पश्चिमी घाट में स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षित ‘सैकर्ड ग्रोव्स’ (पवित्र वनखंड) देशज वनों के पुनर्जनन और दीर्घकालिक पारिस्थितिक लचीलेपन के लिए सामान्य बस्तियों की तुलना में अधिक प्रभावी साबित हो रहे हैं। PLOS One में प्रकाशित अध्ययन (AERF और मियामी विश्वविद्यालय द्वारा) के अनुसार, पवित्र वनखंडों में विशाल वृक्षों की प्रजातीय विविधता बस्तियों की तुलना में लगभग दोगुनी है। यहाँ बहेरा जैसे देशज और औषधीय पेड़ अधिक पाए गए हैं, जबकि बस्तियों में फलदार पेड़ों का प्रभुत्व है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत के पश्चिमी घाट में स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षित पवित्र वनखंड यानी ‘सैकर्ड ग्रोव्स’ आसपास के सामान्य मानवीय परिदृश्यों की तुलना में देशज वनों के पुनर्जनन और दीर्घकालिक पारिस्थितिक लचीलेपन के लिए अधिक प्रभावी साबित हो रहे हैं। हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है।
PLOS One में प्रकाशित एक अध्ययन में पुणे स्थित Applied Environmental Research Foundation (AERF) और अमेरिका की Miami University के शोधकर्ताओं ने उत्तरी पश्चिमी घाट के वंजोले गांव में विशाल पुराने पेड़ों का अध्ययन किया। चार पवित्र वनखंडों और दो आसपास की बस्तियों में एक मीटर से अधिक तने की परिधि वाले 82 विशाल पेड़ों का आकलन किया गया।
अध्ययन में पवित्र वनखंडों में विशाल वृक्षों की 20 प्रजातियों में से 12 ऐसी मिलीं, जो केवल इन्हीं क्षेत्रों में मौजूद थीं। यहां विशाल वृक्षों की प्रजातीय विविधता बस्तियों की तुलना में लगभग दोगुनी थी। वहीं, बस्तियों में आम और कटहल जैसे फलदार पेड़ों का प्रभुत्व था, जबकि पवित्र वनखंडों में बहेरा जैसे देशज और औषधीय पेड़ अधिक पाए गए।
सबसे महत्वपूर्ण अंतर युवा पौधों के पुनर्जनन में सामने आया। बड़े बीजों वाले काजरा या कुचला (Strychnos nux-vomica) के पौधे 77 प्रतिशत पवित्र वनखंडों के वृक्षों के नीचे पाए गए, जबकि बस्तियों में यह आंकड़ा केवल 5 प्रतिशत था। इसी तरह फिशटेल पाम (Caryota urens) के पौधे क्रमशः 91 प्रतिशत और 47 प्रतिशत वृक्षों के नीचे मिले।
शोधकर्ताओं के अनुसार, विशाल पुराने पेड़ पक्षियों के लिए ‘इकोलॉजिकल कैचर’ की तरह काम करते हैं। उनकी बड़ी शाखाएं और प्राकृतिक खोखल पक्षियों को आश्रय देते हैं, जबकि ये पक्षी बीजों को दूर-दराज तक पहुंचाते हैं। पवित्र वनखंडों का अपेक्षाकृत कम प्रभावित वनतल इन बीजों के अंकुरण और विकास के लिए बेहतर परिस्थितियां उपलब्ध कराता है।
अध्ययन के सह-लेखक केविन मैटेसन ने कहा कि बस्तियां व्यवस्थित बागों जैसी हैं, जबकि पवित्र वनखंड पारिस्थितिक ‘टाइम कैप्सूल’ की तरह हैं। प्रथम लेखक ओंकार पई के अनुसार, औसतन करीब 6,500 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाले छोटे पवित्र वनखंड भी इस बात के महत्वपूर्ण ‘रेफरेंस फॉरेस्ट’ हैं कि व्यापक मानवीय हस्तक्षेप से पहले क्षेत्र की जैवविविधता कैसी रही होगी। पश्चिमी घाट के अन्य अध्ययनों में भी पाया गया है कि सामुदायिक संरक्षण वाले इन वनखंडों में कई स्थानों पर पुराने और अधिक परिपक्व पेड़, अधिक बेसल एरिया, स्थानिक प्रजातियों और सदाबहार वनस्पतियों की बेहतर मौजूदगी तथा अधिक कार्बन संचयन क्षमता देखी गई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पवित्र वनखंडों को केवल अलग-अलग पेड़ों या कानूनी संरक्षित क्षेत्रों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। इन क्षेत्रों को बचाने वाली पारंपरिक सांस्कृतिक व्यवस्थाएं बीज प्रसार, बड़े पक्षियों के आवास और प्राकृतिक वन पुनर्जनन जैसी विशिष्ट पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान करती हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में पश्चिमी घाट के भविष्य के लचीले और विविधतापूर्ण वनों के निर्माण के लिए इन वनखंडों और उनसे जुड़ी सामुदायिक परंपराओं का संरक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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