अस्थमा के मरीजों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है, क्योंकि देश में पहली बार पर्यावरण के अनुकूल ‘ग्रीन इनहेलर’ को बाजार में उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की विशेषज्ञ समिति ने दवा कंपनी लुपिन के ऐसे मीटर-डोज इनहेलर के निर्माण और विपणन की सिफारिश की है, जिसमें पारंपरिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस (HFC-134a) के स्थान पर पर्यावरण-अनुकूल प्रोपेलेंट गैस HFC-152a का उपयोग किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, HFC-152a आधारित इनहेलर के इस्तेमाल से कार्बन उत्सर्जन में 90 प्रतिशत से अधिक की भारी कमी लाई जा सकती है। गौरतलब है कि ब्रिटेन द्वारा जुलाई 2026 में इस तकनीक को नियामक मंजूरी दिए जाने के बाद, भारत इस आधुनिक तकनीक को अपनाने वाला दुनिया का दूसरा देश बनने की राह पर है। इस पहल से मरीजों की उपचार संबंधी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ स्वास्थ्य क्षेत्र के कार्बन फुटप्रिंट को प्रभावी ढंग से कम करने में भी मदद मिलेगी।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : अस्थमा मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाले इनहेलर अब पर्यावरण के लिहाज से भी अधिक अनुकूल हो सकते हैं। देश में पहली बार कम ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव वाले ‘ग्रीन इनहेलर’ को बाजार में उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की विशेषज्ञ समिति ने दवा कंपनी लुपिन के ऐसे मीटर-डोज इनहेलर के निर्माण और विपणन की सिफारिश की है, जिसमें पारंपरिक एचएफसी-134ए की जगह एचएफसी-152ए प्रोपेलेंट गैस का इस्तेमाल किया जाएगा।
एचएफसी-134ए एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो वायुमंडल में गर्मी को रोककर जलवायु परिवर्तन में योगदान देती है। इसके मुकाबले एचएफसी-152ए का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल काफी कम है। विशेषज्ञों के अनुसार, एचएफसी-152ए आधारित इनहेलर के इस्तेमाल से संबंधित कार्बन उत्सर्जन में 90 प्रतिशत से अधिक की कमी संभव है।
ब्रिटेन ने जुलाई 2026 में इस तरह के इनहेलर को पहली नियामक मंजूरी दी थी। भारत में विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के बाद देश इस तकनीक को अपनाने वाला दूसरा देश बनने की दिशा में बढ़ रहा है। ग्रीन इनहेलर को पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि अस्थमा के उपचार में इनहेलर का व्यापक इस्तेमाल होता है।
कम ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव वाले प्रोपेलेंट की ओर बदलाव से मरीजों की उपचार संबंधी जरूरतों को पूरा करते हुए स्वास्थ्य क्षेत्र के कार्बन फुटप्रिंट को भी कम करने में मदद मिल सकती है।
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