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Environment Pulse > फ्यूचर ग्रीन > ऊर्जा > अमेरिकी सेना का बड़ा कदम, पांच सैन्य ठिकानों पर परमाणु माइक्रोरिएक्टर लगाने के लिए 2.2 अरब डॉलर का अनुबंध
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ऊर्जा

अमेरिकी सेना का बड़ा कदम, पांच सैन्य ठिकानों पर परमाणु माइक्रोरिएक्टर लगाने के लिए 2.2 अरब डॉलर का अनुबंध

Environment Pulse
Last updated: September 1, 2026 8:42 pm
Environment Pulse
Published: September 1, 2026
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अमेरिकी सेना ने अपने सैन्य ऊर्जा ढांचे को आधुनिक बनाने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए पांच सैन्य ठिकानों पर उन्नत परमाणु माइक्रोरिएक्टर तैनात करने हेतु 2.2 अरब डॉलर का अनुबंध दिया है। इन मॉड्यूलर माइक्रोरिएक्टरों का उद्देश्य सैन्य प्रतिष्ठानों को स्वच्छ, भरोसेमंद और मुख्य ग्रिड से स्वतंत्र (ऑफ़-ग्रिड) 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराना है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और परिचालनिक लचीलेपन को बढ़ावा मिल सके।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। अमेरिकी सेना ने सैन्य ऊर्जा ढांचे को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए पांच सैन्य ठिकानों पर उन्नत परमाणु माइक्रोरिएक्टरों के डिजाइन, निर्माण और तैनाती के लिए 2.2 अरब डॉलर का अनुबंध दिया है।

इस परियोजना का उद्देश्य सैन्य प्रतिष्ठानों को स्वच्छ, भरोसेमंद और मजबूत ऊर्जा आपूर्ति उपलब्ध कराना तथा पारंपरिक बिजली ग्रिड और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना है।

यह निवेश रक्षा क्षेत्र में अगली पीढ़ी की परमाणु तकनीक के लिए अब तक के बड़े प्रयासों में शामिल है। परमाणु माइक्रोरिएक्टर छोटे और कॉम्पैक्ट परमाणु ऊर्जा संयंत्र होते हैं, जो आमतौर पर 1 से 20 मेगावाट तक बिजली पैदा करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

बड़े पारंपरिक परमाणु संयंत्रों के मुकाबले इन्हें मॉड्यूलर तरीके से तैयार करने, अपेक्षाकृत तेजी से तैनात करने और कम संख्या में कर्मचारियों के साथ संचालित करने की क्षमता को ध्यान में रखकर विकसित किया जाता है। अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बिजली की निरंतर उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है।

कमांड और कंट्रोल सिस्टम, रडार एवं संचार नेटवर्क, डेटा सेंटर, चिकित्सा सुविधाओं और आवासीय परिसरों को चौबीसों घंटे बिजली की आवश्यकता होती है। वर्तमान में कई सैन्य प्रतिष्ठान वाणिज्यिक बिजली ग्रिड पर निर्भर हैं, जिन्हें खराब मौसम, साइबर हमलों या भौतिक नुकसान से बाधित किया जा सकता है।

वहीं, डीजल जनरेटरों पर निर्भरता के लिए लगातार ईंधन की आपूर्ति जरूरी होती है, जो दूरदराज या संघर्ष की स्थिति वाले क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी चुनौती बन सकती है।

माइक्रोरिएक्टरों के जरिए सेना ऐसे ऊर्जा स्रोत तैयार करना चाहती है जिन्हें जरूरत पड़ने पर मुख्य बिजली ग्रिड से अलग करके स्वतंत्र रूप से चलाया जा सके।

इस क्षमता को सैन्य ऊर्जा सुरक्षा और परिचालनिक लचीलेपन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। परमाणु रिएक्टर संचालन के दौरान लगभग कार्बन-मुक्त बिजली भी पैदा करते हैं, जिससे अमेरिकी रक्षा विभाग के व्यापक स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

2.2 अरब डॉलर के अनुबंध में शुरुआती परियोजनाओं के लिए इंजीनियरिंग डिजाइन, विनिर्माण, साइट की तैयारी, स्थापना, लाइसेंसिंग संबंधी सहायता और शुरुआती संचालन चरण शामिल हैं। पांचों सैन्य ठिकानों के नाम और विस्तृत स्थान अभी सार्वजनिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं किए गए हैं।

