हिमालय के ग्लेशियरों पर वाहनों, उद्योगों, ईंट भट्ठों और पराली या जंगलों की आग से निकलने वाला काला कार्बन (कालिख) जम रहा है, जिससे बर्फ की परावर्तन क्षमता (अल्बीडो) कम हो रही है और वे तेजी से सौर ऊर्जा सोखकर पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह वायु प्रदूषण वैश्विक तापमान वृद्धि के साथ मिलकर हिमालयी ग्लेशियरों को और अधिक कमजोर बना रहा है, जिससे भविष्य में अचानक बाढ़ और पानी की किल्लत का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, ब्लैक कार्बन का वायुमंडलीय जीवनकाल कम होने के कारण यदि प्रदूषण नियंत्रण के कड़े कदम उठाए जाएं, तो इस संकट की रफ्तार को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। हिमालय के ग्लेशियरों पर प्रदूषण की काली चादर, बढ़ रहा है पिघलने और आपदा का खतरा हिमालय के बर्फ से ढके ग्लेशियर अब केवल बढ़ते तापमान से ही नहीं, बल्कि वायु प्रदूषण से भी गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं।
वाहनों के धुएं, कोयला आधारित बिजली संयंत्रों, औद्योगिक इकाइयों, ईंट भट्ठों, घरेलू चूल्हों और जंगल तथा फसल अवशेषों की आग से निकलने वाला काला कार्बन यानी कालिख बर्फ और ग्लेशियरों की सतह पर जमकर उनके पिघलने की रफ्तार बढ़ा रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, स्वच्छ बर्फ सूर्य की किरणों का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। लेकिन जब बर्फ और हिम पर कालिख तथा दूसरे गहरे रंग के कण जमा हो जाते हैं तो उनकी परावर्तन क्षमता यानी ‘अल्बीडो’ कम हो जाती है।
परिणामस्वरूप ग्लेशियर अधिक सौर ऊर्जा सोखने लगते हैं और तेजी से गर्म होकर पिघलने लगते हैं। दक्षिण एशिया के अत्यधिक प्रदूषित मैदानी इलाकों से उठने वाले प्रदूषक हवाओं के साथ ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं। नेपाल का लांगटांग क्षेत्र इसका एक चिंताजनक उदाहरण है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में ग्लेशियरों के अस्थिर होने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई है।
हालांकि किसी विशेष ग्लेशियर के ढहने के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना अभी संभव नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन मिलकर हिमालयी ग्लेशियरों को अधिक कमजोर बना रहे हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए कोलंबिया यूनिवर्सिटी के लामोंट-डोहर्टी अर्थ ऑब्जर्वेटरी के भूभौतिकीविद् मार्को टेडेस्को ने कहा कि ग्लेशियर लगातार पतले होते जा रहे हैं और ऐसे में प्रदूषण का प्रभाव और गंभीर हो सकता है। उनके मुताबिक, ग्लेशियरों के कमजोर होने के साथ प्रदूषण का प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियरों पर जमा कालिख केवल सतह को गर्म नहीं करती, बल्कि पिघलने की ऐसी प्रक्रिया शुरू कर सकती है जो आगे चलकर बर्फ की संरचना को अस्थिर कर दे। चीनी विज्ञान अकादमी के शोधकर्ताओं के एक मॉडलिंग अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि 2007 से 2016 के बीच हिमालय में ग्लेशियरों के कुल द्रव्यमान में हुई कमी में दक्षिण एशिया से आने वाले ब्लैक कार्बन की हिस्सेदारी एक-तिहाई तक हो सकती है।
यह अनुमान इस बात का संकेत है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने में केवल वैश्विक तापमान वृद्धि ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वायु प्रदूषण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ग्लेशियर की सतह पर जमा कालिख और धूल बर्फ को तेजी से गर्म करती है। जैसे-जैसे बर्फ पिघलती है, पानी ग्लेशियर के भीतर नीचे की ओर जाने लगता है और बर्फ में सुरंगें तथा कमजोर हिस्से बना सकता है।
इससे ग्लेशियर की संरचनात्मक स्थिरता प्रभावित हो सकती है और कुछ परिस्थितियों में बड़े पैमाने पर बर्फ टूटने या अचानक पानी के बहाव का खतरा बढ़ सकता है। उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों ने भी इस समस्या की तस्वीर को स्पष्ट करना शुरू कर दिया है। हालिया शोध में छह वर्षों के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण कर यह अध्ययन किया गया कि पाकिस्तान के औद्योगिक मैदानी इलाकों से निकलने वाला ब्लैक कार्बन और खनिज धूल किस तरह ऊंचाई वाले हिमालयी ग्लेशियरों तक पहुंचते हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इन प्रदूषकों के ग्लेशियरों तक पहुंचने से बर्फ की सतह गहरी होती है और पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए न्यूजीलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो की शोधकर्ता अबिरा सेनगुप्ता ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में हिमालयी ग्लेशियरों का नुकसान और बढ़ सकता है और इसके साथ बाढ़ का जोखिम भी बढ़ सकता है।
