पर्यावरण विशेषज्ञों, नागरिक संगठनों और थिंक टैंक ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से एक व्यापक ‘ग्रीन डेटा’ प्लेटफॉर्म विकसित करने की जोरदार मांग की है। इस प्रस्तावित डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य भूजल स्तर, वन क्षेत्र और वनीकरण निधि के उपयोग से जुड़े आंकड़ों को रियल-टाइम में दर्ज करके आम नागरिकों के लिए सार्वजनिक करना है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: पर्यावरण विशेषज्ञों, नागरिक समाज संगठनों और सार्वजनिक मंचों ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से व्यापक ‘ग्रीन डेटा’ प्लेटफॉर्म विकसित करने की मांग तेज कर दी है।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत भूजल स्तर, वन क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों और वनीकरण निधि के इस्तेमाल की जानकारी को डिजिटल माध्यम से रियल-टाइम में दर्ज कर आम नागरिकों के लिए सार्वजनिक किया जा सकेगा।
मांग को इस सप्ताह पर्यावरण क्षेत्र के थिंक टैंक और नागरिक संगठनों द्वारा आयोजित कई परामर्श बैठकों के बाद गति मिली। विशेषज्ञों का कहना है कि जिस तरह यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने डिजिटल भुगतान में पारदर्शिता और लेन-देन की निगरानी को आसान बनाया है, उसी तरह प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित आंकड़ों के लिए भी पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
दिल्ली में आयोजित एक सार्वजनिक मंच पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. अनन्या शर्मा ने कहा कि प्राकृतिक पूंजी के लिए भी ऐसी डिजिटल संरचना जरूरी है, जिसमें भूजल स्तर, वन संपदा और प्रतिपूरक वनीकरण से जुड़े वास्तविक परिणाम नागरिकों के सामने लगातार उपलब्ध रहें। विशेषज्ञों ने तीन क्षेत्रों को प्राथमिकता देने की बात कही है।
पहला भूजल निगरानी है। वर्तमान व्यवस्था में कई स्थानों पर समय-समय पर मैनुअल माप और राज्यों से मिलने वाली रिपोर्ट पर निर्भरता है। विशेषज्ञ सेंसर आधारित लगातार डेटा को राष्ट्रीय डैशबोर्ड से जोड़ने की मांग कर रहे हैं, जिससे गांव या ब्लॉक स्तर पर भूजल की स्थिति देखी जा सके।
दूसरा क्षेत्र वन संबंधी आंकड़े हैं। अभियान से जुड़े संगठनों ने उपग्रह तस्वीरों और जमीनी सत्यापन के आधार पर वन आवरण, वृक्षों की सघनता, जैव विविधता और अतिक्रमण से जुड़े संकेतकों को अधिक नियमित रूप से सार्वजनिक करने की मांग की है। तीसरा मुद्दा वनीकरण और प्रतिपूरक वनीकरण निधि का है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) तथा संबंधित योजनाओं से होने वाले खर्च का शुरुआत से अंत तक डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए।
इसमें धनराशि जारी होने से लेकर पौधरोपण, जियो-टैगिंग और पौधों के जीवित रहने की दर तक की जानकारी शामिल करने का सुझाव दिया गया है। प्रौद्योगिकी नीति विश्लेषक राजेश मेनन ने कहा कि खुले API, सार्वजनिक डैशबोर्ड, डिजिटल ऑडिट लॉग और नागरिक सत्यापन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल पर्यावरणीय आंकड़ों में भी किया जा सकता है।
उनके अनुसार, मंत्रालय के पास उपग्रह इमेजरी, IoT सेंसर और GIS जैसी तकनीकों तक पहुंच है, लेकिन चुनौती इन आंकड़ों को खुले, रियल-टाइम और स्वतंत्र रूप से ऑडिट योग्य बनाने की है। दिल्ली, बेंगलुरु और ऑनलाइन मंचों पर पिछले दो सप्ताह में हुई कई सार्वजनिक चर्चाओं में नागरिकों ने पर्यावरणीय आंकड़ों को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग उठाई। प्रतिभागियों ने रियल-टाइम वायु गुणवत्ता निगरानी और कुछ राज्यों में डिजिटल भूमि रिकॉर्ड जैसी पहलों का उदाहरण देते हुए पर्यावरणीय डेटा को भी समान प्राथमिकता देने की बात कही।
पर्यावरण संगठनों और डिजिटल अधिकार समूहों के एक गठबंधन ने संयुक्त बयान जारी कर पर्यावरण मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय ग्रीन डेटा प्राधिकरण गठित करने का प्रस्ताव रखा है। प्रस्तावित संस्था डेटा संग्रह के मानक तय करने, राज्यों के बीच डेटा की इंटरऑपरेबिलिटी सुनिश्चित करने, मशीन-रीडेबल ओपन डेटा जारी करने और स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था स्थापित करने का काम कर सकती है।
बयान में कहा गया कि जब नागरिक अपने क्षेत्र में भूजल स्तर में हो रहे बदलाव या CAMPA निधि से लगाए गए पेड़ों के वास्तविक रूप से जीवित रहने की स्थिति देख सकेंगे, तो जवाबदेही मजबूत होगी। पर्यावरण मंत्रालय ने इन मांगों पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की है।
चर्चाओं से परिचित अधिकारियों के अनुसार, वन निगरानी डैशबोर्ड में सुधार और भूजल सेंसर नेटवर्क से जुड़े कुछ पायलट प्रोजेक्ट विचाराधीन हैं। हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल पायलट परियोजनाओं से व्यापक स्तर की पारदर्शिता हासिल नहीं होगी। पर्यावरण अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अधिक विश्वसनीय और सत्यापन योग्य पर्यावरणीय आंकड़े भारत की अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं और कार्बन बाजार से जुड़ी व्यवस्थाओं में भी उपयोगी हो सकते हैं।
ऐसे में ‘ग्रीन डेटा’ की मांग भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को वित्तीय क्षेत्र से आगे बढ़ाकर प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन तक ले जाने की बहस को तेज कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य पर्यावरणीय शासन में पारदर्शिता, रियल-टाइम निगरानी और नागरिक भागीदारी को मजबूत करना है।
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