विश्व बैंक की नई रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया में हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) की ओर बढ़ना उम्मीद से कहीं ज़्यादा आसान है। आंद्रेस हैम, इमैनुएल होज़े वाज़्केज़, मोनिका यानेज़ पगान्स, कैमिला नुड्सन और साहेर असद जैसे शीर्ष अर्थशास्त्रियों द्वारा तैयार किए गए इस अध्ययन में भारत, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका समेत सात देशों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट का मुख्य दावा है कि इस बड़े बदलाव के लिए क्षेत्र के ज़्यादातर मज़दूरों को अपना पेशा पूरी तरह बदलने की कोई ज़रूरत नहीं होगी। इसके बजाय, श्रमिक अपने मौजूदा हुनर में मामूली बदलाव करके ही पर्यावरण-अनुकूल या हरित नौकरियों के लिए खुद को तैयार कर सकते हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दक्षिण एशिया में हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना जितना मुश्किल समझा जा रहा था, उतना नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्र के ज़्यादातर मज़दूरों को अपना पेशा पूरी तरह बदलने की बजाय अपने मौजूदा हुनर में मामूली बदलाव भर करना होगा।यह अध्ययन बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका-इन सात देशों पर केंद्रित है। इसे अर्थशास्त्रियों आंद्रेस हैम, इमैनुएल होज़े वाज़्केज़, मोनिका यानेज़ पगान्स, कैमिला नुड्सन और साहेर असद ने तैयार किया है।
आँकड़े क्या कहते हैं कि दक्षिण एशिया में हर चार में से लगभग एक नौकरी को ‘हरित’ श्रेणी में रखा जा सकता है। यह हिस्सेदारी देश-दर-देश अलग है — मालदीव में यह सबसे कम, करीब 17 प्रतिशत है, जबकि पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा, लगभग 29 प्रतिशत। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि हरित नौकरी का मतलब सिर्फ़ सोलर पैनल लगाने जैसा काम नहीं — इसमें निर्माण, विनिर्माण, कृषि, सेवाएँ और लॉजिस्टिक्स जैसे पारंपरिक क्षेत्रों की वे नौकरियाँ भी शामिल हैं जो टिकाऊ तौर-तरीकों की वजह से बदल रही हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि हरित रोज़गार का कौशल-स्तर हर देश में अलग है।
भूटान, भारत और पाकिस्तान में यह ज़्यादातर कम-कुशल कामों में है। बांग्लादेश और नेपाल में मध्यम-कुशल कामों में, जबकि श्रीलंका और मालदीव में उच्च-कुशल पेशों में इसका बोलबाला है। कितने मज़दूरों को कितनी ट्रेनिंग चाहिए, इस अध्ययन में गैर-हरित नौकरियों में काम कर रहे मज़दूरों को तीन समूहों में बाँटा गया है। इसके मुताबिक करीब 57 प्रतिशत मज़दूर सीमित प्रशिक्षण के सहारे ही हरित काम की ओर बढ़ सकते हैं। 16 प्रतिशत को मध्यम स्तर की ट्रेनिंग चाहिए होगी और शेष 27 प्रतिशत को अपने कौशल पूरी तरह नए सिरे से सीखने पड़ेंगे। देशों के बीच यह आँकड़ा काफ़ी अलग है।
भारत में शोधकर्ताओं ने पाया कि 68 प्रतिशत गैर-हरित मज़दूर सीमित प्रशिक्षण से ही आगे बढ़ सकते हैं, जबकि सिर्फ़ 19 प्रतिशत को पूरी तरह कौशल बदलने की ज़रूरत बताई गई। इसके उलट मालदीव में स्थिति ज़्यादा चुनौतीपूर्ण दिखी — यहाँ सिर्फ़ 38 प्रतिशत मज़दूर सीमित प्रशिक्षण से बदलाव कर पाएँगे, जबकि 45 प्रतिशत को पूर्ण कौशल-परिवर्तन की ज़रूरत होगी। नेपाल में मध्यम स्तर की ट्रेनिंग की ज़रूरत सबसे ज़्यादा (24 प्रतिशत) दर्ज की गई, वहीं बांग्लादेश में यह आँकड़ा सबसे कम (12 प्रतिशत) रहा।रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यह बदलाव अपने-आप नहीं होगा — इसके लिए मज़दूरों को प्रशिक्षण, प्रमाणन और नौकरी की जानकारी तक पहुँच चाहिए, कंपनियों को प्रशिक्षण में निवेश के लिए प्रोत्साहन चाहिए, और सरकारों को शिक्षा, श्रम व जलवायु नीतियों में तालमेल बिठाना होगा।
वेतन में बढ़त, पर नौकरी की सुरक्षा कमज़ोर
अध्ययन के अनुसार हरित नौकरियों में औसतन करीब 12 प्रतिशत ज़्यादा वेतन मिलता है, हालाँकि यह देश और लिंग के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। लेकिन शोधकर्ताओं ने चेताया कि इनमें से कई मज़दूर स्वरोज़गार में हैं, और वेतन पाने वालों में भी बहुत कम के पास लिखित अनुबंध या सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएँ हैं। रिपोर्ट में महिलाओं, युवाओं और अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों के लिए बेहतर संरक्षित रोज़गार सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया गया है।
नीति-निर्माताओं के लिए सुझाव
रिपोर्ट में दो-स्तरीय रणनीति का सुझाव दिया गया है। पहला, मौजूदा कार्यबल के लिए छोटे कोर्स, मॉड्यूलर प्रमाणपत्र और अप्रेंटिसशिप जैसी काम-के-दौरान सीखने की व्यवस्थाएँ। दूसरा, स्कूलों, तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों की मौजूदा पाठ्यक्रम-प्रणाली में ही हरित कौशल को पिरोना, बजाय अलग से नया “हरित पाठ्यक्रम” बनाने के।
रिपोर्ट में विश्व बैंक की दक्षिण एशिया में चल रही परियोजनाओं का भी ज़िक्र है। भारत में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) को उद्योग-अनुकूल बनाने की पहल चल रही है, जबकि बांग्लादेश में एक परियोजना कौशल-विकास तंत्र में हरित ट्रेड को शामिल करने पर काम कर रही है।शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि दक्षिण एशिया में हरित रोज़गार पहले से मौजूद हैं, और बड़ी संख्या में मज़दूर समझे जाने से कहीं ज़्यादा इनके करीब हैं — बशर्ते उन्हें सही प्रशिक्षण और मौके समय पर मिलें।
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