जल्दी ही भारत अपने मित्र देश को भेजेगा छह बाघ
गृहयुद्ध के कारण वहां सरकार नहीं ध्यान दे पाई थी बाघों पर

एनवायरमेंट पल्स डेस्क
भारत अपने पुराने मित्र और अंकोरवाट मंदिर के लिए मशहूर दक्षिण पूर्व एशियाई देश कंबोडिया को जल्दी ही छह बाघ भेजेगा। वर्ष 2016 में कंबोडिया को बाघविहीन देश घोषित किया गया था, जो वहां के वन्यजीव प्रेमियों के लिए बड़ा झटका था। इस संबंध में 2022 में भारत-कंबोडिया के बीच एक समझौता हुआ था, जिसका पालन करते हुए भारत पहली खेप में छह बाघों (बंगाल टाइगर्स) को कंबोडिया भेजेगा।
कंबोडिया को छह बाघ भेजने के बाद कुछ दिनों तक देखा जाएगा। अगर यह प्रयोग सफल रहा अर्थात ये बाघ वहां के माहौल में जीवित रहे, प्रजनन करके अपनी संख्या बढ़ाने में सफल रहे तो भारत वहां पर 12 और बाघ भेजेगा।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत बाघों के संरक्षण के लिए कार्य कर रही संस्था इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस का सदस्य है। इसके नाते वह बाघों के संरक्षण और संवर्धन पर खास ध्यान दे रहा है। भारत ने अपने यहां जिस तरह बाघों का संरक्षण किया है, वह दुनिया के लिए एक मिसाल है। इसीलिए कंबोडिया ने भारत से बाघों की मांग की है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि कंबोडिया में पहले बाघ थे लेकिन 1980 के बाद लंबे समय से गृहयुद्ध में फंसे रहने के कारण सरकार बाघों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दे पाई और शिकारियों ने बाघों का शिकार करके देश को बाघविहीन कर दिया।
कंबाडिया ने 2016 में अपने यहां राष्ट्रीय बाघ प्रोजेक्ट को मंजूरी दी। बाद में 2022 में भारत के साथ समझौता किया। इसी कड़ी में ये बाघ वहां भेजे जा रहे हैं।
भारत में बाघों की स्थिति
2022 की पशुगणना के मुताबिक भारत में 3682 बाघ हैं। यह दुनिया के बाघों की आबादी का 70 प्रतिशत है। कह सकते हैं कि भारत इस मामले में बहुत ही समृद्ध है।
दुनिया में दूसरा मामला
एक देश से दूसरे देश बाघ भेजने और उन्हें पुनर्वासित करने का यह दुनिया में दूसरा मामला है। इसके पहले नीदरलैंड से कुछ बाघों को कजाकिस्तान भेजा गया था।
नामीबियाई चीतों जैसी पहल
यह उसी किस्म की पहल है, जिसके तहत 2022 में भारत ने नामीबिया से चीतों को मंगवाया था, जो हमारे यहां विलुप्त हो चुके थे। ये चीते मध्य प्रदेश के कूनो पार्क में रखे गए थे। अब ये चीते भारत की जलवायु में न केवल रच-बस चुके हैं बल्कि इन्होंने अपना परिवार भी बढ़ा लिया है। इसके पहले 1952 में चीतों को भारतीय वनों से पूरी तरह विलुप्त घोषित किया गया था।


