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चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, नष्ट हो रहा घड़ियालों का प्राकृतिक आवास

Environment Pulse
Last updated: August 29, 2026 9:12 pm
Environment Pulse
Published: August 29, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) में जारी अवैध रेत खनन पर गंभीर चिंता जताते हुए इसका स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने कहा कि इस अनियंत्रित खनन से घड़ियालों का प्राकृतिक प्रजनन स्थल और जलीय जीवों का आवास नष्ट हो रहा है। कोर्ट ने तीनों राज्यों के अधिकारियों के सुस्त रवैया की आलोचना करते हुए 2026 में कई कड़े निर्देश दिए हैं, जिनमें सीसीटीवी/नाइट विजन निगरानी, वाहनों की जीपीएस ट्रैकिंग, सख्त वाहन जब्ती, अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही और जरूरत पड़ने पर अर्धसैनिक बलों की तैनाती शामिल है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में जारी बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि अनियंत्रित खनन चंबल नदी के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है और गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियाल समेत कई जलीय जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मीडिया रिपोर्टों और पहले सामने आए तथ्यों के आधार पर मामले का स्वत: संज्ञान लिया।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के हिस्सों में फैला हुआ है और यह नदी आधारित जैव विविधता के लिए देश के महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों में शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लगातार हो रहा अवैध रेत खनन नदी के तटीय और जलीय आवास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। इससे चंबल नदी की प्राकृतिक संरचना और प्रवाह में बदलाव आ रहा है तथा उन रेतीले तटों का विनाश हो रहा है जिनका इस्तेमाल घड़ियाल जैसे जीव अंडे देने और प्रजनन के लिए करते हैं।

पीठ ने यह भी गंभीर टिप्पणी की कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा संरक्षण के उद्देश्य से जिन क्षेत्रों में घड़ियालों को स्थानांतरित किया गया था, वे इलाके भी कथित रेत खनन गतिविधियों की चपेट में आ गए हैं।

अदालत ने तीनों राज्यों के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उनकी निष्क्रियता को ‘सुस्त रवैया’ बताया। अदालत के मुताबिक ऐसी निष्क्रियता संरक्षित वन्यजीव आवास के विनाश में मदद या उसे बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदारी का आधार बन सकती है। अभयारण्य में वर्ष 2006 से रेत खनन पर प्रतिबंध है।

इसके बावजूद संगठित तरीके से अवैध खनन जारी रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। इससे नदी की प्राकृतिक पारिस्थितिक प्रक्रियाएं प्रभावित होने के साथ घड़ियाल, गंगा नदी डॉल्फिन, मीठे पानी के कछुए और अन्य जलीय प्रजातियों के लिए खतरा बढ़ा है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में कई कड़े निर्देश जारी किए हैं।

संवेदनशील नदी क्षेत्रों और खनन मार्गों पर हाई-रिजॉल्यूशन सीसीटीवी कैमरे और नाइट विजन निगरानी प्रणाली लगाने को कहा गया है। इसके अलावा खनन गतिविधियों में इस्तेमाल होने वाले वाहनों और मशीनरी की जीपीएस ट्रैकिंग लागू करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

अदालत ने अवैध खनन में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को जब्त करने और कानून के तहत उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने पर जोर दिया है। साथ ही वन, खनन, जल संसाधन और पुलिस विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की बात कही गई है।

तीनों राज्यों के मुख्य सचिवों के स्तर पर नियमित अनुपालन रिपोर्ट और समीक्षा की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि अवैध खनन पर प्रभावी तरीके से रोक नहीं लगाई गई तो क्षेत्र में रेत खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने जैसे कठोर कदम उठाए जा सकते हैं।

जरूरत पड़ने पर अभयारण्य की सुरक्षा के लिए अर्धसैनिक बलों की तैनाती पर भी विचार किया जा सकता है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य भारत में गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियाल के बचे हुए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों में से एक है।

यहां गंगा नदी डॉल्फिन, विभिन्न प्रजातियों के कछुए और अन्य नदी आधारित वन्यजीव भी पाए जाते हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष पहले प्रस्तुत रिपोर्टों और विशेषज्ञ आकलनों में भी अवैध रेत खनन को अभयारण्य की पारिस्थितिकी के लिए सबसे बड़े खतरों में शामिल किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस बात को रेखांकित करता है कि चंबल के इस विशिष्ट नदी पारिस्थितिकी तंत्र को व्यावसायिक दोहन से होने वाले स्थायी नुकसान से बचाने के लिए तत्काल और प्रभावी संरक्षण उपायों की आवश्यकता है।

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TAGGED:Gharial natural habitat threatGPS tracking and CCTV monitoringIllegal sand mining Supreme CourtNational Chambal SanctuaryRiverine ecosystem conservation
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