Science Advances में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, दुनिया भर में 10 वर्ष से कम उम्र के लगभग 58.3 करोड़ बच्चे (इस आयु वर्ग का 44%) जलवायु परिवर्तन के कारण हर साल कम से कम 20 अतिरिक्त ‘हीट-स्ट्रेस दिनों’ का सामना कर रहे हैं। शोधकर्ताओं ने ‘वेट-बल्ब ग्लोब टेम्परेचर’ (WBGT) का उपयोग करके यह आकलन किया है कि मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग ने उष्णकटिबंधीय और विकासशील देशों, विशेष रूप से दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका, में बच्चों पर गर्मी का दबाव सबसे अधिक बढ़ा दिया है। वर्तमान में इन क्षेत्रों के 11 प्रतिशत बच्चे सालाना 100 या उससे अधिक अतिरिक्त हीट-स्ट्रेस झेल रहे हैं, और यदि वैश्विक तापमान 1.5°C या 2°C बढ़ता है, तो यह स्थिति और अधिक गंभीर हो जाएगी। अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि जलवायु परिवर्तन का यह संकट जलवायु न्याय का एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि न्यूनतम उत्सर्जन करने वाले विकासशील देशों के बच्चों को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। जलवायु परिवर्तन का बढ़ता असर दुनिया के बच्चों के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य और सुरक्षा चुनौती बनता जा रहा है। एक नए अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में 10 वर्ष से कम उम्र के करीब 58.3 करोड़ बच्चे हर साल जलवायु परिवर्तन के कारण कम से कम 20 अतिरिक्त ‘हीट-स्ट्रेस डे’ झेल रहे हैं।
यह इस आयु वर्ग की कुल आबादी का लगभग 44 प्रतिशत है। Science Advances में प्रकाशित अध्ययन में जलवायु मॉडल और जनसांख्यिकीय आंकड़ों को मिलाकर यह आकलन किया गया है कि अलग-अलग उम्र के लोगों और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों पर बढ़ती गर्मी और उमस का कितना अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
अध्ययन के अनुसार, मौजूदा जलवायु में 10 साल से कम उम्र के बच्चे किसी भी अन्य आयु वर्ग की तुलना में जलवायु परिवर्तन के कारण अधिक अतिरिक्त हीट-स्ट्रेस दिनों का सामना कर रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक, दक्षिण एशिया और पश्चिमी अफ्रीका में बच्चों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।
इन क्षेत्रों में एक ओर गर्म और नम मौसम अधिक है, वहीं दूसरी ओर युवा आबादी का अनुपात भी काफी अधिक है। तेजी से बढ़ती आबादी के कारण इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में छोटे बच्चे ऐसे वातावरण में रह रहे हैं, जहां गर्मी और उमस स्वास्थ्य के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच सकती है। शोधकर्ताओं ने ‘हीट-स्ट्रेस डे’ की पहचान के लिए वेट-बल्ब ग्लोब टेम्परेचर (WBGT) का इस्तेमाल किया है। यह तापमान के साथ नमी और हवा जैसे कारकों को भी ध्यान में रखता है।
अध्ययन में 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक WBGT वाले दिन को मध्यम हीट स्ट्रेस की सीमा माना गया है। शोधकर्ताओं ने पहले 2023 की जलवायु परिस्थितियों का मॉडल तैयार किया, जिसमें मानव गतिविधियों के कारण लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि को शामिल किया गया। इसके बाद इसी विश्लेषण को ऐसे पूर्व-औद्योगिक वातावरण के लिए दोहराया गया, जिसमें मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग नहीं थी।
दोनों स्थितियों की तुलना से यह पता लगाया गया कि वर्तमान में कितने अतिरिक्त हीट-स्ट्रेस दिन केवल जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़े हैं। अध्ययन में पाया गया कि उष्णकटिबंधीय और निम्न-अक्षांश वाले देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण अतिरिक्त हीट-स्ट्रेस दिनों की संख्या सबसे अधिक है।
उदाहरण के तौर पर, कोट द’आइवोर में लोग वर्तमान जलवायु में औसतन हर साल 112 हीट-स्ट्रेस दिनों का सामना करते हैं। इनमें लगभग आधे दिन मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जुड़े हैं। इसके विपरीत, जर्मनी में वर्तमान परिस्थितियों में औसतन केवल 0.1 हीट-स्ट्रेस दिन दर्ज होते हैं, हालांकि वहां भी यह आंकड़ा मुख्य रूप से मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यूरोप में यह संख्या कम दिखाई देने का एक कारण यह भी है कि अध्ययन का फोकस अत्यधिक आर्द्र गर्मी पर है, जो यूरोप के कई हिस्सों में अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती है। इसके अलावा, अध्ययन में शहरी ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव को शामिल नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि शहरों में स्थानीय स्तर पर लोगों द्वारा महसूस किया जाने वाला वास्तविक हीट स्ट्रेस कुछ क्षेत्रों में अध्ययन के अनुमान से अधिक हो सकता है। शोधकर्ताओं ने भविष्य की संभावित जलवायु परिस्थितियों का भी आकलन किया।
