सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और ‘डाउन टू अर्थ’ द्वारा जारी ‘स्टेट ऑफ इंडिया’स एनवायरनमेंट 2026 (SoE 2026)’ रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी की सुरक्षित पर्यावरणीय सीमा निर्धारित करने वाली नौ में से सात ‘प्लैशटरी बाउंड्री’ (ग्रह की सीमाएं) पार हो चुकी हैं, जिसमें समुद्री अम्लीकरण पहली बार इस खतरे के दायरे में आया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और डाउन टू अर्थ ने स्टेट ऑफ इंडिया’स एनवायरनमेंट 2026 (SoE 2026) रिपोर्ट जारी करते हुए पर्यावरणीय संकट को लेकर गंभीर चेतावनी दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी की सुरक्षित पर्यावरणीय सीमा निर्धारित करने वाली नौ प्लैनेटरी बाउंड्री में से अब सात पार हो चुकी हैं। समुद्री अम्लीकरण भी पहली बार इस खतरे के दायरे में पहुंचा है। रिपोर्ट में भारत में भूजल पर बढ़ते दबाव और मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि को भी प्रमुख चिंता के रूप में रेखांकित किया गया है।
अनिल अग्रवाल डायलॉग में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि प्लैनेटरी बाउंड्री पृथ्वी की उन नौ महत्वपूर्ण प्रणालियों को दर्शाती हैं, जिनके भीतर रहकर मानव सभ्यता के सुरक्षित संचालन की संभावना बनी रहती है। नवीनतम आकलनों के आधार पर सात सीमाओं के पार होने की स्थिति दर्ज की गई है।
इनमें जलवायु परिवर्तन, जैवमंडल की अखंडता यानी जैव विविधता में कमी, भूमि उपयोग में बदलाव, मीठे पानी में परिवर्तन, नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे जैव-भूरासायनिक प्रवाह में असंतुलन, सिंथेटिक रसायनों-प्लास्टिक सहित नए प्रदूषक और समुद्री अम्लीकरण शामिल हैं।
वहीं वायुमंडलीय एरोसोल लोडिंग और समतापमंडलीय ओजोन क्षरण अभी वैश्विक सुरक्षित सीमा के भीतर हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ओजोन परत में सुधार दर्ज किया जा रहा है। रिपोर्ट में समुद्री अम्लीकरण को विशेष चिंता का विषय बताया गया है।
औद्योगिक युग से पहले की तुलना में समुद्रों का अम्लीकरण अनुमानतः 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। वातावरण से अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के कारण समुद्री जल का पीएच स्तर कम हो रहा है। इसका असर प्रवाल भित्तियों, शंख-सीपियों, प्लवकों और समुद्री खाद्य श्रृंखलाओं पर पड़ सकता है।
इससे मत्स्य पालन और तटीय समुदायों की आजीविका प्रभावित होने का खतरा है। भारत की लंबी समुद्री तटरेखा को देखते हुए यह चुनौती देश के लिए भी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में मीठे पानी के चक्र में बदलाव को भी पार की जा चुकी प्लैनेटरी बाउंड्री में शामिल किया गया है। भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और वैश्विक भूजल निकासी में करीब एक-चौथाई हिस्सेदारी भारत की है।
देश के कई आकलन क्षेत्रों में भूजल स्तर गंभीर या अति-दोहन की स्थिति में बना हुआ है। हालांकि, भूजल पुनर्भरण से जुड़े प्रयासों के चलते कुछ क्षेत्रों में सुरक्षित श्रेणी वाले आकलन इकाइयों का अनुपात बेहतर हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, नीले और हरे जल चक्र में असंतुलन से सूखा, बाढ़ और कृषि उत्पादकता में गिरावट का जोखिम बढ़ सकता है।
पर्यावास में कमी, आक्रामक प्रजातियों का प्रसार और वन्यजीवों के प्राकृतिक शिकार आधार में गिरावट मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ा रहे हैं। रिपोर्ट में लैंटाना कैमारा जैसी आक्रामक वनस्पति के प्रसार को भी चिंता का कारण बताया गया है। विभिन्न आकलनों के अनुसार यह खरपतवार भारत के वन और झाड़ीदार क्षेत्रों के लगभग आधे हिस्से तक फैल चुका है और करीब 1.3 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में इसके प्रभाव का अनुमान लगाया गया है।
लैंटाना के बढ़ते प्रसार से स्थानीय वनस्पतियों पर दबाव पड़ता है और वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक शिकार आधार प्रभावित होता है। इसके चलते बाघ जैसे मांसाहारी वन्यजीव पशुधन और मानव बस्तियों की ओर बढ़ सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में बाघ अभयारण्यों के आसपास मानव-बाघ संघर्ष में कम से कम 43 लोगों की मौत दर्ज की गई। रिपोर्ट में भारत में चरम मौसम की बढ़ती घटनाओं को भी रेखांकित किया गया है। इसके अनुसार, 2025 में करीब 99 प्रतिशत दिनों में देश के किसी न किसी हिस्से में चरम मौसम की घटना दर्ज की गई। इससे हजारों लोगों की मौत, लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को नुकसान और बड़े पैमाने पर आर्थिक क्षति हुई।
वायु गुणवत्ता निगरानी को लेकर भी रिपोर्ट ने चिंता जताई है। देश की करीब 85 प्रतिशत आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहां निरंतर वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों का प्रभावी कवरेज उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट में जैव विविधता ह्रास की तेज गति को भी गंभीर चुनौती बताया गया है और कुछ आकलनों में प्रजातियों के विलुप्त होने की दर सुरक्षित सीमा से करीब 100 गुना अधिक होने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
CSE की महानिदेशक सुनीता नारायण और रिपोर्ट के संपादकों ने कहा कि इन पर्यावरणीय सीमाओं का पार होना अचानक और गैर-रैखिक बदलावों के बढ़ते जोखिम का संकेत है। उन्होंने जलवायु लचीलापन, पर्यावास पुनर्स्थापन, टिकाऊ जल प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए मजबूत नीतिगत कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया।
स्टेट ऑफ इंडिया’स एनवायरनमेंट 2026 रिपोर्ट वैश्विक वैज्ञानिक आकलनों को भारत से जुड़े जलवायु, जल, जैव विविधता, वायु प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय आंकड़ों के साथ जोड़कर देश की पर्यावरणीय स्थिति का व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए प्रतिक्रियात्मक उपायों के बजाय वैज्ञानिक आधार पर पूर्व तैयारी, संरक्षण और दीर्घकालिक लचीलेपन को प्राथमिकता देनी होगी।
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