भारत में पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगे लगभग दो दशक हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद गिद्धों की आबादी में अपेक्षित सुधार नहीं देखा गया है और संख्या अभी भी बेहद निचले स्तर पर बनी हुई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत में पशु चिकित्सा क्षेत्र में डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए जाने के करीब दो दशक बाद भी गिद्धों की आबादी में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है। संरक्षण से जुड़े हालिया आकलनों के अनुसार देश के अधिकांश हिस्सों में गिद्धों की संख्या बेहद कम स्तर पर बनी हुई है।
प्रतिबंध के बावजूद दवा के प्रभावी नियंत्रण और अन्य खतरों को लेकर संरक्षण विशेषज्ञों की चिंता बरकरार है। भारत ने 2006 में गैर-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवा (NSAID) डाइक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध लगाया था। इसे 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में गिद्धों की आबादी में आई भयावह गिरावट का प्रमुख कारण माना गया था। संक्रमित पशुओं के शव खाने वाले गिद्धों में यह दवा घातक गुर्दा विफलता का कारण बनती थी।
इसके चलते सफेद पीठ वाले, लंबी चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्धों जैसी प्रमुख प्रजातियों की आबादी में 95 से 99 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई थी। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के अवसर पर जारी आकलन में कहा गया है कि गिद्धों की संख्या में तेज गिरावट फिलहाल बेहद निचले स्तर पर स्थिर होती दिखाई दे रही है, लेकिन व्यापक स्तर पर आबादी की वास्तविक रिकवरी के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिल रहे हैं।
ईबर्ड रिकॉर्ड और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) द्वारा पहले किए गए सड़क-आधारित सर्वेक्षणों से प्राप्त आंकड़ों में भी हाल के वर्षों में कई क्षेत्रों में संख्या स्थिर या घटती हुई दिखाई देती है। संरक्षण विशेषज्ञों के मुताबिक डाइक्लोफेनाक प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन में अभी भी खामियां हैं। कुछ क्षेत्रों में मानव उपयोग के लिए तैयार डाइक्लोफेनाक उपलब्ध होने की जानकारी सामने आती रही है और कभी-कभी इसका पशु चिकित्सा उपयोग के लिए गलत इस्तेमाल किए जाने की आशंका रहती है।
इसके अलावा कुछ अन्य जहरीली NSAID दवाएं भी गिद्धों के लिए खतरा बनी हुई हैं। ‘सेविंग एशियाज वल्चर्स फ्रॉम एक्सटिंक्शन’ (SAVE) कंसोर्टियम के सलाहकार क्रिस बोडेन ने गिद्धों की धीमी रिकवरी पर चिंता जताई है। उनके मुताबिक पड़ोसी नेपाल में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है, जहां जहरीली NSAID दवाओं को नियंत्रित करने में अधिक प्रभावी कदम उठाए गए हैं।
भारत में दवाओं के अलावा बिजली के तारों से करंट लगना और अन्य उभरते खतरे भी गिद्धों की आबादी को प्रभावित कर सकते हैं। BNHS के उप निदेशक डॉ. सचिन रानाडे के अनुसार गिद्ध धीमी गति से प्रजनन करने वाले और लंबे समय तक जीवित रहने वाले पक्षी हैं। इसलिए उनकी आबादी में सकारात्मक बदलाव दिखाई देने में लंबा समय लग सकता है।
हालांकि, संरक्षण के लिए चलाए जा रहे कैप्टिव ब्रीडिंग और पुनर्वास कार्यक्रम उम्मीद की किरण बने हुए हैं। देश में कई संरक्षण केंद्रों में अब सैकड़ों गिद्धों को संरक्षित और प्रजनन कराया जा रहा है। हरियाणा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और असम सहित विभिन्न राज्यों में कैप्टिव-ब्रेड गिद्धों को प्राकृतिक आवासों में छोड़ा जा रहा है। कुछ छोड़े गए पक्षियों ने जंगलों में प्रजनन भी शुरू किया है, जबकि संरक्षित क्षेत्रों में गिद्धों की कॉलोनियों की लगातार निगरानी की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गिद्धों की स्थायी रिकवरी के लिए केवल कैप्टिव ब्रीडिंग पर्याप्त नहीं होगी। हानिकारक दवाओं पर कड़ा नियंत्रण, सुरक्षित खाद्य स्रोतों की उपलब्धता और ‘वल्चर सेफ जोन’ विकसित करना जरूरी है। इसके साथ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर भी गिद्धों के आवास और भोजन की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। गिद्ध मृत पशुओं के शवों को तेजी से साफ कर पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी संख्या में भारी गिरावट से पर्यावरणीय संतुलन और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।
संरक्षण प्रयासों ने संख्या को और तेजी से गिरने से रोकने तथा कैप्टिव ब्रीडिंग के जरिए सुरक्षित आबादी तैयार करने में कुछ सफलता हासिल की है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्धों को उनकी प्राकृतिक पारिस्थितिक भूमिका में वापस लाने के लिए दवाओं के इस्तेमाल पर सख्त निगरानी और व्यापक स्तर पर सुरक्षित आवास सुनिश्चित करना अब भी बेहद जरूरी है।
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