‘इंडिया एयर क्वालिटी एंड एनर्जी इनसाइट्स’ द्वारा 17 अगस्त को जारी नए दीर्घकालिक अध्ययन (2014-2023) के अनुसार, ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में वायु प्रदूषण चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में वायु प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। एक नए दीर्घकालिक अध्ययन के अनुसार, राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में सूक्ष्म कण प्रदूषण यानी PM2.5 का स्तर भारत के वार्षिक राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) से ऊपर पहुंच गया है। वहीं, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के प्रदूषण स्तर में अंतर 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है।
इंडिया एयर क्वालिटी एंड एनर्जी इनसाइट्स द्वारा 17 अगस्त को जारी विश्लेषण में वर्ष 2014 से 2023 तक के वार्षिक PM2.5 आंकड़ों का अध्ययन किया गया। शोध में 27 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के गांवों की सीमा संबंधी आंकड़ों को वाशिंगटन यूनिवर्सिटी, सेंट लुइस के एटमॉस्फेरिक कंपोजिशन एनालिसिस ग्रुप से प्राप्त सैटेलाइट आधारित प्रदूषण अनुमानों के साथ जोड़ा गया।
अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2023 में ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में PM2.5 का स्तर 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (µg/m³) के राष्ट्रीय वार्षिक मानक से अधिक दर्ज किया गया। ओडिशा उन सात राज्यों में शामिल रहा, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण NAAQS की सीमा पार कर गया, जबकि शहरी और ग्रामीण PM2.5 के स्तर में अंतर 10 प्रतिशत से कम रहा। इस सूची में पश्चिम बंगाल, पंजाब, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और दिल्ली भी शामिल हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध तुलनात्मक आंकड़ों वाले 24 राज्यों में से 22 में शहरी PM2.5 स्तर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक पाया गया। हालांकि, 16 राज्यों में शहरी और ग्रामीण प्रदूषण का अंतर 10 प्रतिशत से कम रहा। यह संकेत देता है कि ग्रामीण क्षेत्रों की हवा कई स्थानों पर शहरों की हवा से लगभग उतनी ही प्रदूषित है।
ये निष्कर्ष उस पारंपरिक धारणा को चुनौती देते हैं कि वायु प्रदूषण मुख्य रूप से शहरों की समस्या है। साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत की मौजूदा स्वच्छ वायु नीतियां ग्रामीण आबादी को पर्याप्त सुरक्षा दे रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, शहरी और ग्रामीण प्रदूषण के बीच बड़ा अंतर होना भी यह साबित नहीं करता कि ग्रामीण क्षेत्रों की हवा स्वच्छ है। कई मामलों में दोनों क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक हो सकता है।
ओडिशा के लिए ये आंकड़े खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। यदि स्वच्छ हवा से जुड़े उपाय केवल भुवनेश्वर, कटक और अंगुल तथा तालचर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित रहते हैं, तो बड़ी ग्रामीण आबादी प्रदूषण के प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाएगी। ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण के संभावित स्रोतों में खाना पकाने और गर्मी के लिए बायोमास जलाना, कृषि अवशेषों को जलाना, कच्ची सड़कों से उड़ने वाली धूल, आसपास की खदानों और बिजली संयंत्रों से होने वाला औद्योगिक उत्सर्जन तथा दूर-दराज के क्षेत्रों से प्रदूषकों का पहुंचना शामिल है।
अध्ययन व्यापक निगरानी और शहरों से बाहर तक प्रदूषण नियंत्रण उपायों के विस्तार की जरूरत पर जोर देता है। भारत का राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और राज्यों की कई पहल अब तक मुख्य रूप से उन शहरी क्षेत्रों पर केंद्रित रही हैं, जहां वायु गुणवत्ता मानकों का लगातार उल्लंघन होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी नेटवर्क का विस्तार, जमीनी स्तर पर अधिक आंकड़े जुटाना और घरेलू ईंधन तथा कृषि जैसे क्षेत्र-विशिष्ट प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण से ग्रामीण वायु गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक PM2.5 के अधिक स्तर के संपर्क में रहने से श्वसन संबंधी बीमारियों, हृदय एवं रक्त वाहिका संबंधी समस्याओं और समय से पहले मृत्यु का जोखिम बढ़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच को देखते हुए प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ वहां रहने वाली आबादी के लिए और गंभीर हो सकता है। अध्ययन के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि स्वच्छ हवा की चुनौती अब केवल महानगरों और बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही। ग्रामीण भारत, जिसमें ओडिशा के बड़े हिस्से शामिल हैं, को भी वायु गुणवत्ता निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण नीतियों के केंद्र में लाने की जरूरत है।
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