केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुमानों के अनुसार, भारत में हर दिन 25,000 टन से अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा उचित रूप से निस्तारित न होने के कारण नदियों के रास्ते समुद्र तक पहुंच रहा है। हालांकि राज्य बोर्डों की रिपोर्टों में यह मात्रा सालाना करीब 41 लाख टन (लगभग 11,000-12,000 टन प्रतिदिन) बताई जाती है, लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र और कम रिपोर्टिंग के कारण वास्तविक आंकड़ा 25,000 से 30,000 टन प्रतिदिन के बीच माना जाता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत में प्लास्टिक कचरे का संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुमानों के अनुसार देश में हर दिन 25,000 टन से अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा होता है।
इस कचरे का एक बड़ा हिस्सा उचित तरीके से एकत्र और निस्तारित नहीं हो पाता। नतीजतन, नदियां प्लास्टिक कचरे को शहरों और ग्रामीण इलाकों से समुद्र तक पहुंचाने वाले प्रमुख माध्यमों में बदलती जा रही हैं।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ओर से CPCB के आकलनों के आधार पर साझा किए गए आंकड़ों में भारत में प्रतिदिन करीब 25,940 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होने का अनुमान लगाया गया है।
हालांकि, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की ओर से CPCB को दी गई हालिया वार्षिक रिपोर्टों में कई वर्षों के दौरान यह मात्रा करीब 41 लाख टन सालाना रही है, जो प्रतिदिन लगभग 11,000 से 12,000 टन बैठती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्टिंग में कमी और अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े कचरे को पूरी तरह दर्ज न किए जाने के कारण वास्तविक मात्रा इससे काफी अधिक हो सकती है और व्यापक अनुमान 25,000 से 30,000 टन प्रतिदिन के बीच है।
प्लास्टिक कचरे का बड़ा हिस्सा खुले में पड़े कचरे, लैंडफिल और अनियंत्रित डंपिंग स्थलों तक पहुंच जाता है। बारिश और बाढ़ के दौरान शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों का यह कचरा नालों और जलधाराओं के रास्ते नदियों में बह जाता है।
इसके बाद नदियां इसे समुद्र तक पहुंचा देती हैं। भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां नदियों के माध्यम से समुद्र में पहुंचने वाले प्लास्टिक प्रदूषण का स्तर चिंताजनक है। इस संकट का असर केवल नदियों और समुद्री पर्यावरण तक सीमित नहीं है।
प्लास्टिक कचरे के विघटन और लैंडफिल से निकलने वाला लीचेट मिट्टी और भूजल को प्रदूषित कर सकता है। इसमें भारी धातुएं, क्लोराइड और फ्थैलेट जैसे हानिकारक रसायन पाए जा सकते हैं। दूसरी ओर, प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदलते हैं, जो जलीय जीवों के शरीर में पहुंचने के बाद खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बन सकते हैं।
शहर इस समस्या में बड़ी भूमिका निभाते हैं, क्योंकि कई शहरी निकायों के ठोस कचरे में प्लास्टिक की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। तेजी से बढ़ती आबादी, उपभोग में वृद्धि और एकल-उपयोग वाली प्लास्टिक वस्तुओं पर निर्भरता ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
सरकार ने प्लास्टिक कचरे को नियंत्रित करने के लिए प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स के तहत कई कदम उठाए हैं। जुलाई 2022 से चिन्हित एकल-उपयोग वाली प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लागू किया गया है। इसके अलावा एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) व्यवस्था के तहत प्लास्टिक पैकेजिंग के संग्रह और पुनर्चक्रण की जिम्मेदारी उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों पर डाली गई है।
वर्ष 2022 के बाद EPR व्यवस्था के तहत लाखों टन पैकेजिंग कचरे के प्रसंस्करण का दावा किया गया है और नियमों के उल्लंघन पर जब्ती तथा जुर्माने की कार्रवाई भी हुई है। इसके बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं।
कचरे को स्रोत पर अलग करने की व्यवस्था, संग्रहण और प्रसंस्करण की क्षमता तथा लचीले और बहु-परत वाले प्लास्टिक के पुनर्चक्रण की सीमाएं बड़ी बाधाएं हैं। सबसे महत्वपूर्ण चुनौती प्लास्टिक कचरे को नदियों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में पहुंचने से रोकना है।
पर्यावरण विशेषज्ञों और संगठनों का कहना है कि संकट से निपटने के लिए स्रोत पर कचरे का अनिवार्य पृथक्करण, आधुनिक कचरा प्रबंधन ढांचे का विस्तार, प्लास्टिक उत्पादन और अनावश्यक इस्तेमाल में कमी तथा नदियों में प्रदूषण की बेहतर निगरानी जरूरी है। यदि प्लास्टिक कचरे के रिसाव को रोकने और संग्रहण-पुनर्चक्रण व्यवस्था को तेजी से मजबूत करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका दबाव भारत की नदियों, समुद्री पारिस्थितिकी, जैव विविधता और अंततः सार्वजनिक स्वास्थ्य पर और बढ़ सकता है।
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