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Reading: 2045 तक भारत पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाए तो 17 लाख से अधिक लोगों की बच सकती है जान: आईसीसीटी रिपोर्ट
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Environment Pulse > फ्यूचर ग्रीन > ऊर्जा > 2045 तक भारत पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाए तो 17 लाख से अधिक लोगों की बच सकती है जान: आईसीसीटी रिपोर्ट
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2045 तक भारत पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाए तो 17 लाख से अधिक लोगों की बच सकती है जान: आईसीसीटी रिपोर्ट

Environment Pulse
Last updated: July 31, 2026 7:46 pm
Environment Pulse
Published: July 31, 2026
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आईसीसीटी की रिपोर्ट में सामने आए ये तथ्य, सड़क प्रदूषण के चलते होने वाली मौतें रोकनी जरूरी

अगर पूरी दुनिया 2045 तक ईवी को अपना ले, तो 80 लाख से ज़्यादा लोगों की बच सकती है जान

एनवायरमेंट पल्स डेस्क

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इलेक्ट्रिक व्हीकल को अपनाया है लेकिन यह रफ्तार बहुत सुस्त है। अगर भारत 2045 तक पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों पर शिफ्ट हो जाए, तो 17 लाख से भी ज़्यादा लोगों की जान बचाई जा सकती है-यह दावा किया गया है इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (ICCT) की ताज़ा रिपोर्ट में। 29 जुलाई को जारी की गई यह रिपोर्ट साफ कहती है कि 2025 से लेकर 2050 के बीच सड़क परिवहन से होने वाले वायु प्रदूषण में जबरदस्त गिरावट देखी जा सकती है, बशर्ते भारत 2045 तक सभी नए वाहनों को इलेक्ट्रिक या ज़ीरो-इमिशन बना दे।

ICCT के इंडिया डायरेक्टर अमित भट्ट मानते हैं कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स ही एकमात्र रास्ता हैं जिससे एग्जॉस्ट से निकल रहे ज़हर को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। वो कहते हैं कि देश के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को जल्द से जल्द इलेक्ट्रिक बनाना ज़रूरी है, वरना ये पॉल्यूशन कंट्रोल करना मुश्किल हो जाएगा।

रिपोर्ट में दो रास्तों की तुलना हुई—एक तो वही पुरानी, धीमी रफ्तार की मौजूदा नीतियां, दूसरी वो जिसमें भारत 2045 तक सभी नए वाहनों को पूरी तरह इलेक्ट्रिक कर दे। अगर दूसरा रास्ता अपनाया तो 2050 तक 17 लाख से ज्यादा लोगों की मौत टल सकती है, और करीब 97 हज़ार बच्चों को अस्थमा से बचाया जा सकता है।

ये असर केवल भारत तक सीमित नहीं है। अगर पूरी दुनिया 2045 तक इलेक्ट्रिक वाहनों को अपना ले, तो 80 लाख से ज़्यादा लोगों की जान बच सकती है। अब अगर सरकार सिर्फ अभी वाली नीति पर टिकी रही और बड़ा बदलाव नहीं हुआ, तो 2050 तक पॉल्यूशन से समयपूर्व मौतें और बढ़ती रहेंगी। पीएम2.5, नाइट्रोजन ऑक्साइड, और कार्बन डाइऑक्साइड में मामूली गिरावट आएगी, पर अमोनिया का प्रदूषण तो डबल हो सकता है, क्योंकि उसके लिए कोई मजबूत नीति है ही नहीं।

अगर तेजी से इलेक्ट्रिक व्हीकल्स अपनाए जाएं, तो 2050 तक पीएम2.5, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे खतरनाक प्रदूषकों की मात्रा 60 से 90 प्रतिशत तक घट सकती है।

दिल्ली-एनसीआर की हालत सबसे ज्यादा खराब

दिल्ली-एनसीआर की हालत वैसे भी सबसे खराब है। देश की आबादी में जहां 5 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ दिल्ली-एनसीआर का है, वहीं वहां 9 प्रतिशत समयपूर्व मौतें और 23 प्रतिशत बच्चे अस्थमा के शिकार हो रहे हैं, वो भी सड़क परिवहन के प्रदूषण की वजह से। ICCT की लिंगझी जिन बताती हैं कि यहां बच्चे सब से ज्यादा प्रभावित हैं, क्योंकि आबादी घनी है और गाड़ियों की वजह से हवा लगातार खराब बन जाती है।

दिल्ली ने जो इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी अपनाई है, वो सही दिशा में एक ज़रूरी कदम है। अमित भट्ट का कहना है—ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली ने क्लियर टारगेट सेट किए, वैसे ही पूरे देश के लेवल पर ठोस और बड़े लक्ष्य चाहिए। मामला सिर्फ जलवायु परिवर्तन तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहनों पर शिफ्ट करना, लोगों को सांस लेने लायक साफ हवा दिला सकता है, पब्लिक हेल्थ को फायदा पहुंचा सकता है और लाखों लोगों की जान बचा सकता है।

(Photo : AI)

 

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