‘नेचर’ (Nature) पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, जुलाई 2021 से अप्रैल 2023 के बीच पूर्वी अंटार्कटिका में हुई असामान्य रूप से भारी बर्फबारी के कारण अंटार्कटिक बर्फ की चादर (Ice Sheet) में लगभग 695 अरब टन (गीगाटन) की अस्थायी बढ़ोतरी दर्ज की गई। GRACE और GRACE-FO उपग्रह मिशनों के डेटा विश्लेषण से पता चला है कि इस वृद्धि का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा पूर्वी अंटार्कटिका के क्वीन मैरी लैंड और विल्क्स लैंड क्षेत्रों में केंद्रित था।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : पूर्वी अंटार्कटिका में 2021 के मध्य से 2023 की शुरुआत के बीच असामान्य रूप से हुई भारी बर्फबारी ने अंटार्कटिक बर्फ की चादर के दीर्घकालिक नुकसान को कुछ समय के लिए संतुलित कर दिया। Nature में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, इस अवधि में अंटार्कटिक आइस शीट के द्रव्यमान में लगभग 695 अरब टन की अस्थायी बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो पिछले दो दशकों में 22 महीनों की अवधि के दौरान सबसे बड़ी वृद्धि थी।
GRACE और GRACE-FO उपग्रह मिशनों से प्राप्त गुरुत्वाकर्षण संबंधी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि जुलाई 2021 से अप्रैल 2023 के बीच अंटार्कटिका ने लगभग 695 गीगाटन बर्फ का द्रव्यमान हासिल किया। इसका करीब 68 प्रतिशत हिस्सा पूर्वी अंटार्कटिका के क्वीन मैरी लैंड और विल्क्स लैंड क्षेत्रों में केंद्रित था। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस असामान्य बर्फबारी का कारण अंटार्कटिका के स्थानीय हालात या वैश्विक तापमान वृद्धि की कोई स्थायी प्रतिक्रिया नहीं था। इसके पीछे हजारों किलोमीटर दूर स्थित उष्णकटिबंधीय समुद्री क्षेत्र में कई वर्षों तक बना समुद्री सतह का असामान्य तापमान प्रमुख कारक था।
2021 से 2023 के दौरान पश्चिमी प्रशांत महासागर और पूर्वी हिंद महासागर के बीच स्थित ट्रॉपिकल वार्म पूल में समुद्र की सतह अपेक्षाकृत गर्म रही। इस गर्मी ने वायुमंडल में रॉस्बी तरंगों की एक श्रृंखला को जन्म दिया, जो ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बढ़ी। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी अंटार्कटिका के ऊपर उच्च दबाव की स्थिति बनी और नमी के परिवहन का स्वरूप बदल गया।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस बदलाव ने मुख्य रूप से मध्य-अक्षांश वाले हिंद महासागर से नमी से भरी हवाओं को अंटार्कटिका की ओर पहुंचाया। इसके चलते लंबे समय तक भारी बर्फबारी हुई, जिसमें एटमॉस्फेरिक रिवर्स यानी वायुमंडलीय नमी की अत्यधिक केंद्रित धाराओं का भी योगदान रहा। अध्ययन के प्रमुख लेखक और चीनी विज्ञान अकादमी के इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोलॉजी के शोधकर्ता युनहे वांग के अनुसार, शोध में ट्रॉपिकल वार्म पूल और पूर्वी अंटार्कटिक आइस शीट के बीच एक ऐसे जलवायु संबंध की पहचान हुई है, जिसे अब तक पर्याप्त रूप से नहीं समझा गया था। मॉडल प्रयोगों और जलवाष्प की आवाजाही के विश्लेषण ने भी संकेत दिया कि उष्णकटिबंधीय समुद्री गर्मी ने वायुमंडलीय परिसंचरण और वर्षण में बदलाव को प्रभावित किया।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह बर्फ वृद्धि अंटार्कटिका में लंबे समय से जारी बर्फ क्षरण की दिशा को नहीं बदलती। 2000 के दशक की शुरुआत से अंटार्कटिक आइस शीट औसतन लगभग 140.5 अरब टन प्रति वर्ष की दर से द्रव्यमान खो रही है। समुद्र के गर्म होने से होने वाला पिघलाव और गतिशील बर्फ नुकसान, खासकर पश्चिमी अंटार्कटिका में, इसके प्रमुख कारण हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, वार्म पूल से जुड़ी ऐसी बहुवर्षीय घटनाएं लगभग एक दशक में एक बार दोहराई जा सकती हैं। हालांकि, इनका प्रभाव वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण भविष्य में अपेक्षित धीरे-धीरे बढ़ती नमी से अलग है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पूर्वी अंटार्कटिका में हालिया बर्फ वृद्धि अस्थायी थी और बाद के वर्षों में बर्फ का नुकसान फिर शुरू हो गया। टोटेन ग्लेशियर जैसे संवेदनशील क्षेत्र भविष्य में समुद्री गर्मी के प्रति जोखिम में बने हुए हैं।
अध्ययन यह भी दर्शाता है कि अंटार्कटिका के बर्फ संतुलन पर हजारों किलोमीटर दूर स्थित उष्णकटिबंधीय महासागरों की जलवायु परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं, जिससे समुद्र-स्तर वृद्धि के भविष्य के अनुमानों को समझना और अधिक जटिल हो जाता है।