समस्या केवल कालिख के बर्फ पर जमने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि वातावरण में मौजूद एरोसोल और कालिख पहाड़ों के ऊपर गर्मी को रोक सकते हैं। इससे बादलों के बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और कुछ क्षेत्रों में बर्फबारी कम हो सकती है। कम बर्फबारी का अर्थ है कि ग्लेशियरों को अपने नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नई बर्फ नहीं मिल पाती। प्रदूषण के कण बर्फ की परतों के भीतर भी पहुंच सकते हैं।
वहां वे बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता आशुतोष पौडेल के अनुसार, सतह पर मौजूद गहरे कण सूर्य की गर्मी को सोखकर आसपास की बर्फ को पिघलाते हैं। इसके बाद बर्फ के भीतर फंसी पुरानी धूल और मलबे की परतें सतह पर आ सकती हैं, जिससे और अधिक गर्मी अवशोषित होती है।
न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए आशुतोष पौडेल ने बताया कि जैसे-जैसे गहरी प्रदूषणकारी परत गर्मी सोखती है, उसके आसपास की बर्फ पिघलने लगती है और ग्लेशियर के भीतर मौजूद पुरानी धूल तथा मलबे की परतें सामने आ सकती हैं। इससे पिघलने की प्रक्रिया और तेज होने का खतरा रहता है और एक नकारात्मक फीडबैक चक्र बन सकता है। दक्षिण एशिया में इस प्रदूषण के कई स्रोत हैं। पेट्रोल और डीजल वाहनों का उत्सर्जन, पारंपरिक ईंट भट्ठे, घरेलू खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रदूषणकारी चूल्हे तथा मौसमी जंगल और खेतों की आग प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं।
मैदानी इलाकों में उत्सर्जित प्रदूषक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक पहुंचकर उन ग्लेशियरों को प्रभावित कर सकते हैं जो सीधे तौर पर इन प्रदूषण स्रोतों से बहुत दूर हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस संकट से निपटने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी मौजूद है। कार्बन डाइऑक्साइड के विपरीत, जो वातावरण में लंबे समय तक बनी रहती है, ब्लैक कार्बन का वायुमंडलीय जीवनकाल अपेक्षाकृत कम होता है। इसका मतलब है कि वाहनों, उद्योगों और घरेलू ईंधन से होने वाले ब्लैक कार्बन उत्सर्जन में कमी का असर अपेक्षाकृत तेजी से दिखाई दे सकता है।
इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाना, प्रदूषणकारी ईंट भट्ठों और औद्योगिक इकाइयों की तकनीक में सुधार करना तथा स्वच्छ खाना पकाने वाले ईंधन और चूल्हों को अपनाना ऐसे कदम हैं जो ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को कम कर सकते हैं। भारत के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने भी प्रदूषण घटने और हिमालयी बर्फ के पिघलने के बीच संबंध का संकेत दिया है।
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन ने कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण में आई अस्थायी कमी को प्राकृतिक प्रयोग के तौर पर देखा।
अध्ययन के अनुसार इस अवधि में प्रदूषण कम होने से बर्फ की सतह अधिक चमकीली हुई और हिमालय में बर्फ पिघलने की दर में कुछ क्षेत्रों में 40 प्रतिशत तक कमी देखी गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका समाधान आर्थिक गतिविधियों को रोकना नहीं, बल्कि विकास और स्वच्छ हवा के बीच बेहतर संतुलन कायम करना है।
हिमालय के ग्लेशियर एशिया के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत हैं और इनके तेजी से पिघलने से केवल पर्वतीय इलाकों पर ही असर नहीं पड़ेगा, बल्कि नदियों, कृषि, जल सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। बढ़ता वैश्विक तापमान पहले ही हिमालयी ग्लेशियरों पर दबाव डाल रहा है। अब प्रदूषण की काली परत इस संकट को और तेज कर रही है।
वैज्ञानिकों के लिए यह चेतावनी स्पष्ट है कि हिमालय को बचाने की लड़ाई केवल जलवायु परिवर्तन के खिलाफ नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के वायु प्रदूषण को कम करने की लड़ाई भी है।
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