भारत में तेजी से बढ़ती हरित अर्थव्यवस्था (Clean Energy Transition) के बीच रोजगार और कार्यबल में महिलाओं की समान भागीदारी और उनके तकनीकी सशक्तिकरण को लेकर गंभीर विश्लेषण किया गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। देशभर में घरों की छतों, खेतों और औद्योगिक परिसरों पर सोलर पैनल लग रहे हैं। ग्रीन हाइड्रोजन, बायोएनर्जी और विकेंद्रीकृत ऊर्जा प्रणालियां एक ऐसे रोजगार बाजार को जन्म दे रही हैं, जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक मुश्किल थी।
लेकिन इस बदलाव के बीच एक अहम सवाल है—इस नई अर्थव्यवस्था में महिलाओं की हिस्सेदारी कितनी है? अप्रैल 2026 तक भारत की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 154 गीगावाट से अधिक हो चुकी थी।
वहीं, स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े लक्ष्यों के तहत 2030 तक 44 लाख से अधिक पूर्णकालिक समकक्ष रोजगार पैदा होने का अनुमान है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को सौर ऊर्जा प्रणालियों की स्थापना और रखरखाव का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
लेकिन केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितने सोलर पैनल लगे या कितनी महिलाओं को प्रशिक्षण मिला। असली सवाल यह है कि इन नौकरियों और अवसरों में महिलाओं की भूमिका क्या है।
2026 में काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) और NRDC India के एक अध्ययन के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल सौर और पवन ऊर्जा क्षेत्र के कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 11 प्रतिशत थी। इनमें भी करीब 62 प्रतिशत महिलाएं प्रशासन, अकाउंट्स और अन्य गैर-तकनीकी भूमिकाओं में थीं। यानी महिलाएं हरित अर्थव्यवस्था का हिस्सा तो बन रही हैं, लेकिन उसके तकनीकी केंद्र तक उनकी पहुंच अभी सीमित है।
यही अंतर आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती बन सकता है। यदि महिलाएं सोलर सिस्टम की स्थापना, निर्माण, तकनीकी जांच, मरम्मत और रखरखाव जैसे क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में नहीं पहुंचीं, तो नई हरित अर्थव्यवस्था भी पुराने रोजगार ढांचे की असमानताओं को दोहरा सकती है।
समस्या केवल प्रशिक्षण की कमी नहीं है। महिलाओं के लिए तकनीकी क्षेत्र में प्रवेश की राह शुरुआत से ही संकरी होती है। नीति आयोग के एक वर्किंग पेपर के अनुसार, भारत की स्किलिंग व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन वे अब भी सेवा, देखभाल और पारंपरिक कारीगरी से जुड़े क्षेत्रों में अधिक केंद्रित हैं।
2019 से 2024 के बीच आईटीआई में महिलाओं का दाखिला कुल प्रवेश का करीब 12.65 प्रतिशत रहा। तकनीकी नौकरियों में जाने से पहले ही कई लड़कियों को ऐसे अवसरों से दूर रखा जाता है। उन्हें औजारों के इस्तेमाल, इलेक्ट्रिकल सिस्टम या मशीनों से जुड़े काम का पर्याप्त अनुभव नहीं मिल पाता।
कई जगह सुरक्षा, यात्रा और सामाजिक धारणाओं के कारण भी परिवार और संस्थान महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण के लिए आगे नहीं करते। जबकि तकनीकी काम केवल शारीरिक ताकत का मामला नहीं है। सिस्टम डिजाइन, वायरिंग समझना, खराबी का पता लगाना, टेस्टिंग, गुणवत्ता जांच और तकनीकी समाधान निकालना मुख्य रूप से कौशल और ज्ञान पर निर्भर करता है।
इसलिए महिलाओं को तकनीकी भूमिकाओं से दूर रखने का कोई ठोस आधार नहीं है। भारत की हरित अर्थव्यवस्था अभी निर्माण के दौर में है। यही वह समय है जब रोजगार की संरचना को अधिक समावेशी बनाया जा सकता है।
अगर शुरुआत में ही तकनीकी भूमिकाएं पुरुषों के लिए और सहायक भूमिकाएं महिलाओं के लिए तय हो गईं, तो बाद में इस विभाजन को बदलना कहीं अधिक कठिन होगा। सभी हरित नौकरियां समान नहीं होतीं। किसी गांव में सौर ऊर्जा के प्रति जागरूकता अभियान चलाना और सोलर सिस्टम की डिजाइनिंग, स्थापना या तकनीकी जांच करना अलग-अलग तरह के काम हैं।
आमतौर पर अधिक तकनीकी जिम्मेदारी वाले पदों में वेतन, कौशल और आगे बढ़ने के अवसर भी अधिक होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली ‘सोलर सखी’ जैसी पहलें इस बदलाव की शुरुआत कर सकती हैं, लेकिन उन्हें केवल जागरूकता या ग्राहक संपर्क तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं को ऐसी भूमिका तक पहुंचाना जरूरी है, जहां वे स्वयं तकनीकी खराबी पहचान सकें, सिस्टम की जांच कर सकें और समस्या का समाधान कर सकें।
