अगस्त के अंतिम सप्ताह तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बारिश से जुड़ी विभिन्न घटनाओं में मरने वालों की संख्या बढ़कर 29 या उससे अधिक हो चुकी है, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावित जम्मू संभाग के सीमावर्ती जिले पुंछ और राजौरी रहे हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियां, हरे-भरे मैदान और पहाड़ों के बीच बहती नदियां इस मानसून में एक भयावह तस्वीर पेश कर रही हैं। जहां बारिश आमतौर पर घाटियों को नई हरियाली और ठंडक देती है, वहीं इस बार लगातार तेज बारिश, बादल फटने, अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने केंद्र शासित प्रदेश के कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई है।
दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है, घर और सड़कें बह गई हैं, संपर्क व्यवस्था बाधित हुई है और कई इलाकों में रहने वाले लोगों के सामने हर तेज बारिश के साथ नई आशंका खड़ी हो जाती है। अगस्त के मध्य से अंतिम सप्ताह तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में बारिश से जुड़ी घटनाओं में मरने वालों की संख्या करीब 29 या उससे अधिक हो चुकी है।
इनमें बड़ी संख्या जम्मू संभाग के सीमावर्ती जिलों पुंछ और राजौरी से सामने आई है। जुलाई में हुई एक बेहद विनाशकारी बारिश ने हालात की गंभीरता को उजागर कर दिया था। 18 और 19 जुलाई की रात कई स्थानों पर बादल फटने और भूस्खलन की घटनाओं ने भारी तबाही मचाई।
पुंछ के सुरनकोट क्षेत्र के मुर्रा गांव में भूस्खलन और बाढ़ के पानी ने एक मकान को अपनी चपेट में ले लिया, जिसमें एक ही परिवार के आठ लोगों की मौत हो गई। मृतकों में महिलाएं और छोटे बच्चे भी शामिल थे। बचाव दलों ने मलबे के बीच तलाश अभियान चलाया और बाद में 25 वर्षीय खालिदा कौसर का शव भी बरामद किया गया, जिसके बाद पुंछ में मृतकों की संख्या और बढ़ गई।
राजौरी और डोडा के कुछ हिस्सों से भी बारिश और भूस्खलन से जुड़ी मौतों की खबरें आईं। कई लोग कई दिनों तक लापता रहे और लगातार बारिश के बीच बचाव दलों ने मलबे में उनकी तलाश जारी रखी। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मृतकों के परिजनों के लिए छह लाख रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की और पुंछ के प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने प्रभावित लोगों को पुनर्वास और आवश्यक सहायता का भरोसा दिया।
हालांकि, सरकारी आंकड़ों से कहीं बड़ा है इस आपदा का मानवीय असर। कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोने के साथ घर, पशुधन, कृषि भूमि और आय के साधन भी गंवाए हैं। पहाड़ी भूगोल और मौसम की अनिश्चितता के बीच रहने वाले ग्रामीणों के लिए यह दोहरी चुनौती बन गई है। बारिश का कहर केवल जुलाई तक सीमित नहीं रहा। अगस्त में भी कई इलाकों में अचानक तेज बारिश ने बाढ़ जैसे हालात पैदा किए। 19 और 20 अगस्त को कश्मीर घाटी के कुछ हिस्सों में स्थानीय स्तर पर हुई भारी बारिश के बाद छोटी नदियों और नालों का जलस्तर तेजी से बढ़ गया।
शोपियां के शादाब करवा, दाचनू, हेरपोरा और बादेरहमा क्षेत्रों में पानी, मिट्टी और गाद रिहायशी इलाकों और बागों तक पहुंच गई। गांदरबल के हकनार, गुंड और वांगथ इलाकों में भी दोपहर बाद हुई तेज बारिश के बाद अचानक बाढ़ की स्थिति बनी।
पहलगाम के ऊपरी बटकूट क्षेत्र में इस मौसम में बाढ़ की यह पांचवीं घटना बताई गई, जिसने स्थानीय निवासियों की चिंता और बढ़ा दी है। कई जगह सड़क संपर्क और पेयजल आपूर्ति प्रभावित हुई। जम्मू संभाग में भी भारी बारिश ने कई इलाकों में जमीन खिसकने और भूस्खलन का खतरा बढ़ा दिया। खैरी गांव में जमीन धंसने से 11 मकानों को नुकसान पहुंचा। सिधरा के आसपास महत्वपूर्ण मार्गों पर भूस्खलन हुआ।
