग और चेल्केरे जैसी झीलें शामिल हैं। डार्टर अपने लंबे और पतले शरीर, लंबी गर्दन तथा नुकीली चोंच के कारण आसानी से पहचाने जाते हैं। पानी के भीतर शिकार करने के लिए उनकी चोंच बेहद उपयोगी होती है। वे तेज गति से मछलियों को भेदकर पकड़ सकते हैं।
हालांकि, यही शारीरिक बनावट उन्हें मानव निर्मित कचरे के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील भी बनाती है। रेणुका सेल्वमणि ने The Hindu से बातचीत में बताया कि डार्टर की चोंच में जब कोई प्लास्टिक, धागा या कपड़े का टुकड़ा फंस जाता है, तो पक्षी के लिए उसे बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि कुछ अन्य पक्षियों के विपरीत डार्टर के पास अपनी चोंच को साफ करने के लिए पैरों का इस्तेमाल करने की समान क्षमता नहीं होती। ऐसे में पक्षी सिर झटकने और शरीर को हिलाने की कोशिश करता है, लेकिन चोंच में फंसी वस्तु कई बार नहीं निकल पाती। बचावकर्ताओं के मुताबिक, झीलों में फेंका जाने वाला हर तरह का कचरा समान रूप से खतरनाक नहीं है, लेकिन प्लास्टिक की थैलियां, मछली पकड़ने के जाल और पूजा से जुड़े कपड़े डार्टर के लिए विशेष जोखिम पैदा करते हैं।
जयंती कल्लम ने The Hindu से बातचीत में कहा कि पूजा के बाद झीलों में फेंके जाने वाले कपड़ों को लोग अक्सर हानिरहित मान लेते हैं, लेकिन पक्षियों के लिए यह गंभीर खतरा बन सकता है। रंगीन कपड़े या उनके टुकड़े पक्षियों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। उन्हें भोजन समझकर निगलने या चोंच से उठाने की कोशिश में कपड़ा चोंच में फंस सकता है। एक बार कचरा चोंच में फंस जाने के बाद डार्टर के लिए मछली पकड़ना लगभग असंभव हो सकता है। भोजन नहीं मिलने से पक्षी धीरे-धीरे कमजोर और कुपोषित होने लगता है। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहने पर उसकी हालत गंभीर हो जाती है और अंततः उसकी मौत भी हो सकती है।
बचाव दल जब ऐसे पक्षियों तक पहुंचते हैं, तब तक कई पक्षी अत्यधिक कमजोर हो चुके होते हैं। बचाव अभियान को लेकर भी कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं। एआरआरसी की टीम पक्षियों को खोजने और बचाने के लिए नाव, ड्रोन और दूरबीन जैसे उपकरणों का इस्तेमाल करती है।
हालांकि, डार्टर बेहद सतर्क पक्षी होते हैं और खतरा महसूस होने पर तेजी से उड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। इस वजह से कचरे में फंसे किसी पक्षी तक समय रहते पहुंचना हमेशा संभव नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल घायल पक्षियों को बचाना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। झीलों में कचरा पहुंचने से रोकना और लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना भी उतना ही जरूरी है। पूजा सामग्री, कपड़े, प्लास्टिक और मछली पकड़ने के जाल को झीलों में डालने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना होगी। पक्षी प्रेमियों और पर्यावरण समूहों ने अब लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए पोस्टर अभियान चलाने की तैयारी शुरू की है। अभियान का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि झील में फेंका गया एक छोटा-सा कचरा भी किसी पक्षी के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। बेंगलुरु की झीलें शहर के पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इन जलाशयों पर मछलियों, पक्षियों और अन्य जलीय जीवों की अनेक प्रजातियां निर्भर हैं। ऐसे में झीलों में बढ़ता कचरा केवल स्वच्छता की समस्या नहीं, बल्कि जैव विविधता और शहरी पारिस्थितिकी के लिए भी गंभीर चुनौती है। पक्षी प्रेमियों का संदेश स्पष्ट है—झीलों को कूड़ेदान न बनाया जाए। पूजा, पर्यटन या विकास के नाम पर जलाशयों में ऐसा कचरा न डाला जाए जो वन्यजीवों के लिए जानलेवा बन सकता है।
बेंगलुरु की झीलों को बचाने की जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की है जो इन जलाशयों का इस्तेमाल करते हैं और उनके आसपास रहते हैं। अब जरूरत केवल घायल पक्षियों को बचाने की नहीं, बल्कि उस कचरे को झीलों तक पहुंचने से रोकने की है, जो उनके लिए मौत का जाल बन रहा है।
Also Read: भारत का सौर ऊर्जा संकट: क्षमता तो ढेर सारी, मांग नहीं