हरित ऊर्जा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पूरी वैल्यू चेन में होनी चाहिए—निर्माण और स्थापना से लेकर डायग्नोस्टिक्स, रखरखाव, सुपरविजन और अंततः उद्यमिता तक। स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियों के लिए कुशल या अर्ध-कुशल कर्मचारियों की जरूरत होगी। विनिर्माण क्षेत्र में यह मांग और भी अधिक हो सकती है।
ऐसे में महिलाओं को शुरुआत से ही इन अवसरों के लिए तैयार करना जरूरी है। विकेंद्रीकृत ऊर्जा व्यवस्था इस दिशा में बड़ा अवसर दे सकती है। रूफटॉप सोलर, सोलर पंप और छोटे ऊर्जा सिस्टम का विस्तार बड़े शहरों या विशाल बिजली संयंत्रों तक सीमित नहीं है।
इससे छोटे शहरों और गांवों में भी स्थापना, निगरानी, मरम्मत और सर्विस से जुड़े रोजगार पैदा हो सकते हैं। इन नौकरियों की खासियत यह है कि वे उन क्षेत्रों के करीब हो सकती हैं जहां महिलाएं पहले से रहती और काम करती हैं। लेकिन केवल नौकरी का घर के करीब होना पर्याप्त नहीं है।
महिलाओं को प्रशिक्षण के बाद औजार, काम के अवसर, नियमित आय, सुरक्षित परिवहन, बच्चों की देखभाल की सुविधा और सम्मानजनक कार्यस्थल भी चाहिए। इन्हें अतिरिक्त सुविधा के बजाय रोजगार के बुनियादी ढांचे का हिस्सा मानना होगा। सरकारी योजनाओं में भी सफलता का पैमाना बदलने की जरूरत है। कितनी महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया, यह महत्वपूर्ण आंकड़ा है, लेकिन उससे अधिक जरूरी है कि प्रशिक्षण के बाद कितनी महिलाएं तकनीकी काम में आईं, कितनों को नियमित आय मिली और कितनी महिलाएं एक साल बाद भी इस क्षेत्र में बनी रहीं।
सार्वजनिक निवेश को भी अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है। सौर ऊर्जा से जुड़ी सरकारी निविदाओं और योजनाओं में कंपनियों से यह जानकारी मांगी जा सकती है कि तकनीकी और नेतृत्व पदों पर कितनी महिलाएं कार्यरत हैं।
केवल कुल कर्मचारियों की संख्या बताने से वास्तविक लैंगिक भागीदारी का पता नहीं चलता। इसके साथ ही महिलाओं को प्रशिक्षण से रोजगार तक पहुंचाने के लिए टूलकिट, स्टाइपेंड, ग्राहक पोर्टफोलियो, कार्यशील पूंजी और शुरुआती काम उपलब्ध कराना जरूरी है।
केवल प्रमाणपत्र हाथ में दे देना रोजगार सुनिश्चित नहीं करता। सुरक्षित परिवहन, बेहतर कार्यस्थल, शौचालय, बच्चों की देखभाल और लचीली कार्य व्यवस्था जैसी सुविधाएं भी महिलाओं की लंबे समय तक भागीदारी तय करती हैं। इन्हें कल्याणकारी उपाय मानने के बजाय उत्पादकता और रोजगार के जरूरी निवेश के रूप में देखना चाहिए।
महिलाओं के लिए करियर की एक स्पष्ट सीढ़ी भी तैयार करनी होगी—सोलर सखी से तकनीकी कर्मचारी, फिर डायग्नोस्टिशियन, सुपरवाइजर और अंततः उद्यमी तक। जब किसी महिला की पहचान केवल ‘लाभार्थी’ के रूप में होती है, तो उसके आगे बढ़ने की संभावना सीमित हो जाती है। भारत की हरित अर्थव्यवस्था के सामने आज एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह क्षेत्र अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ है, इसलिए इसकी कार्यसंस्कृति और रोजगार संरचना को शुरू से ही अधिक समान बनाया जा सकता है। यदि अभी महिलाओं को तकनीकी भूमिकाओं में पर्याप्त जगह मिलती है, तो स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार केवल पर्यावरणीय बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव का माध्यम भी बन सकता है। भारत की हरित अर्थव्यवस्था को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि तकनीक किसे मिल रही है।
उसे यह भी पूछना होगा कि उस तकनीक को कौन समझता है, कौन स्थापित करता है, कौन उसकी मरम्मत करता है, कौन उससे जुड़ा कारोबार चलाता है और उससे होने वाली आय किसके हाथ में जाती है। महिलाओं को प्रशिक्षण देना पहला कदम है, अंतिम लक्ष्य नहीं। वास्तविक समानता तब होगी जब वे हरित अर्थव्यवस्था की तकनीकी रीढ़, नेतृत्व और उद्यमिता में भी बराबर दिखाई देंगी। भारत की स्वच्छ ऊर्जा क्रांति तभी वास्तव में समावेशी होगी, जब उसके रोजगार के अवसर भी उतने ही हरित, आधुनिक और समान हों जितनी उसकी महत्वाकांक्षा।
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