रियासी में एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत की घटना ने भी क्षेत्र को झकझोर दिया। भारी बारिश के कारण तवी नदी का जलस्तर बढ़ा और जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग के कुछ हिस्सों में यातायात बाधित हुआ। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क संपर्क बहाल करना प्रशासन के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है।
बारिश के आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता बताते हैं। 19 अगस्त की सुबह समाप्त हुए 24 घंटे के दौरान जम्मू में 88.7 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। सांबा में 85 मिलीमीटर और कठुआ में 76.6 मिलीमीटर बारिश हुई। कटरा, रियासी और ऊधमपुर सहित अन्य स्थानों पर भी उल्लेखनीय वर्षा दर्ज की गई। हालांकि मौसम विभाग के अनुसार 20 से 22 अगस्त के दौरान व्यापक स्तर पर अत्यधिक भारी बारिश की संभावना कम है और मौसम मुख्य रूप से गर्म तथा उमस भरा रह सकता है, लेकिन कुछ इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश के साथ स्थानीय स्तर पर तेज बारिश की आशंका बनी हुई है। मौसम विभाग लगातार चेतावनी देता रहा है कि पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक होने वाली तेज बारिश फ्लैश फ्लड, मलबा बहने, भूस्खलन और पत्थर गिरने की घटनाओं को जन्म दे सकती है।
लोगों को नदियों, नालों और भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों से दूर रहने की सलाह दी गई है। इस मानसून की सबसे बड़ी चिंता अचानक होने वाली अत्यधिक बारिश की बढ़ती घटनाएं हैं। अधिकारियों और मौसम पर्यवेक्षकों के अनुसार जुलाई से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बादल फटने या बादल फटने जैसी कई घटनाएं सामने आई हैं। अकेले जुलाई में जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में ऐसी 27 से अधिक घटनाओं की रिपोर्ट सामने आई थी और अगस्त में भी इसका सिलसिला जारी रहा। एक समय 24 घंटे के भीतर आठ ऐसी घटनाएं सामने आने की बात कही गई थी। पहाड़ी इलाकों में बादल फटना बेहद खतरनाक साबित होता है, क्योंकि कम समय में बड़ी मात्रा में पानी संकरी घाटियों, नालों और ढलानों की ओर तेजी से बहता है।
इसके साथ चट्टानें, मलबा और गाद भी नीचे की ओर आते हैं और रास्ते में आने वाले घरों, पुलों तथा सड़कों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। 2014 की विनाशकारी कश्मीर बाढ़ की यादें अभी भी लोगों के जेहन में हैं। ऐसे में इस साल बार-बार सामने आ रही स्थानीय स्तर की अत्यधिक बारिश की घटनाओं ने आपदा प्रबंधन और तैयारी को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक संरचना, कमजोर ढलान, अस्थिर मिट्टी और बड़ी संख्या में छोटी जलधाराएं सामान्य से अधिक तेज बारिश को भी गंभीर आपदा में बदल सकती हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण, अनियोजित विकास और संवेदनशील ढलानों पर बढ़ता मानवीय दबाव भी जोखिम को बढ़ा सकता है। बाढ़ और भूस्खलन का असर केवल जान-माल के तत्काल नुकसान तक सीमित नहीं है।
जम्मू-कश्मीर में सड़कें और राष्ट्रीय राजमार्ग बार-बार मलबे से बंद हुए हैं। कई पुलों और संपर्क मार्गों को नुकसान पहुंचा है। बिजली और पानी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। कृषि भूमि और फलों के बागान, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, कई स्थानों पर पानी और गाद की चपेट में आए हैं। कुछ इलाकों में वाहन पानी के तेज बहाव में बह गए और कई जगह सार्वजनिक स्थानों पर क्षतिग्रस्त वाहनों का मलबा जमा हो गया। घुमंतू समुदायों के अस्थायी ठिकानों पर भी बारिश का असर पड़ा है। पिछली आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 1,500 करोड़ रुपये से अधिक के बड़े पुनर्वास पैकेज को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है।
