भारत में प्राकृतिक आवासों के सिकुड़ने, शहरीकरण और जंगलों के आसपास बढ़ते अतिक्रमण के कारण तेंदुआ-मानव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत के कई हिस्सों में तेंदुओं और इंसानों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। जंगलों के आसपास तेंदुओं के दिखने, इंसानों पर हमलों और पशुधन के शिकार की घटनाओं में वृद्धि ने वन विभाग, वन्यजीव विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक आवास में तेजी से हो रहा अतिक्रमण, कृषि क्षेत्र का विस्तार, शहरी फैलाव और प्राकृतिक शिकार की कमी तेंदुओं को मानव बस्तियों के करीब आने के लिए मजबूर कर रही है। महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नर और आसपास के गन्ना उत्पादक क्षेत्र में स्थिति विशेष रूप से गंभीर बनी हुई है।
तेंदुओं के हमलों से परेशान किसान खेतों में काम करते समय धातु के नुकीले कॉलर पहनने को मजबूर हैं। घने गन्ने के खेत तेंदुओं के लिए सुरक्षित आश्रय का काम कर रहे हैं। यहां तेंदुओं ने लंबे समय से गांवों के आसपास रहने के लिए खुद को ढाल लिया है और कुत्ते, बकरियां तथा मुर्गियां उनके भोजन का प्रमुख स्रोत बन गए हैं।
दिन के समय होने वाले हमलों ने ग्रामीणों में भय बढ़ाया है और हाल के महीनों तथा वर्षों में कई लोगों की मौत की घटनाएं सामने आई हैं। वन विभाग ने तेंदुओं को पकड़ने और स्थानांतरित करने के साथ निगरानी बढ़ा दी है। कुछ क्षेत्रों में आबादी नियंत्रण के लिए नसबंदी जैसे प्रयोग भी किए जा रहे हैं। कैमरों और ड्रोन जैसी तकनीकों की मदद से तेंदुओं की गतिविधियों पर नजर रखने का प्रयास किया जा रहा है।
देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी ही परिस्थितियां सामने आ रही हैं। गुजरात में शहरी विस्तार के कारण अहमदाबाद और उसके आसपास के इलाकों में तेंदुओं की आवाजाही बढ़ी है। शहरों का फैलाव झाड़ियों और प्राकृतिक क्षेत्रों तक पहुंचने से वन्यजीवों का आवास सिकुड़ रहा है। राज्य में तेंदुओं की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है और एक बड़ी आबादी मानव बस्तियों के आसपास रह रही है।
उत्तराखंड में भी तेंदुओं के हमलों की संख्या लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। संघर्ष वाले क्षेत्रों में तेंदुओं और भालुओं की आबादी का तेजी से आकलन करने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। जम्मू-कश्मीर में वन्यजीव विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच तेंदुओं और भालुओं से जुड़े हजारों मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले सामने आए। विशेषज्ञ इन घटनाओं के पीछे जंगलों के आसपास मौजूद बफर जोन के खत्म होने और लंबे समय से खाली पड़े मकानों तथा संपत्तियों में वन्यजीवों को मिलने वाले सुरक्षित ठिकानों को भी एक कारण मानते हैं।
उत्तर बंगाल के चाय बागानों और कृषि क्षेत्रों में भी पूरे वर्ष तेंदुओं और स्थानीय आबादी के बीच संघर्ष की घटनाएं सामने आती हैं। उत्तर प्रदेश के बिजनौर समेत कई जिलों में तेंदुओं की मौजूदगी से प्रभावित गांवों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समस्या के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। शहरीकरण, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे के विस्तार तथा गहन कृषि के कारण वन क्षेत्र खंडित हो रहे हैं।
इसके साथ ही खरगोश और छिपकलियों जैसे प्राकृतिक शिकार की उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है। बेहद अनुकूलन क्षमता वाले और क्षेत्रीय स्वभाव के तेंदुए प्राकृतिक संसाधनों की कमी होने पर खेतों और गांवों के किनारों की ओर बढ़ने लगते हैं। कुछ ग्रामीण क्षेत्रों से आबादी के पलायन के कारण खेतों में झाड़ियां और घनी वनस्पति बढ़ जाती है। इससे जंगल और बस्तियों के बीच मौजूद पारंपरिक प्राकृतिक बफर कम हो जाते हैं और वन्यजीवों को मानव आबादी के करीब आने का रास्ता मिलता है।
विशेषज्ञ यह भी चेताते हैं कि संघर्ष में शामिल तेंदुओं का बिना वैज्ञानिक योजना के एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण समस्या का स्थायी समाधान नहीं है और कई बार इससे संघर्ष दूसरे इलाके में पहुंच जाता है। इस संघर्ष का नुकसान इंसानों और वन्यजीवों दोनों को उठाना पड़ रहा है। बच्चों, किसानों और सुबह या शाम के समय खेतों में काम करने वाले लोगों पर हमले का खतरा अधिक रहता है। तेंदुओं द्वारा मवेशियों का शिकार ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बनता है। इसके जवाब में कई जगह तेंदुओं को जहर देने या मारने जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जिससे संरक्षण प्रयासों को नुकसान पहुंचता है।
कई राज्यों में मुआवजा योजनाएं और त्वरित प्रतिक्रिया दल मौजूद हैं, लेकिन ग्रामीण समुदाय अक्सर मुआवजा मिलने में देरी और दीर्घकालिक समाधान की कमी की शिकायत करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तेंदुओं को पकड़ने या स्थानांतरित करने जैसे तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। संरक्षण विशेषज्ञों ने वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, प्राकृतिक शिकार की आबादी बनाए रखने, जंगलों के आसपास भूमि उपयोग में बदलाव को नियंत्रित करने और संरक्षित क्षेत्रों से बाहर तेंदुओं की वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाने की जरूरत बताई है।
सौर बाड़, समुदायों में जागरूकता, पशुधन की बेहतर सुरक्षा और लक्षित तरीके से तेंदुओं को पकड़ना तत्काल राहत दे सकते हैं, लेकिन मूल समस्या यानी प्राकृतिक आवास पर बढ़ते दबाव को दूर किए बिना संघर्ष के और बढ़ने की आशंका है। कई राज्यों ने निगरानी तकनीक, बचाव ढांचे और स्थानीय सुरक्षा बलों के लिए वित्तीय संसाधन बढ़ाए हैं। इसके बावजूद, तेजी से बदलते भू-दृश्य में इंसानों और देश के सबसे अनुकूलनशील बड़े बिल्लियों में से एक तेंदुए के बीच बढ़ती नजदीकी भारत के सामने वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन कायम करने की बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
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