‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत गंगा बेसिन में आए सकारात्मक पारिस्थितिक बदलावों के आंकड़े सामने आए हैं। नदी के मुख्य प्रवाह और किनारों पर 414 करोड़ रुपये की लागत से 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण का कार्य पूरा हो चुका है, जिससे मिट्टी के कटाव को रोकने और वन्यजीवों के लिए आवास तैयार करने में मदद मिली है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। गंगा बेसिन में पारिस्थितिक बदलाव अब आंकड़ों में भी नजर आने लगा है। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत नदी के मुख्य प्रवाह और उसके किनारों पर 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण पूरा हो चुका है, जबकि देश के पहले राष्ट्रव्यापी नदी डॉल्फिन सर्वेक्षण में 6,324 गंगा नदी डॉल्फिन दर्ज की गई हैं। गंगा बेसिन की 22 नदियों में हुए घड़ियाल आकलन में भी 3,037 घड़ियाल मिले हैं।
ये आंकड़े गंगा के साथ-साथ उसके पूरे नदी तंत्र में जैव विविधता के धीरे-धीरे मजबूत होने के संकेत दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के अनुसार, करीब 414 करोड़ रुपये की लागत से राज्य वन विभागों के सहयोग में किए गए वनीकरण का उद्देश्य केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि नदी किनारों को मजबूत करना, मिट्टी के कटाव को रोकना, भूजल रिचार्ज बढ़ाना और वन्यजीवों के लिए नए आवास तैयार करना भी है।
जलीय जैव विविधता की तस्वीर भी उत्साहजनक है। सर्वेक्षण में 6,324 गंगा डॉल्फिन के अलावा तीन सिंधु नदी डॉल्फिन दर्ज हुईं, जिससे देश में नदी डॉल्फिन की कुल संख्या 6,327 आंकी गई। गंगा, ब्रह्मपुत्र और अन्य नदी प्रणालियों में किया गया यह व्यापक सर्वेक्षण मीठे पानी के जीवों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराता है। घड़ियालों को लेकर तस्वीर मिश्रित है।
22 नदियों में 3,037 घड़ियाल दर्ज किए गए, लेकिन इनके लिए अत्यधिक अनुकूल आवास अभी सीमित हैं। चंबल नदी इनका सबसे महत्वपूर्ण आश्रय बनी हुई है। ऐसे में प्राकृतिक नदी प्रवाह बनाए रखना, जल आवासों की रक्षा करना और मानवीय दबाव कम करना संरक्षण के लिए जरूरी है। गंगा के कई हिस्सों में कछुओं, ऊदबिलाव, हिल्सा और घड़ियालों की बढ़ती मौजूदगी भी नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य में सुधार के संकेत दे रही है।
मछली विविधता बढ़ाने और डॉल्फिन के भोजन आधार को मजबूत करने के लिए नदी तंत्र में 203 लाख इंडियन मेजर कार्प फ्राई भी छोड़ी गई हैं। नमामि गंगे कार्यक्रम के एक दशक से अधिक के सफर में हरित आवरण और जलीय जीवों से जुड़े ये आंकड़े उम्मीद जगाते हैं कि गंगा में जीवन की वापसी हो रही है। हालांकि जल गुणवत्ता, सीमित आवास और नदी प्रवाह से जुड़ी चुनौतियां अब भी कायम हैं।
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