21 से 23 किमी की ऊंचाई पर मिली ओज़ोन की घनी परत, ARIES नैनीताल के वैज्ञानिकों ने स्वदेशी रडार
NetRAD-ASMA अभियान के तहत वैज्ञानिकों ने पहली बार स्ट्रैटोस्फीयर में ओज़ोन के प्रवाह के दिए ठोस सबूत
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर आसमान में हो रही एक असामान्य वायुमंडलीय घटना का भारतीय वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक रहस्योद्घाटन किया है। रिसर्चर्स ने समताप मंडल (Stratosphere) में लगभग 21 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर ओज़ोन का एक असामान्य रूप से घना हिस्सा देखा है, जो पूर्वी भारत के ऊपर आमतौर पर पाए जाने वाले स्तरों से काफी अधिक था।
दिन-रात बनी रही ओज़ोन की परत
यह ओज़ोन परत एक दिन से ज़्यादा समय तक उसी ऊंचाई पर स्थिर रही। दिन और रात दोनों समय ली गई रीडिंग में इसके दिखाई देने से वैज्ञानिकों ने तुरंत यह बात खारिज कर दी कि इसकी वजह सूर्य की रोशनी से होने वाली कोई रासायनिक प्रक्रिया (Photochemical Process) है।
NetRAD-ASMA अभियान और स्वदेशी रडार तकनीक
यह महत्वपूर्ण खोज NetRAD-ASMA अभियान के पहले चरण के दौरान हुई। यह एक राष्ट्रव्यापी पहल थी, जिसमें देश भर के शोध संस्थानों से एटमॉस्फेरिक रडार, वेदर बैलून, सैटेलाइट्स और कंप्यूटर मॉडल्स को एक साथ लाया गया था।
नैनीताल स्थित आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (ARIES) ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई। ARIES ने हारिंगहाटा, गडांकी और कोच्चि में सहयोगी रडार नेटवर्क के साथ मिलकर अपना स्वदेशी रूप से विकसित ‘स्ट्रैटोस्फीयर-ट्रोपोस्फीयर रडार’ संचालित किया। ARIES की ओर से इस ऐतिहासिक शोध का नेतृत्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष नाजा और डॉ. समरेश भट्टाचार्जी ने किया।
ऐसे सुलझी ओज़ोन की पहेली
घटना के मूल कारण को समझने के लिए टीम ने वेदर बैलून, रडार डेटा और NASA के Aura MLS तथा भारत के INSAT-3DR सैटेलाइट से मिली रीडिंग का संयुक्त विश्लेषण किया। एक-एक करके सभी संभावनाओं को खारिज करने के बाद यह साफ हुआ कि यह ओज़ोन स्थानीय रूप से नहीं बन रहा था। असल में, यह ओज़ोन से समृद्ध हवा थी जो किसी अन्य क्षेत्र से बहकर आ रही थी, फिर नीचे की ओर धकेले जाने और दबने के कारण 21-23 किमी की ऊंचाई पर जमा होकर अत्यंत घनी हो गई थी।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशन और महत्व
अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन के प्रतिष्ठित जर्नल ‘अर्थ एंड स्पेस साइंस’ (Earth and Space Science) में प्रकाशित यह रिसर्च वैज्ञानिकों को इस बात के ठोस सबूत देती है कि सर्दियों के दौरान भारत के ऊपर स्ट्रैटोस्फीयर में ओज़ोन का संचरण कैसे होता है- जिसे अब तक समझना चुनौतीपूर्ण बना हुआ था।
यह अध्ययन न केवल वायुमंडल के एक बड़े रहस्य पर से पर्दा उठाता है, बल्कि भारत की स्वदेशी रडार तकनीक और राष्ट्रीय अवलोकन नेटवर्क (Observation Network) के सफल तालमेल को भी प्रदर्शित करता है।
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