भारत सरकार इसकी प्रक्रिया पर एतराज जताकर खारिज कर चुकी है इस सूचकांक को
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
नई दिल्ली। इस साल की रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (EPI) 2026 में एस्टोनिया ने बाजी मारी है। यानी एस्टोनिया को पहली रैंक मिली, जबकि भारत की हालत काफी खराब रही, भारत 177 देशों में 176वें नंबर पर रहा।
इस रिपोर्ट ने साफ दिखाया कि देशों के बीच पर्यावरण के मामले में गहरी असमानता है। यह सूचकांक येल सेंटर फॉर एनवायरमेंटल लॉ एंड पॉलिसी, कोलंबिया यूनिवर्सिटी और येल सेंटर फॉर जियोस्पेशियल सॉल्यूशंस ने मैककॉल मैकबेन फाउंडेशन की मदद से मिलकर तैयार किया। इस बार 177 देशों को 47 संकेतकों और 12 प्रमुख पर्यावरणीय श्रेणियों के हिसाब से परखा गया।
रिपोर्ट बताती है कि एस्टोनिया ने 74.79 अंक के साथ टॉप किया। उसके बाद लक्ज़मबर्ग, यूके, फिनलैंड और नीदरलैंड टॉप 5 में हैं। जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन और ऑस्ट्रिया भी टॉप 10 में पहुंचे। इन देशों ने साफ ऊर्जा इस्तेमाल, कार्बन कटौती, जैव-विविधता बचाने और प्रभावी पर्यावरण नीति लागू करने में अच्छा काम किया है।
भारत की स्थिति बड़ी कमजोर रही। भारत को सिर्फ 22.46 अंक मिले, जबकि क्षेत्रीय औसत 31.81 है। रिपोर्ट में साफ लिखा है कि भारत में वायु प्रदूषण, जैव विविधता बचाना और वृक्ष आवरण की कमी जैसी समस्याएं अब भी गंभीर बनी हैं। खास तौर पर प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों में ट्री कवर हानि का स्कोर -3.92 रहा।
भारत जता चुका है इस प्रक्रिया पर एतराज
भारत सरकार पहले ही पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (EPI) की प्रक्रिया पर सवाल उठा चुकी है। 2022 में जब भारत ने 180 देशों में सबसे अंतिम स्थान पाया था, तब पर्यावरण मंत्रालय ने इस सूचकांक को खारिज कर दिया था. उनका कहना था कि इसमें कई संकेतक “अवैज्ञानिक मान्यताओं” और “अनुमानों” पर बने हैं, जो असली स्थिति की सही तस्वीर नहीं दिखाते. EPI क्यों मायने रखता है?
क्या है पर्यावरण सूचकांक?
पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक यानी EPI, वायु और जल की गुणवत्ता, जैव विविधता, वन संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल का व्यापक मूल्यांकन करता है। नीति-निर्माताओं के लिए पर्यावरण चुनौतियों को समझने, नीतियों की असर जांचने और SDGs तथा पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों की दिशा मापने के लिए ये जरूरी संकेतक बन जाता है।

