गुजरात के कच्छ स्थित बन्नी घास के मैदानों में रहने वाले ‘मालधारी’ पशुपालक समुदाय ने खारे रेगिस्तान और भीषण गर्मी के बीच मीठा पानी तलाशने के लिए ‘वीरदा’ नामक सदियों पुरानी जल संरक्षण प्रणाली विकसित की है। इस अनोखी प्रणाली के तहत, मानसून के बाद सूखे जलाशयों (झीलों) की तलहटी में 10 से 15 फीट गहरे उथले कुएं खोदे जाते हैं, जहाँ खारे भूजल के ऊपर तैरने वाला हल्का मीठा पानी प्राप्त होता है। वीरदा के तल को घास और लकड़ियों से प्राकृतिक रूप से फिल्टर किया जाता है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन, विदेशी पौधे (Prosopis juliflora) और आधुनिकता के प्रभाव से यह पारंपरिक ज्ञान खतरे में है, फिर भी यह शुष्क क्षेत्रों में जल सुरक्षा का एक बेहतरीन और अनुकरणीय मॉडल बना हुआ है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत के सबसे गर्म और खारे इलाकों में शामिल कच्छ के विशाल बन्नी घास के मैदान में मालधारी पशुपालक समुदाय आज भी सदियों पुराने स्वदेशी ज्ञान के सहारे मीठे पानी की तलाश और उसका संरक्षण करता है।
आधुनिक जल आपूर्ति व्यवस्था के सामने जहां कई बार इस क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियां चुनौती बन जाती हैं, वहीं मालधारियों की पारंपरिक जल प्रणाली इंसानों और पशुओं दोनों के जीवन का आधार बनी हुई है।
करीब 2,600 वर्ग किलोमीटर में फैले बन्नी क्षेत्र में वर्षा बेहद कम और अनियमित होती है। यहां सालाना औसतन लगभग 300 मिलीमीटर बारिश होती है। भूजल का बड़ा हिस्सा अत्यधिक खारा है और पीने योग्य नहीं है।
गर्मियों में तापमान अक्सर 45 से 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है। ऐसे कठिन वातावरण में गाय, भैंस और ऊंट पालने वाले मालधारियों ने वर्षाजल को संरक्षित करने की एक अनूठी पारंपरिक प्रणाली विकसित की है, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘वीरदा’ (Virdas) कहा जाता है।
वीरदा प्रणाली की शुरुआत मौसमी गड्ढों या तालाबों से होती है, जिन्हें स्थानीय रूप से ‘झील’ (Jheels) कहा जाता है। ये प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित जलाशय मानसून के पानी और आसपास की नदियों से आने वाले बाढ़ के पानी को जमा करते हैं।
बारिश के बाद जब सतही पानी वाष्पित हो जाता है या लगभग 20 से 40 दिनों में इस्तेमाल हो जाता है, तब मालधारी समुदाय इन सूखे जलाशयों की तलहटी में उथले कुएं खोदता है। पीढ़ियों के अनुभव और लगातार किए गए प्राकृतिक निरीक्षण के आधार पर वे ऐसी जगह चुनते हैं, जहां हल्का मीठा पानी भारी खारे भूजल के ऊपर पतली परत के रूप में तैरता रहता है।
आमतौर पर वीरदा की गहराई 10 से 15 फीट होती है। इसका ऊपरी हिस्सा अपेक्षाकृत चौड़ा होता है, जबकि नीचे की ओर यह मजबूत किए गए चौकोर गड्ढे में बदल जाता है। इसके तल को लकड़ी के खंभों और बन्नी क्षेत्र में उपलब्ध घास की कई परतों से मजबूत किया जाता है। ये प्राकृतिक फिल्टर और संरचनात्मक सहारे का काम करते हैं।
वीरदा खोदना केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामुदायिक गतिविधि भी है। गांव या बस्ती के पुरुष मिलकर खुदाई करते हैं, जबकि जिस परिवार की जमीन या क्षेत्र में वीरदा बनाया जाता है, वह श्रमिकों के लिए भोजन और चाय की व्यवस्था करता है। कुएं से पानी निकालने के लिए रस्सियों और रबर से बनी टोकरी का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे स्थानीय रूप से ‘कोस’ या ‘चढ़ाई’ कहा जाता है।
