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Environment Pulse > ईको सिस्टम > जल > खरीफ बुवाई में कमी घटी, लेकिन क्षेत्रीय असमानता और अल नीनो का खतरा बरकरार
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खरीफ बुवाई में कमी घटी, लेकिन क्षेत्रीय असमानता और अल नीनो का खतरा बरकरार

Environment Pulse
Last updated: September 10, 2026 8:56 pm
Environment Pulse
Published: September 10, 2026
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शुरुआती देरी के बाद खरीफ फसलों की बुवाई में काफी सुधार हुआ है और 4 सितंबर तक कुल बुवाई क्षेत्र 108.63 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो सामान्य स्तर के करीब है। हालांकि, जून में कमजोर मानसून के कारण धान के रकबे में 3.7 प्रतिशत की गिरावट आई है और कई राज्यों में बुवाई अभी भी पिछले साल से पीछे है। इसके अलावा, अल नीनो के कारण कमजोर और असमान बारिश तथा मिट्टी में नमी की कमी भविष्य की पैदावार, ग्रामीण आय और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क: देश में खरीफ फसलों की बुवाई में शुरुआती कमी अब काफी हद तक कम हो गई है। इससे किसानों और नीति-निर्माताओं को राहत मिली है, हालांकि कई राज्यों में बुवाई का रकबा अभी भी पिछले साल से पीछे है। साथ ही अल नीनो का खतरा कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय के लिए चिंता का कारण बना हुआ है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 4 सितंबर तक खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र करीब 108.63 मिलियन हेक्टेयर यानी 1,086.31 लाख हेक्टेयर रहा। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले लगभग 1.6 से 2 प्रतिशत कम है और करीब 110.45-110.46 मिलियन हेक्टेयर के सामान्य स्तर के आसपास है।

सीजन के शुरुआती दौर में बुवाई में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। जून के अंत में देरी से आए और कमजोर मानसून के कारण बुवाई करीब 23 प्रतिशत तक पिछड़ गई थी। जुलाई और उसके बाद बेहतर बारिश होने से किसानों ने तेजी से बुवाई पूरी की और कुल कमी में काफी सुधार हुआ। हालांकि यह सुधार सभी क्षेत्रों में समान नहीं है। खरीफ की प्रमुख फसल धान का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में करीब 3.7 प्रतिशत घटकर 42.18 मिलियन हेक्टेयर रह गया है।

कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड और तमिलनाडु में धान की बुवाई में कमी दर्ज की गई है। मोटे अनाज और कुछ तिलहनों का रकबा भी कई क्षेत्रों में पीछे है, जबकि दलहनों के रकबे में करीब 1.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दक्षिण-पश्चिम मानसून भी सामान्य से कमजोर रहा है। सितंबर की शुरुआत तक संचयी बारिश में 13 से 15 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई और देश के करीब आधे जिलों में सामान्य से कम वर्षा हुई। मानसून के दौरान विकसित और मजबूत हुई अल नीनो स्थितियों को कमजोर और असमान बारिश का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बुवाई का रकबा सुधरना खाद्य सुरक्षा और सरकारी खरीद को लेकर तत्काल चिंता कम करता है, लेकिन प्रमुख कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की नमी की कमी और आगे सूखे दौर की आशंका अभी भी चुनौती बनी हुई है। इसका असर वर्षा आधारित फसलों, खासकर दलहन, सोयाबीन और कुछ मोटे अनाज की पैदावार पर पड़ सकता है। कुछ राज्यों ने खड़ी फसलों को बचाने और आगामी रबी सीजन के लिए पानी संरक्षित करने के उपायों पर विचार शुरू कर दिया है। सरकार खरीफ 2026 के लिए महत्वाकांक्षी उत्पादन लक्ष्य पर काम कर रही है, लेकिन अंतिम उत्पादन मानसून के शेष दिनों में बारिश के रुख और अल नीनो के प्रभाव पर काफी हद तक निर्भर करेगा। फसल कटाई शुरू होने के साथ आने वाले महीनों में ग्रामीण मांग और किसानों की आय पर भी नजर रहेगी।

Also Read: ओडिशा के जंगल में पांच ऑरंगुटान मिलने से मचा हड़कंप, अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी की आशंका

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TAGGED:Agricultural ProductionCrop AcreageEl Niño ImpactKharif SowingMonsoon Deficit
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