इसके तहत आवास, सड़क, बिजली और अन्य क्षेत्रों में काम किया जा रहा है। लेकिन मौजूदा मानसून ने प्रशासनिक और राहत तंत्र के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। एक ओर पुराने नुकसान की भरपाई का काम चल रहा है, वहीं दूसरी ओर नए इलाकों में नुकसान सामने आ रहा है। प्रशासन, पुलिस, राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल, सेना और नागरिक एजेंसियां लगातार सतर्क हैं। बचाव अभियान, मलबा हटाना, सड़क संपर्क बहाल करना और प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाना प्राथमिकता में है।
संवेदनशील गांवों की पहचान की गई है और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों के जरिए लोगों को सतर्क किया जा रहा है। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर का कठिन भूगोल किसी भी आपदा के दौरान प्रतिक्रिया के लिए बेहद कम समय देता है। खड़ी ढलान, कमजोर भूगर्भीय संरचना और पहाड़ों में फैले जल स्रोतों के कारण कुछ मिनटों की तेज बारिश भी बड़े खतरे में बदल सकती है। इस संकट का असर आम लोगों की जिंदगी में सबसे ज्यादा दिखाई देता है।
पुंछ और राजौरी में कई परिवार जुलाई की त्रासदी से अब भी उबरने की कोशिश कर रहे हैं। शोपियां और अनंतनाग के किसान हर बार आसमान में बादल घिरते ही अपने बागों को लेकर चिंतित हो जाते हैं। पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को भी मौसम के कारण यात्रा योजनाओं में बदलाव करना पड़ा है। वैष्णो देवी जाने वाले मार्गों और अमरनाथ यात्रा पर भी मौसम संबंधी व्यवधानों का असर पड़ा है। जिन बारिशों को कभी गर्मियों से राहत का संकेत माना जाता था, वही अब कई परिवारों के लिए अचानक आने वाली तबाही की चेतावनी बन गई हैं। आने वाले दिन जम्मू-कश्मीर के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
फिलहाल मौसम पूर्वानुमान व्यापक स्तर पर लगातार मूसलाधार बारिश की बजाय छिटपुट बारिश की ओर संकेत करता है, लेकिन इस मौसम का अनुभव बता चुका है कि स्थानीय स्तर पर अचानक तेज बारिश कितनी तेजी से हालात बदल सकती है। ऐसे में लगातार मौसम निगरानी, समय पर चेतावनी, जरूरत पड़ने पर तत्काल निकासी, मजबूत तटबंध, ढलानों को स्थिर करने के उपाय और गांव स्तर पर आपदा तैयारी बेहद जरूरी हैं।
जम्मू-कश्मीर में बाढ़ किसी एक बड़ी आपदा की कहानी नहीं है, बल्कि लगातार सामने आ रहे छोटे-बड़े संकटों की एक लंबी श्रृंखला है। आसमान से बरसता पानी, पहाड़ों से उतरता मलबा और उफनती जलधाराएं मिलकर एक ऐसे क्षेत्र की कमजोरियों को उजागर कर रही हैं, जहां प्राकृतिक सुंदरता और प्राकृतिक जोखिम साथ-साथ मौजूद हैं।
इस मानसून ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल तत्काल राहत पर्याप्त नहीं होगी। बदलते और अधिक अनिश्चित होते बारिश के पैटर्न के बीच जम्मू-कश्मीर को दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन, बेहतर पूर्व चेतावनी तंत्र, सुरक्षित निर्माण, जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण और पहाड़ी ढलानों की निगरानी की व्यापक रणनीति की जरूरत है।
क्योंकि इस बार की तबाही ने एक गंभीर संदेश दिया है—कश्मीर की खूबसूरती जितनी अद्भुत है, उसके पहाड़ों और पानी की ताकत को नजरअंदाज करने की कीमत उतनी ही भयावह हो सकती है।

