वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार भारत के औसत दशकीय तापमान में लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है, जो बढ़ते जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। इस तापमान वृद्धि के कारण हीट स्ट्रेस, चरम मौसम की घटनाओं, और कृषि व जल संसाधनों पर दबाव जैसी चुनौतियां बढ़ रही हैं, जिससे निपटने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और जलवायु-अनुकूल रणनीतियों को अपनाने की आवश्यकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत में तापमान बढ़ने का सिलसिला लगातार जारी है। हालिया वैज्ञानिक आकलनों में देश के औसत दशकीय तापमान में करीब 0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है।
लंबे समय के मौसम संबंधी आंकड़ों के विश्लेषण से सामने आया यह रुझान देश में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों की ओर स्पष्ट संकेत करता है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, लगातार आने वाले दस-वर्षीय दौर में औसत तापमान में वृद्धि दर्ज की गई है।
तापमान में यह बदलाव भारतीय उपमहाद्वीप में देखे जा रहे व्यापक वैश्विक तापमान वृद्धि के रुझान के अनुरूप है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस बढ़ोतरी के पीछे ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन, भूमि उपयोग में बदलाव और क्षेत्रीय जलवायु परिस्थितियों सहित कई कारक जिम्मेदार हैं।
हालांकि तापमान वृद्धि का प्रभाव देश के अलग-अलग हिस्सों और मौसमों में एक समान नहीं है। कुछ क्षेत्रों में गर्मी का असर अपेक्षाकृत अधिक महसूस किया जा रहा है, जिससे कृषि, जल संसाधनों, मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है।
बढ़ रहा है हीट स्ट्रेस और चरम मौसम का जोखिम वैज्ञानिकों का कहना है कि औसत तापमान में अपेक्षाकृत छोटी दिखाई देने वाली वृद्धि भी व्यापक प्रभाव पैदा कर सकती है। तापमान बढ़ने से हीट स्ट्रेस की घटनाएं अधिक गंभीर हो सकती हैं। इसके अलावा मानसून के पैटर्न में बदलाव, लंबे गर्म दौर और अत्यधिक मौसम की घटनाओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
तापमान में वृद्धि का असर कृषि क्षेत्र के लिए विशेष चिंता का विषय है। गर्मी और बारिश के बदलते स्वरूप से फसलों की वृद्धि अवधि, सिंचाई की मांग और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, बढ़ते तापमान के कारण जल स्रोतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां जल उपलब्धता पहले से सीमित है।
जलवायु अनुकूलन की जरूरत बढ़ते तापमान के इस रुझान के बीच वैज्ञानिक और नीति विशेषज्ञ जलवायु अनुकूलन उपायों को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। इनमें बेहतर मौसम पूर्वानुमान, प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम, गर्मी से बचाव की योजनाएं और संवेदनशील समुदायों के लिए स्थानीय स्तर पर तैयारी शामिल है।
साथ ही, तापमान वृद्धि की दीर्घकालिक गति को सीमित करने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों को भी तेज करने की आवश्यकता बताई जा रही है। भारत सहित दुनिया के देशों के लिए यह प्रयास राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों और वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप महत्वपूर्ण हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर के औसत तापमान के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के वास्तविक प्रभावों को समझने के लिए क्षेत्रीय और मौसमी अध्ययन भी जरूरी हैं। आने वाले समय में विस्तृत शोध से अलग-अलग राज्यों और भौगोलिक क्षेत्रों में तापमान वृद्धि के संभावित प्रभावों का अधिक सटीक आकलन किया जा सकेगा।
भारत में औसत दशकीय तापमान में 0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल भविष्य की चुनौती नहीं, बल्कि वर्तमान में महसूस किया जा रहा बदलाव है। बढ़ते तापमान के प्रभावों को कम करने के लिए उत्सर्जन नियंत्रण के साथ-साथ कृषि, जल प्रबंधन, स्वास्थ्य और शहरी नियोजन में जलवायु-अनुकूल रणनीतियों को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।
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