संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार और ऊर्जा दक्षता में सुधार के चलते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की वृद्धि दर धीमी पड़ रही है। हालांकि कुल उत्सर्जन में अभी भी वृद्धि जारी है, लेकिन सौर और पवन ऊर्जा के बढ़ते योगदान से कोयले पर निर्भरता का प्रभाव कुछ हद तक कम हुआ है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि सूर्यास्त के बाद शाम के समय बिजली की मांग पूरी करना एक बड़ी चुनौती है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : सौर और पवन ऊर्जा का बढ़ता योगदान, शाम के समय बिजली की मांग पूरी करना अब भी बड़ी चुनौती नई दिल्ली/नैरोबी। भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की वृद्धि दर धीमी पड़ रही है। इसकी प्रमुख वजह नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में लगातार हो रहा विस्तार और ऊर्जा दक्षता में सुधार है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, देश में कुल उत्सर्जन का स्तर अभी भी ऊंचा है और इसमें वृद्धि जारी है, लेकिन इसकी रफ्तार पहले की तुलना में कम हुई है। सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन में बढ़ोतरी से बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने में कोयला आधारित बिजली पर निर्भरता के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल रही है। हालांकि, बिजली व्यवस्था के सामने शाम के समय मांग पूरी करना बड़ी चुनौती बना हुआ है। दिन में सौर ऊर्जा से पर्याप्त बिजली मिलती है, लेकिन सूर्यास्त के बाद इसका उत्पादन घट जाता है।
ऐसे में घरेलू और व्यावसायिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ जाती है। यूएनईपी के विश्लेषण में ऊर्जा भंडारण, मांग प्रबंधन और बिजली उत्पादन व्यवस्था में लचीलापन बढ़ाने को आवश्यक बताया गया है। इसके लिए बैटरी स्टोरेज, पंप्ड हाइड्रो परियोजनाओं और सौर-पवन ऊर्जा के संयुक्त संयंत्रों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई गई है। रिपोर्ट में भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर अपेक्षाकृत कम होने और देश की विकास संबंधी जरूरतों का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बिजली क्षेत्र का तेजी से कार्बन मुक्त होना जरूरी बताया गया है।
सौर मॉड्यूल और पवन टर्बाइन के घरेलू निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं और राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को सकारात्मक पहल के रूप में देखा गया है। हालांकि, ट्रांसमिशन नेटवर्क की सीमाएं, भूमि अधिग्रहण और ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं के लिए वित्त की उपलब्धता अब भी चुनौतियां हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, उत्सर्जन वृद्धि दर में कमी महत्वपूर्ण है, लेकिन दीर्घकाल में वास्तविक उत्सर्जन में कटौती भी जरूरी होगी। इसके लिए परिवहन और उद्योगों का विद्युतीकरण, भवनों में ऊर्जा दक्षता तथा ऊर्जा की खपत का बेहतर प्रबंधन आवश्यक है।

