नेपाल और तिब्बत की पहाड़ी सीमा पर आए भीषण बाढ़ के कारण लगभग 160 लोगों की मौत हो गई है और सैकड़ों लोग लापता हैं। उपग्रह तस्वीरों और शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, यह आपदा क्षेत्र में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने और भूस्खलन होने से उत्पन्न हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और पतले हो रहे हैं, जिससे हिमनदी झील के फटने (GLOF), अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा अत्यधिक बढ़ गया है। इस हिमस्खलन और मलबे के तेज प्रवाह की ताकत इतनी अधिक थी कि इसे 5.2 तीव्रता की भूकंपीय घटना के रूप में दर्ज किया गया। नेपाल के अलावा स्विट्जरलैंड और इटली जैसी जगहों पर भी ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जो जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में मंडराते गंभीर खतरों को दर्शाती हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। नेपाल और तिब्बत की पहाड़ी सीमा से लगे इलाके में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। करीब 160 लोगों की मौत की खबर है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में कई विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं।
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में पानी की बेहद तेज धारा के बीच लोग जान बचाकर भागते दिखाई दे रहे हैं। इस बाढ़ में कई इमारतें और वाहन बह गए।
नेपाल सरकार की शुरुआती जानकारी और उपग्रह तस्वीरों के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि बाढ़ की शुरुआत ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटकर गिरने से हुए भूस्खलन के बाद हुई हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र में बढ़ते तापमान के कारण हिमनद तेजी से पीछे हट रहे हैं और उनकी स्थिरता भी प्रभावित हो रही है, जिससे अचानक बड़े पैमाने पर हिमस्खलन, भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों में स्पष्ट रूप से पीछे हटने और पतले होने की प्रक्रिया देखी जा रही है। यहां अभी भी बड़ी मात्रा में बर्फ मौजूद है, लेकिन उसका द्रव्यमान लगातार कम हो रहा है।
वर्ष 2000 के बाद से दुनिया के ग्लेशियरों ने अपनी कुल बर्फ का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है। नेपाल में स्थिति और भी गंभीर रही है। 1970 से 2010 के बीच देश के ग्लेशियरों का क्षेत्रफल लगभग एक चौथाई घट गया। शोध के अनुसार नेपाल में 160 से अधिक छोटे ग्लेशियर पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर नहीं रोका गया, तो दुनिया की करीब 40 प्रतिशत ग्लेशियर बर्फ खत्म हो सकती है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से खतरा केवल बर्फ के पिघलने तक सीमित नहीं रहता।
ग्लेशियर छोटे होने के साथ उन तलछट और चट्टानी मलबों को रोकने की क्षमता खो सकते हैं, जिन्हें वे पहले थामे रखते थे।
इससे भूस्खलन का खतरा बढ़ता है। दूसरी ओर, पीछे हटते ग्लेशियर अक्सर ऊंचाई वाले इलाकों में बड़ी झीलों को जन्म देते हैं, जिनका पानी प्राकृतिक या बर्फीले बांधों के पीछे जमा होता है। अगर कोई बड़ा भूस्खलन ऐसी झील में गिरता है, तो पानी अचानक बांध के ऊपर से बह सकता है और पूरा बांध टूट सकता है।
इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनदी झील के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ पैदा होती है। नेपाल में पिछले साल ऐसी दो घटनाएं सामने आई थीं।
दुनिया के कई पर्वतीय इलाकों में लाखों लोग इस तरह की बाढ़ के संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में रहते हैं। हालांकि बुधवार की आपदा का कारण संभवतः अलग था। वैज्ञानिकों के शुरुआती आकलन के अनुसार ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे घाटी में गिरा और इससे भारी मात्रा में बर्फ तथा मलबा तेजी से नीचे की ओर आया। कनाडा के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के भूविज्ञानी डैनियल शुगर ने उपग्रह तस्वीरों के आधार पर बताया कि करीब 2,000 फुट चौड़ा बर्फ का हिस्सा लगभग 4,000 फुट नीचे गिरा हो सकता है।
इतनी ऊंचाई से गिरने के कारण बर्फ बुरी तरह टूटकर पानी और मलबे के तेज प्रवाह में बदल गई। हालांकि विशेषज्ञों ने अभी इस घटना के कारणों पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से बचने की सलाह दी है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक सप्ताह की शुरुआत में ग्लेशियर पर मौजूद बर्फ गर्म तापमान के कारण पिघली हो सकती है, जिसने ग्लेशियर की स्थिरता को प्रभावित किया होगा।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार ग्लेशियर के टूटने और उसके साथ हुए मलबे के तेज प्रवाह की ताकत इतनी अधिक थी कि इसे 5.2 तीव्रता की भूकंपीय घटना के रूप में दर्ज किया गया। नेपाल की घटना कोई अकेला उदाहरण नहीं है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी ग्लेशियरों के टूटने से विनाशकारी घटनाएं हुई हैं। पिछले साल स्विट्जरलैंड में एक ग्लेशियर के ढहने से एक पूरा इलाका मलबे में दब गया था। इटली में 2022 में ग्लेशियर टूटने की एक घटना में 11 पर्वतारोहियों की मौत हुई थी। दोनों घटनाओं को बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन से जुड़े ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों से जोड़ा गया। विशेषज्ञों के मुताबिक गर्म होती दुनिया में कई पर्यावरणीय प्रक्रियाएं एक-दूसरे को प्रभावित कर रही हैं। गर्मियों में तापमान बढ़ने से बर्फ तेजी से पिघलती है और ग्लेशियरों के आसपास पानी की मात्रा बढ़ जाती है।
इसके साथ ही ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जमी जमीन यानी अल्पाइन पर्माफ्रॉस्ट भी पिघलने लगी है। इससे वे चट्टानी हिस्से और बड़े-बड़े भूखंड, जो पहले जमी हुई जमीन में मजबूती से टिके रहते थे, अचानक अस्थिर होकर खिसक सकते हैं। नेपाल की ताजा त्रासदी इस बात की गंभीर चेतावनी है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता तापमान केवल ग्लेशियरों को नहीं बदल रहा, बल्कि भूस्खलन, अचानक बाढ़ और बड़े पैमाने पर आपदाओं के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।
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