हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, भारत के पारिस्थितिकी तंत्र पर पर्यावरणीय खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। राजस्थान में रेड-नेप्ड आइबिस पक्षियों में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया (एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया) पाए गए हैं, जिससे मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो गया है। इसके अलावा, बढ़ते समुद्री तापमान और प्रदूषण के कारण अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और मन्नार की खाड़ी जैसी जगहों पर प्रवाल भित्तियां (कोरल रीफ) गंभीर संकट में हैं। साथ ही, उत्तराखंड में शुष्क और बर्फ रहित सर्दियों के कारण जंगल की आग (वनाग्नि) की घटनाओं में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारत के पारिस्थितिकी तंत्र पर मंडरा रहे अलग-अलग पर्यावरणीय खतरों को लेकर हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों और रिपोर्टों ने चिंता बढ़ाई है। राजस्थान में रेड-नेप्ड आइबिस में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया की मौजूदगी, समुद्री तापमान बढ़ने से प्रवाल भित्तियों में गिरावट और उत्तराखंड में सूखी सर्दियों के कारण बढ़ता जंगल की आग का खतरा जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।
‘EcoHealth’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि पश्चिमी भारत में आम तौर पर पाए जाने वाले रेड-नेप्ड आइबिस (Pseudibis papillosa) के शरीर में विभिन्न प्रकार के और बहु-दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया मौजूद हैं। उदयपुर में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पक्षियों के मल के नमूनों का विश्लेषण किया और Enterobacterales समूह के 60 बैक्टीरियल स्ट्रेन की पहचान की। इनमें Escherichia coli, Enterobacter और Klebsiella शामिल हैं। चार टैक्सा ऐसे मिले जो इस पक्षी में पहले दर्ज नहीं किए गए थे।
इनमें Enterobacter mori और Enterobacter soli को इस पक्षी में पहली बार वैश्विक स्तर पर दर्ज किया गया है। एंटीबायोटिक संवेदनशीलता परीक्षण में करीब 40 प्रतिशत आइसोलेट्स कम से कम तीन वर्गों की एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी पाए गए। तीसरी पीढ़ी के सेफालोस्पोरिन cefotaxime के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज किया गया, जबकि carbapenem imipenem के प्रति संवेदनशीलता में भी कमी देखी गई।
सभी आइसोलेट्स में linezolid और rifampicin के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोध पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, ये पक्षी आर्द्रभूमि, कृषि क्षेत्रों और शहरी इलाकों में भोजन की तलाश करते हैं। ऐसे में इनके मल के जरिए प्रतिरोधी बैक्टीरिया के फैलने की आशंका है, जिससे मानव और पशु स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। शोधकर्ताओं ने आगे जीनोमिक और संक्रमण-प्रसार संबंधी अध्ययन की जरूरत बताई है। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भी गंभीर दबाव में हैं।
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, मन्नार की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी में प्रवाल भित्तियां बढ़ते समुद्री तापमान, समुद्री अम्लीकरण, प्रदूषण, गाद जमने, विनाशकारी मछली पकड़ने और तटीय विकास जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। लक्षद्वीप के एटोल में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण और ग्रेट निकोबार विकास परियोजना से जुड़े प्रवाल प्रत्यारोपण को लेकर भी सवाल उठे हैं। 2016 और 2020 के बड़े ब्लीचिंग घटनाक्रमों के अलावा मौजूदा वैश्विक कोरल ब्लीचिंग घटना ने कई क्षेत्रों में जीवित प्रवाल के नुकसान को बढ़ाया है।
पश्चिमी हिमालय में उत्तराखंड में भी पर्यावरणीय जोखिम बढ़ रहा है। असामान्य रूप से शुष्क और बर्फ रहित सर्दियों ने जंगलों में आग के खतरे को बढ़ा दिया है। सर्दियों में वर्षा में कमी और तापमान में वृद्धि के कारण जंगलों की जमीन अधिक सूख रही है, जिससे आग का मौसम पारंपरिक प्री-मानसून अवधि से आगे बढ़ रहा है। 2026 की शुरुआत में सरकारी आंकड़ों में सैकड़ों वनाग्नि घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें कई सौ हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। गढ़वाल क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित रहा।
विशेषज्ञों के मुताबिक औसत ग्रीष्मकालीन तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि का वनाग्नि की घटनाओं में तेज बढ़ोतरी से संबंध देखा गया है। मिट्टी में नमी की कमी और जंगलों में जमा सूखी जैविक सामग्री इस खतरे को और बढ़ाती है। वैज्ञानिक निष्कर्षों और पर्यावरणीय घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि भारत को वन्यजीवों, समुद्री पारिस्थितिकी और वन क्षेत्रों की एकीकृत निगरानी मजबूत करने की जरूरत है।
एंटीबायोटिक प्रदूषण पर नियंत्रण, प्रवाल भित्तियों के संरक्षण और पुनर्स्थापन के प्रभावी उपाय तथा जंगल की आग की पूर्व चेतावनी और रोकथाम की रणनीतियां जैव विविधता के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण होंगी।