यह पानी कई सप्ताह तक अपेक्षाकृत मीठा बना रहता है। धीरे-धीरे इसमें खारापन बढ़ने लगता है। पानी की गुणवत्ता खराब होने पर समुदाय आसपास के दूसरे वीरदा की ओर बढ़ जाता है। पुराने कुओं से गाद निकालने और उनकी सफाई का काम भी किया जाता है।
अगली मानसूनी बारिश के बाद पूरी प्रणाली फिर से पानी से भर जाती है। अध्ययनों में भी पाया गया है कि वीरदा से प्राप्त पानी पीने और पशुओं के उपयोग के लिए उपयुक्त हो सकता है। बेरदो गांव की एक मालधारी महिला ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “अगर वीरदा नहीं होगा तो हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
हमारे मवेशी मर जाएंगे।” क्षेत्र के कुछ गांवों में पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति अब भी भरोसेमंद नहीं है, ऐसे में पारंपरिक जलस्रोतों का महत्व और बढ़ जाता है। वीरदा प्रणाली केवल पानी हासिल करने की तकनीक नहीं है। यह मालधारी संस्कृति, सामुदायिक निर्णय प्रक्रिया और साझा जिम्मेदारी से गहराई से जुड़ी हुई है। सदियों के अनुभव ने समुदाय को सतही पानी के बहाव, जमीन में पानी के रिसाव और बन्नी की विशिष्ट जल-भूवैज्ञानिक संरचना को समझने की क्षमता दी है।
शोधकर्ताओं के अनुसार वीरदा को वर्षाजल संचयन के साथ-साथ कृत्रिम भूजल पुनर्भरण की एक पारंपरिक प्रणाली के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसने लंबे समय से इस शुष्क क्षेत्र में पशुपालक जीवन को सहारा दिया है। हालांकि, यह पारंपरिक ज्ञान अब कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन से वर्षा का अनिश्चित होना, बढ़ता तापमान और Prosopis juliflora जैसी आक्रामक विदेशी वनस्पति का तेजी से फैलाव बन्नी के प्राकृतिक पर्यावरण और जल व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है।
Prosopis juliflora मिट्टी और स्थानीय जल विज्ञान में बदलाव ला सकती है। इसके अलावा नई पीढ़ी में पारंपरिक ज्ञान और वीरदा बनाने की तकनीक का धीरे-धीरे कम होना भी चिंता का विषय है। कुछ गांवों में पाइपलाइन और टैंकरों पर बढ़ती निर्भरता के कारण झीलों और वीरदाओं की नियमित देखभाल भी कम हुई है।
परिणामस्वरूप कई पारंपरिक जलस्रोत उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। फिर भी लंबे सूखे के दौरान, जब आधुनिक जल आपूर्ति व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है, कई मालधारी समुदाय आज भी वीरदाओं को साफ और सक्रिय रखते हैं। संरक्षण कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं का मानना है कि वैज्ञानिक निगरानी को स्थानीय पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़कर शुष्क क्षेत्रों में जल सुरक्षा और जलवायु लचीलेपन को मजबूत किया जा सकता है।
वीरदा प्रणाली का दस्तावेजीकरण, स्थानीय समुदायों को इसके संरक्षण में सहयोग और बन्नी के पारंपरिक जलाशयों की बहाली न केवल कच्छ बल्कि देश के दूसरे खारे और सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी मॉडल बन सकती है।
बन्नी के अत्यंत कठिन पर्यावरण में मालधारियों का यह सदियों पुराना जल ज्ञान इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय समुदायों का गहरा प्राकृतिक अनुभव किस तरह उन परिस्थितियों में भी जीवनदायी संसाधनों तक पहुंच बना सकता है, जहां आधुनिक व्यवस्थाएं कई बार सीमित साबित होती हैं।
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