सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के हाथी कॉरिडोर का नया सर्वेक्षण कर सभी अवरोध और बाधाएं 14 अक्टूबर तक हटाने का निर्देश दिया है। अदालत ने हाथियों को भगाने के लिए आग के गोले, मशाल और लोहे की कील जैसे हानिकारक तरीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए स्पष्ट किया है कि फसल नुकसान का हवाला देकर किसी भी राज्य को पारंपरिक मार्गों में रुकावट डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पर्यावरण मंत्रालय को इस संबंध में विस्तृत स्थिति रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों यानी एलीफेंट कॉरिडोर का नए सिरे से सर्वेक्षण कराने और उनमें मौजूद सभी अवरोधों को हटाने का निर्देश दिया है। अदालत ने हाथियों को डराने या उनके प्राकृतिक मार्ग से हटाने के लिए आग के गोले, मशाल, लोहे की कील और ‘हुल्ला पार्टी’ जैसे हानिकारक तरीकों के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने स्पष्ट किया कि फसल नुकसान रोकने के नाम पर कोई भी राज्य हाथियों के पारंपरिक प्रवास मार्ग में बाधा नहीं डाल सकता। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वन्यजीवों के रास्ते में किसी तरह की रुकावट स्वीकार नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि हाथियों के झुंड लंबी दूरी तय करते हैं और फसलों को होने वाले नुकसान के कारण उनके मार्ग में अवरोध खड़ा नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्बाध हाथी कॉरिडोर सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों के कारण कई मार्ग बाधित हैं।
मंत्रालय को 14 अक्टूबर तक विस्तृत स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया है। इसमें मौजूदा अवरोधों के कारण, उन्हें हटाने के लिए उठाए गए कदम और भविष्य में ऐसी रुकावटों को रोकने की योजना का विवरण देना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानव-हाथी संघर्ष का समाधान कॉरिडोर को अवरुद्ध करना नहीं है। अदालत ने कहा कि हाथी कॉरिडोर में किसी भी प्रकार का निर्माण या अवरोध स्वीकार्य नहीं होगा। यह निर्देश उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया, जिनमें पश्चिम बंगाल सहित कुछ राज्यों में हाथियों को भगाने के लिए प्रतिबंधित तरीकों के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया था।
वर्ष 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट ने आग के गोले और लोहे की कीलों जैसे तरीकों को ‘बर्बर’ करार दिया था। अदालत की पहल का उद्देश्य हाथियों के महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवागमन मार्गों को बहाल करना और भौतिक अवरोधों तथा हिंसक तरीकों के बजाय बेहतर प्रबंधन के माध्यम से मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है।
मामले की अगली सुनवाई 14 अक्टूबर को होगी, जब मंत्रालय को अपना सर्वेक्षण और स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है।