कार्यक्रम से जुड़े सूत्रों के अनुसार, चयनित प्रतिष्ठान अमेरिका के भीतर और संभावित रूप से रणनीतिक महत्व वाले विदेशी स्थानों में भी हो सकते हैं। जिन माइक्रोरिएक्टर डिजाइनों पर विचार किया जा रहा है, उनमें उन्नत ईंधन और निष्क्रिय सुरक्षा प्रणालियों जैसी तकनीकों को शामिल किया जा सकता है।

कई प्रस्तावित डिजाइन फैक्टरी में तैयार किए जाने वाले मॉड्यूल पर आधारित हैं, जिन्हें ट्रक, रेल या विमान के जरिए संबंधित स्थान तक पहुंचाकर वहां असेंबल किया जा सकता है। इससे पारंपरिक परमाणु परियोजनाओं की तुलना में निर्माण अवधि कम करने की संभावना रहती है। अमेरिकी सेना का यह कदम रक्षा विभाग के पहले के प्रयोगों पर भी आधारित है। इनमें प्रोजेक्ट पेले जैसी पहल शामिल है, जिसके तहत मोबाइल माइक्रोरिएक्टर की अवधारणा का परीक्षण किया गया है।

अब 2.2 अरब डॉलर का निवेश अनुसंधान और प्रोटोटाइप चरण से आगे बढ़कर वास्तविक सैन्य प्रतिष्ठानों पर तकनीक की तैनाती की दिशा में बदलाव का संकेत देता है। समर्थकों का मानना है कि यदि परियोजना सफल रहती है तो सैन्य ठिकानों पर वास्तविक परिस्थितियों में माइक्रोरिएक्टरों के प्रदर्शन से इस तकनीक के व्यावसायिक इस्तेमाल को भी गति मिल सकती है।

इससे नियामकीय प्रक्रियाओं और भविष्य की तैनाती के लिए आवश्यक अनुभव विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस योजना को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। आलोचकों ने परमाणु कचरे के प्रबंधन, परमाणु ईंधन की दीर्घकालिक सुरक्षा और इसकी लागत को लेकर चिंताएं जताई हैं।

कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि सौर ऊर्जा के साथ उन्नत बैटरी भंडारण या भू-तापीय ऊर्जा जैसी प्रणालियां भी सैन्य प्रतिष्ठानों के लिए लचीली और वैकल्पिक ऊर्जा व्यवस्था उपलब्ध करा सकती हैं। यह परियोजना ऐसे समय में सामने आई है जब सैन्य ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, साइबर हमलों का जोखिम और चरम मौसम की बढ़ती घटनाएं सैन्य प्रतिष्ठानों की बिजली आपूर्ति के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।

अनुबंध के तहत काम तत्काल शुरू होने की उम्मीद है। आने वाले महीनों में चयनित स्थलों का आकलन, पर्यावरणीय समीक्षा और प्रारंभिक डिजाइन का काम आगे बढ़ सकता है। पांचों ठिकानों पर पूर्ण परिचालन क्षमता हासिल करने में कई वर्ष लग सकते हैं और इसके लिए नियामकीय मंजूरियों के साथ अमेरिकी रक्षा विभाग की आंतरिक निगरानी भी जरूरी होगी।

अमेरिकी सेना ने संकेत दिया है कि प्रस्तावित माइक्रोरिएक्टरों को उच्चतम सुरक्षा और संरक्षा मानकों के तहत संचालित किया जाएगा। परियोजना आगे बढ़ने के साथ सैन्य ठिकानों के चयन, तकनीकी साझेदारों और तैनाती की प्रगति से जुड़ी और जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

2.2 अरब डॉलर का यह निवेश इस बदलती सोच को दर्शाता है कि आधुनिक सैन्य अभियानों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और स्वतंत्र ऊर्जा आपूर्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है जितनी अन्य रणनीतिक क्षमताएं। यदि यह परियोजना सफल होती है, तो आने वाले दशकों में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को बिजली उपलब्ध कराने के तरीके में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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