एनवायरमेंट पल्स डेस्क। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों ने पश्चिमी घाट के महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्र नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व (NBR) के वन पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर करना शुरू कर दिया है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि तापमान में बढ़ोतरी और बारिश में कमी के कारण जंगलों में होने वाली प्राकृतिक जैविक गतिविधियों का समय बदल रहा है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
2024 में प्रकाशित एक अध्ययन ‘मैपिंग फॉरेस्ट फेनोलॉजिकल शिफ्ट इन नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व, वेस्टर्न घाट्स: रिस्पॉन्स टू क्लाइमेट चेंज’ में वर्ष 2000 से 2020 के बीच रिजर्व के जंगलों की सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन Remote Sensing जर्नल में प्रकाशित हुआ था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जलवायु में हो रहे बदलाव अलग-अलग वन प्रकारों में पौधों की वृद्धि और अन्य मौसमी जैविक प्रक्रियाओं के समय को प्रभावित कर रहे हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1950 से 2018 के बीच नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व में औसत वार्षिक तापमान में प्रति वर्ष करीब 0.01 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई।
इसी अवधि में औसत वार्षिक वर्षा में प्रति वर्ष लगभग 3.97 मिलीमीटर की कमी दर्ज की गई। अध्ययन में चार प्रमुख वन प्रकारों—नम पर्णपाती, शुष्क पर्णपाती, अर्ध-सदाबहार और आर्द्र सदाबहार—में वनस्पतियों के मौसमी बदलावों का अध्ययन किया गया।
इसके लिए ‘स्टार्ट ऑफ सीजन’ (SOS), ‘एंड ऑफ सीजन’ (EOS) और ‘लेंथ ऑफ सीजन’ (LOS) जैसे मानकों का इस्तेमाल किया गया। शोध के पहले चरण यानी 2001 से 2010 के दौरान सभी चार वन प्रकारों में बढ़ते मौसम की शुरुआत में देरी देखी गई।
इसके कारण शुष्क पर्णपाती, अर्ध-सदाबहार और आर्द्र सदाबहार जंगलों में वनस्पतियों के सक्रिय विकास का मौसम छोटा हो गया। वहीं, नम पर्णपाती जंगलों में मौसम की अवधि में प्रति वर्ष लगभग 4.37 दिन की वृद्धि दर्ज की गई। बाद की अवधि में अलग-अलग वन क्षेत्रों में अलग-अलग बदलाव सामने आए।
कुछ जंगलों में बढ़ते मौसम की शुरुआत पहले होने लगी, जबकि कुछ में मौसम के समाप्त होने के समय में बदलाव देखा गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका मतलब यह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जंगल केवल ज्यादा हरे या कम हरे हो रहे हैं। असल चिंता यह है कि जंगलों में जैविक गतिविधियों का समय तेजी से अनियमित हो रहा है, जिससे मौसमों का पारंपरिक चक्र अप्रत्याशित बन सकता है।
वनस्पतियों के मौसमी चक्र में इस तरह के बदलाव का असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। पौधों और जानवरों के बीच भोजन और परागण जैसी प्राकृतिक गतिविधियों का तालमेल प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा कार्बन भंडारण, जल नियमन और जंगलों की समग्र पारिस्थितिक स्थिरता पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है। नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व पश्चिमी घाट के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों में शामिल है।
यह भारत का पहला यूनेस्को-मान्यता प्राप्त बायोस्फीयर रिजर्व है और तमिलनाडु, केरल तथा कर्नाटक के हिस्सों में फैला हुआ है। यहां शोलावन, घास के मैदान और कई स्थानिक वनस्पति एवं जीव प्रजातियां पाई जाती हैं। नीलगिरी क्षेत्र में हाल के समय में बारिश की कमी ने जल सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ाई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पश्चिमी घाट के इन संवेदनशील जंगलों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने के लिए पारंपरिक संरक्षण उपायों के साथ अनुकूलन आधारित संरक्षण रणनीतियां विकसित करना जरूरी होगा।
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