इसके लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस और 2 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म दुनिया के परिदृश्यों का अध्ययन किया गया। वर्तमान जलवायु में 10 वर्ष से कम उम्र के करीब 11 प्रतिशत बच्चे हर साल जलवायु परिवर्तन के कारण 100 या उससे अधिक अतिरिक्त हीट-स्ट्रेस दिनों का सामना कर रहे हैं।
यदि वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है, तो यह अनुपात बढ़कर 13 प्रतिशत हो सकता है। वहीं 2 डिग्री सेल्सियस गर्म दुनिया में यह आंकड़ा 23 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। 60 से 69 वर्ष आयु वर्ग में वर्तमान में करीब 6 प्रतिशत लोग सालाना 100 या उससे अधिक अतिरिक्त हीट-स्ट्रेस दिनों का सामना करते हैं।
1.5 डिग्री और 2 डिग्री सेल्सियस गर्म दुनिया में यह अनुपात क्रमशः 9 प्रतिशत और 17 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि तापमान बढ़ने के साथ गर्मी का बोझ केवल बढ़ेगा ही नहीं, बल्कि युवा आबादी पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक गंभीर हो सकता है। अध्ययन ने गर्मी के बढ़ते खतरे को जलवायु न्याय से भी जोड़ा है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, विकासशील देशों में रहने वाले बच्चों को जलवायु परिवर्तन का बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है, जबकि ऐतिहासिक रूप से इन देशों के लोगों का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान विकसित देशों की तुलना में काफी कम रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी और उसके प्रभावों के बीच यह असमानता वैश्विक जलवायु नीति में बच्चों और विकासशील देशों की स्थिति को केंद्र में रखने की जरूरत को रेखांकित करती है।
गर्मी का प्रभाव सभी लोगों पर एक जैसा नहीं होता। बच्चे, बुजुर्ग और पहले से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं या कुछ प्रकार की अक्षमताओं से जूझ रहे लोग शरीर का तापमान नियंत्रित करने में अपेक्षाकृत अधिक कठिनाई महसूस कर सकते हैं। हालांकि, अध्ययन से जुड़े कुछ विशेषज्ञों ने बच्चों और बुजुर्गों के बीच जोखिम की तुलना को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है।
उनका कहना है कि बुजुर्गों में अकेले रहने, सीमित गतिशीलता और ठंडक या आपातकालीन सहायता तक पहुंच की कमी जैसी सामाजिक परिस्थितियां गर्मी के खतरे को बढ़ा सकती हैं। अध्ययन के प्रमुख लेखकों का कहना है कि भविष्य के शोध में जलवायु विज्ञान और स्वास्थ्य विज्ञान को और करीब लाने की जरूरत है। खासतौर पर यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि बच्चों के स्वास्थ्य, सीखने की क्षमता और शिक्षा पर गर्मी का असर किस तरह पड़ता है।
गर्मी और उमस का अत्यधिक स्तर शरीर की प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया को प्रभावित करता है। सामान्य परिस्थितियों में पसीना शरीर को ठंडा करने में मदद करता है, लेकिन वातावरण में नमी बढ़ने पर पसीने का वाष्पीकरण कम प्रभावी हो जाता है। यही वजह है कि समान तापमान भी अधिक उमस के साथ शरीर पर कहीं ज्यादा दबाव डाल सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी चिंता जताई कि दुनिया में हीटवेव की रिपोर्टिंग अक्सर अमीर देशों के पक्ष में झुकी हुई है।
अफ्रीका के कई हिस्सों में गर्मी की घटनाओं की औपचारिक रिपोर्टिंग और मीडिया कवरेज अपेक्षाकृत कम है। इसके कारण आपदा संबंधी वैश्विक डेटाबेस भी वहां के हीटवेव प्रभाव को पूरी तरह दर्ज नहीं कर पाते। ऐसे में जलवायु आंकड़ों पर आधारित अध्ययन उन क्षेत्रों की तस्वीर सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जहां गर्मी का संकट गंभीर है लेकिन उसकी पर्याप्त रिपोर्टिंग नहीं हो पाती।
अध्ययन का व्यापक संदेश साफ है—जितनी अधिक गर्म होती दुनिया, उतने अधिक बच्चे हीट स्ट्रेस के खतरे में जाएंगे। खासकर दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती युवा आबादी और गर्म होती जलवायु का मेल भविष्य की चुनौती को और गंभीर बना सकता है। जलवायु परिवर्तन पर बहस अब केवल औसत तापमान या चरम मौसम की घटनाओं तक सीमित नहीं रह सकती। बच्चों पर पड़ने वाला अतिरिक्त गर्मी का बोझ यह सवाल भी उठाता है कि दुनिया किस तरह ऐसी जलवायु नीतियां तैयार करे जो आने वाली पीढ़ियों को उस संकट से बचा सकें, जिसे पैदा करने में उनका योगदान सबसे कम रहा है।

